कण्डाली की झाड़:नीलम पांडेय “नील” की भावप्रवण कवितायेँ

नीलम पांडेय “नील” उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध कवियित्री हैं. उनकी रचनाएं देश के कई पत्र पत्रिकाओं में छप चुकी हैं. आईये आज उनकी कविताओं से खुद का परिचय करवाएं:

शपथ

शपथ है तुमको मेरे दोस्त
मेरे जाने के बाद रस्म की
मेरी कोई गुजारिश न होगी
बस छोटी सी ख्वाहिश मेरे
कफन में तिंरगे की होगी ।

न जलाना न दफनाना मुझे
बस बाँट देना जिस्म को जब
जरूरत हो जिसकी जैसी भी
और जो बचे वो गंगा की होगी ।

शपथ है तुमको मेरे दोस्त
परवाह नही कि चील कौवे
मछली का निवाला बन जाऊँ
बस तराण आये मनको उनके।

न फुल न अगरू न थूप देना
थोड़ी सी मिट्टी मेरे गाँव की
मेरे माथे पर टिका देना और
गौशाला में चाहो तो घुमा देना

शपथ है तुमको मेरे दोस्त
न हलुवा न पुरी न खीर हो
बस भरपेट रोटी, तरकारी हो
पास की बस्ती में उस दिन जश्न हो

चाहो तो वीणा,मृदंग, सितार बजाना
वो पुराने रेडियो में एफ एम चलाना
और बार्डर की खबरों के संग संग
बस एक गीत शहीदी का बजा देना।

शपथ है तुमको मेरे दोस्त
मेरे जाने के बाद रस्म की
मेरी कोई गुजारिश न होगी
बस छोटी सी ख्वाहिश मेरे
कफन में तिंरगे की होगी ।

नीलम पांडेय “नील”
देहरादून
4/1/17
कापीराइट अंखड भारत पत्रिका

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कण्डाली की झाड़

सुंदर आवरण
में लिपटे झूठ
केदार नाथ आपदा में
तुम्हें विदा कर दिये थे
बहा दिये मन के पत्थर
जब बादल फटे एक रोज
यूँ बरसे लगा कि
पत्थरों में असंख्य छेद हो गये
तब बरसों बोझ से दबा हुआ
आसमान रिक्त हो गया
किन्तु फिर फिर हरी हो
जाती है त्रासदी
उलझे दुखों के ताने बाने
कण्डाली की झाड़ सी
उग आती है अनायास
तब लगता है कि कैसे एक
हरा पेड़ गले लगा लेता है
“प्रेम” समझ कर
एकाएक चढ़ आयी मोटी हरी
जंगली बेल को
फिर एक दिन बेल लपेट देती
उसको सर्वांग तक, नही छोड़ती
सूखने की हद तक
ऐसे ही कुछ लोग जीवन में
छलावे से दस्तक देते हैं
और ताउम्र शूल बन
साँसों की डोर टूटने तक
जीवन में पल पल
घटित होते है
दुर्घटनाओं की तरह ।

नीलम पांडेय “नील”
26/10/17
रानीखेत, अल्मोड़ा
हस्ताक्षर में छपी है कापीराइट

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शान्तनु

वृंदावन का कृष्ण कन्हैया
पाट की पटडोरियां गाती हुई
कभी हंसती ,कभी रोती
वो उलझी पर भोली सी औरत
तुम्हारी माँ कहाँ हैं अब……… शान्तनु !

आज अनायास तुम याद आये
माँ के साथ साथ तुम्हारा चलना धीरे धीरे
वो वही औरत जिसे लोग उर्मि पगली कहते थे
तुम उसी उर्मि पगली का प्रेम से हाथ
पकड़ कर खेलने आते थे ना ……. शान्तनु !

हम मिट्टी,पत्थर से घर बनाते
और तुम्हारी माँ वो सब तोड़ देती
और हंसने लगती थी,तब गुस्से में
हम घर लौट जाते फिर तुम्हारे जाने के बाद
मैं वापस आती तो घर बना मिलता था …… शान्तनु !

जब तुम स्कुल जाते तो माँ सड़कों पर
लौटते वक्त वो तुम्हारे साथ होती थी
तब मिड डे मिल,सरकार की निःशुल्क
शिक्षा और इंदिरा आवास भी नही था
मित्र ! तुम तो हजार चुनौतियों से लड़े ना ….. शान्तनु !

