#अपनाशहर: पटना मेरा शहर:

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

पटना मेरा शहर है. मै पटना 1992 में आया था, मैट्रिक करने के बाद. बीच में 5 साल दिल्ली में रहा. फिर 2002 सितम्बर से पटना में हूँ. दो साल के लिए ताजपुर अपने घर चला गया था. इस लिहाज से इस शहर से सम्बन्ध 20 साल पुराना है.

मुझे याद है कि जब मै पिताजी के साथ पटना कॉलेज में एडमिशन लेने आया था, तो ये मेरी याद में पहला बड़ा शहर था, जहाँ मै आया था. गाँधी मैदान से अशोक राजपथ होते हुए मै पटना कॉलेज जा रहा था, और अगल बगल की पुरानी नीची ऊँची इमारतों को देखता जा रहा था. जब कॉलेज कैंपस में पहुंचा, तो मै 350 साल पुराने डच इमारत को अचरज से देख रहा था. सोच रहा था, कितना इतिहास अपने दामन में समेटे हुए है ये इमारत !! फिर कॉलेज के पीछे गंगा. गंगा से सम्बन्ध पुराना रहा है, मुंगेर में फरदा अपना गाँव गंगा के किनारे ही तो बसा है.

गाड़ियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है:

उन दिनों के पटना के बारे में सोचता हूँ तो पाता हूँ कि भीड़ कम थी, सड़क पर भीड़ कम थी, हवा ताज़ी थी. रोड पर चल सकते थे. मै तो महेन्द्रू में जहाँ लॉज में रहता था, अक्सरहां वहां से स्टेशन पैदल ही चला जाया करता था. स्टेशन पर एक खास दूकान में लिट्टी चोखा खाता था; गांधी मैदान में मूंगफली तोड़ता था; और गाँधी मैदान में कभी मोना, तो कभी रेजेंट तो कभी वीणा सिनेमा हॉल में रियर स्टाल में बैठ कर फिल्मों का सस्ते में आनन्द लिया करता था. आज तो सोचना संभव भी नहीं. इतनी भीड़, इतनी गाड़ियां सड़क पर चल रही हैं. अब चल भी क्या रही हैं, रेंग रही हैं कहिये. पिछले बीस सालों में सड़कों पर एवरेज स्पीड में बेहद कमी आई है.

प्राइवेट गाड़ियों की संख्या बेतहाशा बढ़ी हैं. पहले मुझे याद है जब मै रोड पर थोड़ी देर के गाड़ियों की ओर नज़र दौडाता था, तो बमुश्किल प्राइवेट गाड़ियाँ नज़र आती थीं, और ऑटो ज्यादा दीखते थे, पर अब तो कारें ज्यादा हो गयी हैं, और ऑटो कम. मोटरसाइकिल की संख्या तो खैर काफी बढ़ गयी है. और ये शहर के किसी ख़ास रूट में नहीं है, पुरे शहर में ऐसा ही है.

मुझे याद है उन दिनों मै कभी कभार पटना कॉलेज एरिया से बोरिंग रोड एरिया में आता था, क्विज बुक्स की दूकान थी, उन दिनों बोरिंग रोड का इलाका सुनसान सा लगता था. संन्नता पसरा रहता था, अजीब सी वीरानी. लगता था जैसे ए एन कॉलेज से आगे पटना फैला नहीं. पर अब तो पटना जैसे कंक्रीट का जंगल हो गया है.

फिर मै पटना से दिल्ली चला गया. लौट कर जब पटना आया, तो देखा पटना बदल रहा है. 2002 के जाड़े में नाक पर मुझे मफलर लगाना पड़ा. हवा इतनी प्रदूषित हो चुकी थी. सड़क तो सड़क गलियां भी चलने लायक नहीं रही. गलियों में भी मोटरसाइकिल, कार चल रही थीं.

