#अपना शहर: एक बार जो पटना आई तो पटना की होकर रह गयी

उषालाल सिंह 

मेरा जन्म पटना में नहीं हुआ है पर अभी तक के जीवन का सर्वाधिक समय पटना में ही बीता या कह सकते हैं कि एक बार जो पटना आई तो  पटना की होकर रह गई. पिताजी की सरकारी नौकरी के कारण कहीं एक जगह टिक कर रहना न होता था. अभी तक की याद में- “राजमहल”,कटोरिया(बांका),बौद्ध की ज्ञान स्थली गया,बिरसा मुंडा की धरती राँची,पुनः एक बार “गया”और 1992 में पटना आना हुआ. पटना में “कंकड़बाग”जिसे एशिया में सबसे बड़ा कॉलोनी होने का सम्मान प्राप्त है, पर मेरे मन में कंकड़बाग नाम से कंकड़ीली भूमि का भ्रम था जो यहाँ आकर टूटा.

पटना गवाह रहा है समृद्ध इतिहास का: 
पाटलिपुत्र को उदयन ने मगध की राजधानी बनाया था. अजीमाबाद, कुसुमपुर ,पुष्पपुर के नाम का सफर तय करता पाटलिपुत्र अब पटना हो गया है. वर्तमान पटना के निर्माण में शेरशाह का अहम योगदान रहा है. यहाँ कई ऐतिहासिक धरोहर हैं,जैसे-गाँधी मैदान- यहाँ सबसे ऊँची गाँधी जी की प्रतिमा है कई ऐतिहासिक घटनाओं का आज भी साक्षी है, गोलघर,मयूजियम, तख्त हरमंदिर पटना साहिब गुरुद्वारा,दरभंगा हॉउस, कुम्हरार, अगस्त क्रांति में शहीद हुए सात शहीदों के सम्मान में बना सप्तमुर्ति,महावीर मन्दिर, पटनदेवी,शीतला माता मन्दिर(अगमकुआं),गंगा नदी पर बना सबसे बड़ा पुल गाँधी सेतु ,आदि के साथ ही वर्तमान में कुछ और कड़ियाँ भी जुड़ी ,जिसमें बेली रोड में 500 करोड़ की लागत से बना नया म्यूजियम,गाँधी सेतु के समानांतर जयप्रकाश नारायण पुल. शहरों में कई जगह फ्लाई ओवर,बहुत सारे शॉपिंग मॉल,अनगिनत नर्सिंग होम जो मरीजों का भला से अधिक खुद का भला हो इसका ध्यान रखते हैं,और अनगिनत स्कूल,जिसमें प्ले स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक के शिक्षण संस्थान हैं.

पटना बस स्टैंड के पास ही चाणक्य लॉ कॉलेज,मैनेजमेंट कॉलेज,निफ्ट खुले है जिससे छात्रों को कई तरह की समस्याओं आये दिन दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है. पहले पटना में भीड़- भाड़ कम था पर वर्तमान में सर्वाधिक जनसँख्या घनत्व वाला जिला है. पूरा पटना एक जैसा न होकर विविधता समेटे है. बोरिंग रोड, बेली रोड ,पाटलिपुत्र,आशियाना ,राजभवन,आदि जगहों की साफ- सुथरी,चौड़ी सड़कें,आकर्षित करती है तो पटना सिटी और कई मुहल्लों की तंग गलियाँ पलायन को उकसाती है. शहरों से निकले कचरे के निष्पादन के लिए डंपिंग एरिया पहाड़ी के पास बनाया गया है. वहीं पास में RPS पब्लिक स्कूल भी है और SH-1 भी.

कुछ वर्ष (साधनापुरी) गर्दनीबाग में भी रहना हुआ पर न जाने क्यों ये एरिया मुख्य टाउन से कटा हुआ महसूस होता है. कंकड़बाग की बसावट और सही ड्रेनेज सिस्टम न होने की वजह से बरसात में जलजमाव की समस्या उतपन्न हो जाती है.सबसे अधिक मुश्किल तो तब होता है जब पानी घरों,अस्पतालों,स्कूलों आदि में भर जाता है. कुछ दिन के लिए तो जीवन ठहर सा जाता है. फिर भी “टेढ़ा है पर मेरा है”अभी तो हर मुहल्ले में वेपर लाइट और कैमरे लगाए गए हैं.एकदम चकाचक.

