#अपना शहर: अरवल जिसकी समृद्ध संस्कृति हमें अपने मोहपाश में बांध लेती है

उषालाल सिंह

“अरवल”ये नाम तो बचपन से ही सुनती आई थी क्योंकि मेरी एक चाची अरवल की थीं जहाँ मेरी माँ सहित अन्य चाची अक्षर ज्ञान से वंचित थी वहीं ये चाची पढ़ी लिखी व गाँव में ही शिक्षिका थी. मतलब अरवल में लड़कियों के पढ़ाई के साधन थे तभी तो मेरी ननद जिनकी उम्र वर्तमान में 85 वर्ष है वो भी उस वक्त आठवीं तक पढ़ाई की हैं.

बेटियों की तुलना धान से की गई है जिसे जहाँ बोते है (बिचड़ा, या मोरी) उसे वहीं बड़ा नहीं होने देते बल्कि हर हाल दूसरे जगह प्रतिस्थापित (रोपते) करते हैं. बस ऐसे ही मेरा भी प्रतिस्थापन (विवाह) 1995 में अरवल में हुआ. विवाह के पहले तक अरवल के बारे में कोई विशेष जानकारी न थी न कभी उस राह जाना ही हुआ था.  बाद में पता चला कि पटना से औरंगाबाद (मेरा गाँव) गया होकर जाने की वनिस्पत अरवल होकर जाने में दूरी व समय दोनों की बचत होती है.

अरवल जहानाबाद से काटकर जिला बनाया गया: 
मगध प्रमंडल का जहानाबाद परगना का अंग अरवल को राज्य का अडतीसवां जिला बनने की लंबी कहानी है. जहानाबाद 1986 में जिला बना था. अरवल के गाँधी मैदान में एक विवादित जमीन के मसले पर “किसान संग्राम समिति” द्वारा मीटिंग बुलाया गयी थी, जिसमें पुलिस के विरुद्ध भाषणबाजी हुई थी. जिससे तिलमिलाई अरवल थाने की पुलिस ने जहानाबाद से  अतिरिक्त पुलिस बल मंगवा लिया  और फिर भीड़ पर फायरिंग की गयी. गांधी मैदान का मात्र एक निकास द्वार होने के कारण कई लोग बेमौत मारे गए. उस वक्त जहानाबाद के पुलिस अधीक्षक(S.P.)-के.आर कासवान थे.  अरवल गोली कांड अरवल के इतिहास में एक काला पन्ना जोड़ गया.

इस घटना के बाद छोटे से जगह अरवल में अटल बिहारी वाजपेयी, कर्पूरी ठाकुर जैसे गणमान्य लोगों का आना हुआ.यहाँ के लोग इतने दहशत में थे कि लोग उनको सुनने करीब भी नहीं जा रहे थे. उस वक्त लोहे वाली फोल्डिंग कुर्सी एक बच्चा ( मेरे पति Saheb Lal) उनके पास ले गया था जिसका कोई प्रमाण तो नहीं पर स्मृति में आज भी सजीव है.
प्रखण्ड से अनुमंडल बना अरवल कई विरासत को सहेजे अपने विकास में लगा था.अरवल स्थित कभी अंग्रेजों का बंगला, बालिका उच्च विद्याय बना शिक्षा की ज्योत जगाता रहा.

अंग्रेजों के जमाने में अरवल जलमार्ग पर स्थित था; सोन नदी में लोहे के जहाज़ चला करते थे 
सोन नदी की तट पर बसा अरवल ब्रिटिश काल में जलमार्ग हुआ करता था. यहाँ की बड़की नहर(मुख्य) में लोहे का बोट चला करता था जो कोयले से चला करता था. औरंगाबाद के बारुण से खगौल पटना तक अनाज  और अन्य सामग्री का ढुलाई इसी मार्ग से किया जाता था. नहर पर बना लॉक और प्लेटफार्म आज भी देखने लायक है. अरवल का लॉक -7 आज भी उसी अवस्था में है. वर्तमान में यहाँ पावर ग्रिड है.

अरवल के ऐतिहासिक स्थल में अंग्रेज का बंगला जो वर्तमान में पुलिस उपाधीक्षक का बंगला है,गाँधी पुस्तकालय,गाँधी मैदान, कागज उद्दोग को प्रश्रय देने वाला कागजी मुहल्ला आदि. अरवल में धान की फसल बहुत अच्छी होती है शायद यही कारण था कि अरवल को बिहार का धान का कटोरा कहा जाता था.