कुछ चीजें पहले से बेहतर हुई हैं:

पटना हाल के वर्षों में बहुत बदला है. यहाँ ईटिंग आउट कल्चर बना है. रेस्टोरेंट, माल्स काफी तेजी से खुल रहे हैं. लोग देर रात तक सड़क पर रह सकते हैं. अपराध पर पटना में नियंत्रण हुआ है. हालाँकि पटना को अभी भी वीमेन फ्रेंडली शहर नहीं कह सकते कोलकाता की तरह. कपल्स काफी ज्यादा सड़कों, पार्कोंमें, रेस्टोरेंट में नज़र आने लगे हैं.

दूसरी तरफ पटना में हाल फिलहाल कई नए अकादमिक संस्थाएं खुली हैं. जैसे चाणक्य लॉ इंस्टिट्यूट, आर्यभट यूनिवर्सिटी, चन्द्रगुप्त मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट, IIT, IIFT. पर अभी लीडिंग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट बनने में ये समय लेंगे.

एक और चीज है, हाल के वर्षों में पटना में कई इंटरनेशनल एनजीओ ने भी अपना ऑफिस सेट अप किया है.

पटना उस तरह से एजुकेशनल हब नहीं बन सका; जैसा ये बन सकता था:

पटना में इधर काफी बड़ी संख्या में प्राइवेट स्कूल खुले हैं. पटना वैसे स्कूल एजुकेशन के मामले में सही है. हालाँकि बेहतरीन स्कूल्स प्राइवेट सेक्टर में हैं और वे अभिभावकों की जेब में जोंक् की तरह घुसे हुए हैं. अगर कॉलेज एजुकेशन की बात करें तो पटना में इसकी क्वालिटी लो है. स्टूडेंट्स अक्सरहां दिल्ली या अन्य शहरों की राह पहले भी लेते थे, आज भी ले रहे हैं. कैंपस पॉलिटिक्स, कैंपस में छात्र राजनीति के नाम पर गुंडों को राजनीतिक दलों को प्रश्रय, बिहार का सामंती कल्चर, लड़कियों के लिए hostile कैंपस, बरसों से फैकल्टी की नियुक्ति नहीं होना, वर्षों से सिलेबस को अपडेट नहीं करना, आदि तमाम कारण हैं कि कॉलेज एजुकेशन और नीचे जा रहा है. बीस साल पहले विमेंस कॉलेज और मगध महिला कॉलेज बेस्ट कॉलेज थे, आज भी हैं, हालाँकि पटना कॉलेज और पटना साइंस कॉलेज के पक्ष में इनका स्वर्णिम इतिहास है; पर इतिहास ही है.

पटना यूनिवर्सिटी को पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड कहा जाता रहा है. पर पटना यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा नहीं मिल पाया. अगर ईस्टर्न इंडिया में इस यूनिवर्सिटी का upgradation हो सकता, तो ये पुरे नार्थ ईस्ट के विद्यार्थियों को दिल्ली के बजाय पटना में रोक सकता था. कम से कम अच्छी खासी संख्या को डाइवर्ट तो जरुर कर सकता था. ऐसे में पटना शहर का नेचर और कल्चर कॉस्मोपॉलिटन हो सकता था. पर ऐसा हो नहीं पाया.

नगर निगम से ख़राब वर्क कल्चर और भी है कहीं?

पटना में एक और संस्था नहीं बदली. वो है इसका नगर निगम. नगर निगम जैसा निकम्मा संस्था पटना में कम ही है. हमेशा अधिकारी वर्ग और राजनीतिक वर्ग के बीच हितों का टकराव, वेतन और बेहतर कार्य माहौल को लेकर हड़ताल, प्राइवेट सेक्टर को आउटसोर्स करना और फिर उन्हें उनके काम के लिए समय पर वेतन नहीं देना आदि मुद्दों के चलते पटना नगर निगम में एक ढंग का वर्क कल्चर नहीं बन पाया है. ऐसे में पटना के अन्दर ही गार्बेज डंपिंग ग्राउंड बन गए हैं. ब्य्पास से पटना शहर में घुसते समय असहनीय बदबू के चलते नाक पर रुमाल रखना पड़ता है. गाडी में हैं तो गाडी का शीशा ऊपर करना पड़ता है. और अगर बस में हैं तो फिर रोने के आलावा कोई और चारा नहीं.