पटना में स्कूलों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है: 
पटना में अच्छे -अच्छे सरकारी विद्यालयों के बाद भी पब्लिक स्कूल की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है.बहुत सी स्कूलों की बिल्डिंगे किसानों की लहलहाती फसलों की कब्र पर उगी हैं. आज हम इतने शिक्षित हो गए कि अब स्कूलों को अपने बच्चों को न पढ़ाने के लिए पैसों का भुगतान करते हैं. (फ्लाइंग कैंडिडेट-जिनका सिर्फ विद्यालय में नाम होता है वहाँ पढ़ना जरूरी नहीं क्योंकि उस कीमती समय को दिल्ली ,कोटा आदि शहरों में बिता सकें.) कह सकते हैं ” सरस्वती पर लक्ष्मी का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा है.”

पर्यटन की संभावना के क्या कहने !!
यहाँ पर्यटन में अच्छे व्यवसाय की संभावना है.  ऐतिहासिक धरोहरों को देखे तो सबका अपना विशेष महत्व है-
अकाल के दिनों में अन्न भंडारण के ख्याल से निर्मित गोलघर की सभी दरवाजे अंदर की ओर खुलने की वजह से कितना कामयाब रहा ये तो नहीं जानती पर गोलघर की एक विशेषता यह भी थी, कि इसके ऊपर से पूरा पटना के नजारा देखा सकता था पर सबसे पहले चुनौती मिली बिस्कोमान भवन से.

कुम्हरार से मिले मौर्य काल के अवशेष में राज भवन का स्तम्भ है. जो एकाश्म पत्थर का बना है. राज भवन के निर्माण में पाषाण और लकड़ी दोनों का उपयोग किया गया था.जहाँ फर्श व छत लकड़ी के तो उनको सम्बल देता स्तम्भ पाषाण के.कभी सम्राट अशोक का महल वाला हिस्सा आज लव डेल बना है.

पटना मयूजियम में भी कई ऐतिहासिक चीजों को संरक्षण मिला है.दीदारगंज से प्राप्त चामर ग्रहणी यक्षिणी की मूर्ति,तो लाखों वर्ष पुराना पेड़ का फॉसिल्स,कई प्रकार के कला,चित्रकला. वर्तमान में नया तैयार हुआ म्यूजियम भी दर्शनीय है. यहाँ पटना कलम की चित्रकारी को देखना बहुत अच्छा लगता है. इतनी बारीक चित्रकारी कि देखने वाला दंग रह जाय. पटना कलम के चित्रकार पहले मुगलकाल में राजसी संरक्षण में अपनी कला को आयाम देते थे. पर मुगल शासन के अंत होने पर ये कलाकार पलायन कर पटना आ बसे. कम्पनी शासन में पल्लवित ,पुष्पित होने की वजह से इसे कम्पनी शैली भी कहा जाता है. चित्रकार अब राजसी चित्रों की बजाय यथार्थ का चित्रण करने लगे. चित्रकार काफी दक्ष थे जिसके प्रमाण आज भी संरक्षित है. इस चित्रकारी को अंग्रेज अधिकारियों द्वारा बेहद पसंद किया जाता था. वो लोग ऑर्डर देकर चित्र बनवाते थे और अपने देश ले जाते थे यहाँ की तंगहाली और बदहाली को दिखाने. इनके चित्रों के समूह को फिरका सेट कहा जाता है. पटना सिटी इस कला का मुख्य केंद्र हुआ करता था.

बिहार का लाइफ लाइन गाँधी सेतु: 


गंगा नदी पर बना गाँधी सेतु दक्षिण बिहार से उत्तर बिहार को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है जो अपनी बदहाली की स्थिति में भी साथ निभा रहा है. अब तो दीघाघट से छपरा तक बना जय प्रकाश नारायण पुल भी गाँधी सेतु की बोझ को हल्का किया है फिर भी हाजीपुर जाने के लिए गाँधी सेतु पर ही दबाव ज्यादा है.

बढ़ती जनसँख्या के दुष्प्रभावों से अपना शहर भी वंचित नहीं। नित नई आवश्यकताओं और भौतिक सुख के लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों, और बेतहाशा बढ़ती गाड़ियों आदि के कारण अपना पटना आज हीट आइलैंड बन कर रह गया है.

#अपनाशहर: पटना मेरा शहर:

#अपनाशहर; मेरी रांची, प्यारी रांची


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