धान रोपनी के गीतों मे, चौहट, झूमर के गीतों में जीवित ज़मींदार अडसठ बाबू: 
पास में बहती सोन नदी का पानी प्रत्यक्ष रूप से लाभकारी तो नहीं है,पर इसी सोन नदी पर औरंगाबाद और रोहतास के मध्य इंद्रपुरी डैम बनाया गया है और वहाँ से दो मुख्य नहर की शाखाएं निकली है जो आस पास के क्षेत्र का सिंचाई का प्रमुख साधन है. नहर की एकब शाखा का पानी सासाराम, बक्सर की भूमि को सिंचित करता है तो दूसरी शाखा औरंगाबाद, अरवल,जहानाबाद, पटना को जाती है.
यहाँ के प्रमुख जमींदारों में अड़सठ बाबू,और एक नाम है पर याद नहीं.  उनके तीन बेटे थे. शाह उमैर, शाह जुहैर और शाह जुबैर.  जमींदार साहब आज भी यहाँ के लोक गीतों में जीवित हैं. धान रोपनी के समय गाये जाने वाले गीत और भादो के महीने में चौहट के गीतों,व झूमर में अड़सठ बाबू की गाथा गाई जाती है. शाह उमैर जी राज्यसभा के सदस्य व पंडित जवाहर लाल नेहरू के करीबी थे. शाह जुहैर जी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अरवल विधान सभा से निर्वाचित हुए थे.  शाह जुबैर जी यहाँ से प्लायन कर कटिहार चले गए थे. वर्तमान में इनका पोता तारिक अनवर जी कटिहार के सांसद हैं.

अलवर की समृद्ध संस्कृति बरबस हमें मोहपाश में बाँध लेती है:
यहाँ के धार्मिक स्थल में मधुशर्मा का महादेव मंदिर है.कहा जाता है कि इसका निर्माण खुद विश्कर्मा जी ने किया था. जहाँ सभी मंदिरों का मुख्य द्वार पूरब की ओर होता है इस मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है.अधिकमास(मलमास) में राजगृह की तरह यहाँ एक महीना मेला लगता है. आसपास के लोग श्रद्धापूर्वक यहाँ आते हैं. पूरे माह उत्सव सा माहौल होता है.

एक ओर शहरों में छठ पर्व नदी जलाशयों से दूर होकर अपार्टमेंट की छतों पर सिमट आया है;  वहीं अरवल निवासी कोसों दूर से  माथे पर छठी मैया का दौरा सजाए नदी के तट पर पहुँचते हैं. व्रती भी दण्डवत देती पैदल आज भी सोन नदी के जनकपुर घाट पहुँचती है. बहुत ही आनन्द आता है सोन नदी में. नवम्बर के महीनों में ज्यादा गहरा पानी न होने से दूर- दूर लोग चले जाते हैं. जो एक बार यहाँ आता है हर बार आना चाहता है.

यहीं जनकपुर घाट के पास वाला क्षेत्र कला व संस्कृति के जरिये अपना भरण पोषण करने वालों को भी संरक्षण दिए हुए है जिनका सरकारी निबंधन होता है, और नृत्य संगीत ही उनके रोजगार का एकमात्र साधन होता है.  इसका एक स्याह पक्ष भी है कि इनमे से कई सरकारी संरक्षण में रेड लाइट एरिया में तब्दील हो गये हैं.जिनकी माँग, दशहरा में मूर्ति विसर्जनमें ,विवाह में (बारात में),चुनाव के दिनों में काफी बढ़ जाती है।यहाँ के लोगों का शान है बारात में नर्तकी का होना. अपनी हैसियत से एक,दो,या और अधिक. खुद मेरी शादी में पाँच आई थी  जिसे पिताजी जी ने कभी अच्छा नहीं समझा, न मेरी नजर में ये उचित है.