अब तक टूरिज्म अपना पूरा पोटेंशियल नहीं पा सका है:

इधर पटना में कुछ नए constructions किये गए हैं. ऊपर ऊपर से पटना को सजाने के लिए कुछ पार्क्स डेवेलप किये गये हैं. जिसमे सबसे बड़ा पार्क एको पार्क है; कन्वेंशन हॉल भी बना है. नया म्यूजियम बन रहा है. पर ओवरआल पटना शहर साफ़ सुथरा नहीं है.

हालाँकि पटना ऐतिहासिक शहर है और यहाँ टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सकता है, पर अधिकारियों की शिथिलता ने ऐसा होने नहीं दिया. शहर में आने वालों में सबसे अधिक सिख लोग हैं, जो गुरु गोविन्द सिंह की जयंती के चलते यहाँ गुरु साहिब गुरुद्वारे में आते हैं. पटना से बोधगया, राजगीर, वैशाली, उधर चंपारण हर तरफ निकला जा सकता है; जो बाहर से आते हैं, वे सुविधाओं का रोना रोते हैं.

पटना के उपनगरों में सड़कों की हालत अभी भी बहुत अच्छी नहीं कह सकते:

पटना में सड़कों में मामले में कोई तरक्की नहीं हुई है. पटना में जनसँख्या फैली है, पर सड़क वैसे ही हैं. पटना हालाँकि फ़ैल रहा है, नदी के चलते उत्तर की तरफ नहीं फ़ैल सकता, पर हाँ पूरब और पश्चिम की दिशा में तेजी से फ़ैल रहा है. वो समय दूर नहीं जब ये फ़ैल कर बिहटा तक चला जाएगा और पूरब में फतुहा तक. ऐसे में पटना urban agglomeration बन जाएगा एनसीआर दिल्ली की तरह.

पर पटना में एक चीज जो नहीं बदली, वो यहाँ की सफाई व्यवस्था. पटना भारत की शायद सबसे गन्दी राजधानी है. और रह रह कर हाई कोर्ट ने सफाई के मसले को लेकर जिला प्रशासन, नगर निगम, और साथ ही बिहार सरकार को फटकार लगाई है. पर फिर भी कुछ हो नहीं पाया है.

उपभोक्तावादी संस्कृति बढ़ी; बौद्धिक संस्कृति घटी:

पटना में एक चीज खटकती है. वो ये कि यहाँ पर सिविल सोसाइटी, डिस्कशन पॉइंट्स, बौद्धिक संस्कृति नहीं रही. बुद्दिजीवी कल्चर इस शहर में कमजोर पड़ा है. कॉफ़ी हाउस कभी हुआ करता था, पर अब नहीं है. पहले क्विज, डिबेट्स हुआ करते थे, पर अब नहीं हो रहे, जो हो भी रहे हैं, वे स्कूलों में सिमट कर रह गये हैं.

पटना में हाल फिलहाल मनोरंज के साधनों में तेज गति से परिवर्तन हुए हैं. पुराने सिनेमा हॉल्स की जगह मल्टीप्लेक्सेज ने ले ली है. Fun Zones जगह जगह बन गए हैं. मेगा मार्ट, फ़ूड कोर्ट, बिग बाज़ार आदि ने खरीदारी को enjoyable बना दिया है. पहले के विपरीत लोग पैसा खर्च कर रहे हैं.

