#MeToo: हम हमेशा महिलाओं के ही चरित्र पर सवाल क्यों खड़े करते हैं?

रजनीश आनंद 

#METOO कैंपेन में सच कितना? यह सवाल चारों ओर गूंज रहा है. सही भी है, आखिर किसी महिला के कह देने भर से तो कोई दिग्गज, प्रतिभावान व्यक्ति दोषी साबित नहीं हो जाता. तभी तो केंद्रीय मंत्री ने भी कहा है कि महिलाएं यूं ही तीन-चार लाख रुपये लेकर आरोप लगा देती हैं. ऐसे में यह जांच का विषय तो है ही कि महिला सच बोल रही है या झूठ. जिस देश में बलात्कार हो जाने पर लड़कियों को चुप रहने की सीख दी जाती है, जिस देश में अपना चाचा-मामा यहां तक कि रिश्ते का दादा भी बलात्कार और यौन हिंसा करता है उस देश में महिलाओं की बात पर यूं ही यकीन करना? उफ्फ इससे बड़ी मूर्खता कोई हो सकती है? जिस देश में चार माह की बच्ची तक का अंग पुरुषों को यौन हिंसा के लिए उत्तेजित कर देता है, वहां यौन हिंसा, छेड़छाड़ के आरोपों की बात करना सही नहीं है, क्योंकि वह बच्ची तो सबूत भी लाकर नहीं दे पायेगी, फिर उसके आरोप साबित कैसे होंगे?

अब सवाल यह उठाया जा रहा है कि आपको दस साल और 15 साल बाद क्यों याद आती है यौन हिंसा की. तो यह बात पुरुष कभी नहीं समझ पायेगा, क्योंकि उसके साथ जबरदस्ती नहीं होती, वह तो मन का मालिक है और सबसे बड़ी बात जो ध्यान देने योग्य है वह है हमारी सामाजिक व्यवस्था. हमारे सामाजिक व्यवस्था में लड़कों को यह सीख दी गयी है कि वह अगर एक से अधिक महिला के साथ संबंध बनाता है तो उसका कुछ घटता-बढ़ता नहीं, लेकिन जब एक महिेला एक से अधिक पुरुष से संबंध बनाती है तो वह अपवित्र हो जाती है. उसके माथे पूरे खानदान की इज्जत का टोकरा होता है. जरूरत है सीख बदलने की. जब हम अपने बच्चे को सीख देते हैं तो लड़के और लड़कियों का भेद करके देते हैं. जो चीज गलत है वह बेटा और बेटी के लिए अलग-अलग कैसे सही और गलत हो सकती है. आखिर कोई बच्चा किसी लड़की को ‘माल’ कहकर संबोधित कैसे करना सीखता है? यकीनन मां-बाप नहीं सिखाते, लेकिन हमारे समाज में एक महिला के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है, मॉल, आइटम जैसे शब्द आम हैं. यह शब्द किसी दूसरे ग्रह के नहीं हैं, हमारे बीच के हैं, हमने ही गढ़े हैं. बलात्कार एलियन आकर नहीं करते हमारे बीच के लोग ही करते हैं.


प्रेम संबंध में सहमति से बने संबंध का अगर कोई लड़की गलत तरीके से इस्तेमाल करती है, तो यकीनन यह घटिया कृत्य है. लेकिन अपनी प्रेमिका का वीडियो बनाकर उसे अश्लील बताकर वायरल करना कितना अच्छा और न्यायसंगत माना जायेगा. मैं एक पत्रकार हूं और वेब एडिशन के लिए काम करती हूं जहां एक खबर को कितने लोग पढ़ते हैं और पढ़ रहे हैं यह जानने का टूल हमारे पास है. ऐसे में बहुत दुख होता है यह देखकर कि बलात्कार की खबरों को पढ़ने के लिए लोग पिल पड़ते हैं, जबकि एक अच्छी स्टोरी पर उतने विजीटर नहीं आते. यह मैं इसलिए बता रही हूं क्योंकि यह हमारी मानसिकता का परिचायक है. सबसे दुखद है कि ऐसी खबरों को लोग संवेदना के साथ नहीं पढ़ते. अगर दुनिया में हर पुरुष सभ्य है तो फिर बलात्कार कौन करता है? अपनी बहन के लिए अच्छा लड़का दूसरी लड़की का अपमान कैसे कर देता है.

स्त्री-पुरुष के बीच आकर्षण होना वैज्ञानिक है. दोनों के अंदर कामेच्छा है और उसकी पूर्ति भी जरूरी है. एक व्यक्ति के लिए भी और संतति के लिए भी. लेकिन पुरुष अपनी कामेच्छा की पूर्ति के लिए दूसरे की इच्छा का हमेशा अनादर करेगा और जब सवाल उठेंगे तो उनकी प्रतिष्ठा धूमिल होगी, ऐसे तो नहीं चलेगा. क्योंकि जितनी जरूरत एक स्त्री को पुरुषों की है, उतनी तो आपको भी है, क्या नहीं है?

साभार: प्रभात खबर की सीनियर जर्नलिस्ट रजनीश आनंद के फेसबुक वाल से 


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

One thought on “#MeToo: हम हमेशा महिलाओं के ही चरित्र पर सवाल क्यों खड़े करते हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.