भूमि, मजदूरी और औरतों की इज्ज़त के मसले पर अरवल ने नक्सलियों और जातीय सेनाओं के बीच हिंसक संघर्ष देखा है:
यहाँ जातीय हिंसा का विभत्स रूप देखने को मिला है.  1997की जनवरी की सर्दी में.भोजपुर से सोन नदी पार कर आये सैंकड़ो लोगों का जत्था जाति व वर्चस्व की लड़ाई में सोये हुए  दलित समुदाय के लोगों का कत्लेआम कर चलते बने थे जिसमें 3 वर्ष के अबोध से 80 वर्ष तक की वृद्धा भी थी. कई तो दुनियाँ में आने से पहले ही माँ की कोंख में ही कत्ल कर दी गई इसलिए 58 मृतकों में उनकी कहीं कोई गिनती नहीं. इस दहशत से मैं भी गुजरी हूँ.उस वक्त अपनी एक साल की बेटी के साथ अरवल में ही थ.।हर रात एक दहशत में बीतता था कि पता न कब कोई जत्था इधर भी आ जाय. घर में सास,जेठानी उनके बच्चे मैं,मेरी बेटी थी तो पुरुषों में दोनों भाई।
आस पास के सभी लोग रात में दालान में न सोकर पीछे गौशाला की छत को साफ कर सोते थे. घर में एक दो कोठी जिसे बखार भी कहा जाता है ( जिसमें चावल,या अनाज रखा जाता है) को खाली रखा गया था ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें घुसकर जान बचाया जा सके. बहुत मुश्किल भरे दिन बीते थे कुछ दिन.
इस नरसंहार के बाद पुलिस ने कैम्प किया. बाद में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अरवल को पुलिस जिला बनाया गया और पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति हुई.

लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार में दोषी व्यक्तियों को जहाँ निचली अदालत द्वारा सजा दी गई थी, हाई कोर्ट द्वारा सभी को बेकसूर मानकर बरी कर दिया था, यहाँ के लोगों के लिए यक्ष प्रश्न आज भी है कि आखिर उनका कातिल था?
बाद में 2001 में अरवल जिला पूर्ण रूप से जिला बना. जिलाधिकारी का नया आवास अरवल जहानाबाद रोड पर बनाया गया.

#अपनाशहर: पटना मेरा शहर:

वर्तमान में अरवल में अरवल सदर, कलेर,करपी,कुर्था,बंशी सोनभद्र प्रखण्ड है. सोन नदी पर अब पुल बन गया है जो भोजपुर के सहार को अरवल से जोड़ता है. सहार का अपना ही रोंगटे खड़े कर देने वाला इतिहास है. अरवल जहानाबाद  से लगभग 37 किलोमीटर दूर है और पटना से करीब 80 किलोमीटर. पक्की सड़क के निर्माण ने अरवल और पटना के बीच दुरी को कम कर दिया है. अब कम समय लगता है.

हाल के वर्षों में सांप्रदायिक सौहार्द्य को चोट पहुंची है:
अरवल में मुस्लिम समुदाय के लोग भी रहते हैं. सोन किनारे मकदूमाना है जहाँ मकदूम अरवली का मजार है. रमजान के ग्यारहवें दिन,(रात में) यानी ईद से पहले यहाँ इगरही मेला लगता है. जिसमें “खजुली” एक मिठाई खाजा का ही रूप खूब बिकता है.
यहाँ हिन्दू मुस्लिम एकता एक मिसाल थी. जहाँ दशहरे में रामलीला में नाटक के कई पात्र मुहम्मद मंसूर,मुहम्मद इकबाल, नईम मियाँ हुआ करते थे तो वहीं मुहर्रम में ताजिया ढोने वालों में चंदेश्वर भारती, कमेसर, आदि होते थे.  पर बदलते परिवेश में इस भाईचारे पर ग्रहण लगा दिया है. पिछले वर्ष दशहरा में मूर्ति विसर्जन और मुहर्रम की ताजिया एक ही दिन एक ही रास्ते निकालने की बात पर आपस में उलझ गए. बात इतनी विवादित हुई कि कुछ दिन कर्फ्यू लग गए.

#अपना शहर: एक बार जो पटना आई तो पटना की होकर रह गयी

अरवल अब पहले से अधिक विकसित हो गया है. शहरीकरण के परिणाम स्वरूप यहाँ भी खेती वाले जमीन पर स्कूल और घर बनने लगे.जिससे जोत का आकार छोटा होता गया और बहुत से जमीन जो शहर से सटे है नए बने घरों का पनसोखा बन कर रह गया है.अरवल जिला बनने के बाद जमीन की कीमतें आसमान छूने लगी. और हाँ…पिछले कुछ वर्षों से अरवल ने जातीय हिंसा भी नहीं देखा है.

#अपनाशहर; मेरी रांची, प्यारी रांची


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