गंगा पहले भी गन्दी थी, अब और गन्दी हो गयी है. ट्रैफिक लोड कम करने के लिए गंगा की तरह एलिवेटेड हाईवे बनाया जा रहा है, गंगा पटना से दूर जा रही है. पहले छठ पटना में बहुत धूम धाम से मनाया जाता था, पर आजकल लोग माथे पर टोकरी लेकर उतनी दूर चलना नहीं चाहते. अपार्टमेंट्स की छतों पर छठ मनाया जाने लगा है. छठ गंगा के घाटों से सिमट कर अपार्टमेंट की छतों पर आ गया है.

पटना का आर्थिक चेहरा और polished हुआ है; बदला है नहीं कह सकते:

पटना में सर्विस सेक्टर ने तरक्की की है. आईटी कम्पनियां खुली हैं, BPO कम्पनियाँ खुली हैं, स्माल स्केल इंडस्ट्रीज खुल रही हैं; पूर्वी भारत में पटना कोलकाता के बाद सबसे तेज गति से बढ़ने वाला शहर है. हालाँकि ये पटना के युवाओं को रोजगार देने में पूरी तरह सफल नहीं हो रहा है. पटना में जनसँख्या का दबाब संसाधनों पर साफ़ दिख रहा है. पर आने वाले दिनों में मेट्रो से कुछ उम्मीद है, उधर गंगा की तरह एलिवेटेड हाईवे भी बन रहा है. गंगा पर गाँधी सेतु के अलावा छपरा की ओर निकलने के लिए एक और पुल बन गया है, जिसके चलते पटना से बाहर निकलना थोडा आसान हुआ है.

पिछले एक दशक में पटना में अपार्टमेंट कल्चर तेजी से विकसित हुआ है. इसके चलते गलत सलत लोग कंस्ट्रक्शन सेक्टर में आ गए हैं. जमीन अपराध का कारण बन गए हैं. जमीन के कई टुकड़े प्राइम लैंड बन गए हैं, वहां से घर वालों को धमका कर बिल्डिंग माफिया भगा रहे हैं. अपराध की दस्तक साफ़ सुनाई पड़ सकती है. आने वाले समय में ये और बढ़ेगा. इन माफियाओं के राजनीतिक संपर्क होने के चलते और समस्याएं पैदा हो जाती हैं. रेरा एक नया कानून आया है, पर रेरा का इम्प्लीमेंटेशन संतोषजनक नहीं कहा जाएगा.

कुल मिलाकर पटना तेज गति से बढ़ता शहर है. पटना बढ़ इसलिए भी रहा है क्योंकि बिहार के अन्य शहर इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में बेहद पुअर हैं, ऐसे में पटना पुरे बिहार से लोगों को अपनी ओर खींच रहा है. ये पटना का स्ट्रेंग्थ कम, और बिहार में नगरीकरण की कमजोरी ज्यादा कही जायेगी. पर क्या मुझे ये शहर पसंद है? बहुत जोर देकर भी हाँ नहीं निकल पाता है. ठीक है. मुझे सच कहिये तो गाँव पसंद है; पर गांव में जैसा कि मैंने ग्रोथ के अवसर नहीं है. अब सिर्फ हवा खाकर और हरियाली देखकर कोई कैसे रहे? और कब तक रहे?

पटना दिल को भाये? इसके लिए पोलिटिकल विल पॉवर, हमारे भी विल पॉवर की जरुरत है:

पटना दिल को भायेगा जब यहाँ कॉलेज एजुकेशन पर काम होगा, बुद्धिजीवी कल्चर विकसित होगा; शहर की सफाई दुरुस्त होगी; ट्रैफिक पर काम होगा; वायु प्रदुषण से निपटने के लिए दिल्ली की आप सरकार की तरह कुछ अलग सोचा जाएगा; और हाँ, यहाँ बिल्डिंग माफिया को नियंत्रित करने के कदम उठाये जायेंगे.

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One thought on “#अपनाशहर: पटना मेरा शहर:

  • October 5, 2018 at 09:08
    Permalink

    पटना शहर से मेरा भी नाता रहा है बहुत खूबसूरती से हर बात आलेख में लिखी गयी है. सूचनाएं भी मौजूद हैं. बधाई लेखक को

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