अब तुम जीत गये हो या हार गये
आज मैं सुनना चाहती हूँ तुमसे
तुम्हें देखना और जानना चाहती हूँ कि
अन्तोदय बच्चे भी सीमाऐं तोड़ कर
कैसे कुंदन बन जाते हैं ……….. शान्तनु !

जाने के वर्षों बाद उसी जगह
आयी तो तुम नही मिले,लोगों से पूछा
पर लोग निरूत्तर थे
और होते भी क्यों नही आखिर एक पागल की
फिक्र वेबजह कोई क्यों करता ना………. शान्तनु !

तुम बिना बताये क्यों चले गये उत्तर मत देना !
माँ प्रिय थी तुम्हें ,शायद लोगों के तंज सह नही पाये
तुम चले गये दूर पर मैं जानती हूँ कि
तुम टूट सकते हो बिखर सकते हो पर
हार नही सकते ना ………… शान्तनु !

नीलम पांडेय “नील”
देहरादून
पब्लिस्ड कादम्बिनी

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जैसी उस वक्त थी

सूरज की परावैगनी किरणें
अहहह …….वही कड़ी सी धूप
वैसी ही तपिश
जैसी उस वक्त थी, और
फिर शीत की लंबी रातें
बेसुमार बरसात न थमने वाली
कई कई दिनों तक
वैसी ही जैसी उस वक्त थी ।

सायं सायं करती हवा
अचानक कौंधती बिजली
अन्दर अनहद खामोशी
वैसी ही जैसी उस वक्त थी ।

शगुन अपशगुन के बीच
डोलता मन और
रात से सुबह तक की
लंबी जद्दोजहद वैसी ही
जैसी उस वक्त थी ।

दिन कैसे एक महत्वाकांक्षी
मानव को क्षीण क्षीण
रात की आगोश में ले रहे है
एक अनबुझी यात्रा
बिलकुल वैसी ही जैसी उस वक्त थी ।

यदा कदा ही मानव जीवित रहते है
युगों में वरन बूँद बूँद आत्मा का रिसाव
सांसो की ढीली पड़ती प्रत्यंचा
वैसी ही जैसी उस वक्त थी ।

जो मंजर आज है फिर मिलेंगे
वो लोग हम जिन जिन से मिले,
आगे के मोड़ो पर फिर मिलेंगे
किन्तु अजनबी सी नई राह होगी
वैसी ही जैसी उस वक्त थी ।

परन्तु उस वक्त का वह
कौन सा वो वक्त था
जो यदा कदा मानस पर दस्तक दे
दोहरा रहा चेतना को अनायास
बिलकुल वैसे ही जैसी उस वक्त थी

युगों युगों को छुता मानव
फिर भी अनभिज्ञ है
खुद से और विस्मृति के सागर में
छल रहा खुद को आज की स्मृति में
वैसी ही जैसी उस वक्त थी ।

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बुलबुला

पानी के कई अनगिनत से बताशे
रोज मेरे खेलों में बनते बिगड़ते हैं
आज फिर खुब चमकता सा एक बुलबुला
अनायास हवा में गुम होता गया ।

ऐसे ही बेबाक मेरा हसँना और
मेरी चमकती आखों में क्षणिक
झिलमिलाते असँख्य जुगनु
कई दफा रात में बने
और दिन में उनका पता न लगा।

रोटी में चांद खोजने की कोशिशें
नमक की ढेली में हर बार नये स्वाद लेता
जिंदा रखता गया मुझमें मेरा सपना
चाहे मैं कई बार कुर्ते की
बाँहे अनायास भिगा गया ।

मैं नही जानता खुशियों के बँटवारे
सबके लिये अलग अलग कैसे हैं
किन्तु मेरी खुशियों के
मायने कुछ तो जुदा है
उन्हे आसान और मुझे
पल पल जलजला मिलता गया

गाहेबगाहे आती रही
जो चुनौतियों की सदाऐं
परवाह नही कौन मुझसे
मेरी राहे जुदा करता गया
मैं हसँने के बहाने तलाशता
सा बेफिक्र,भले ही आज भी वही हूँ
एक बनता बिगड़ता सा बुलबला ।।

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