#HeroesofJharkhand:पाकिस्तानी सेना के तीन बंकर उड़ा देने वाले परमवीरचक्र विजेता अल्बर्ट एक्का

राजधानी रांची के बीचोंबीच अल्बर्ट एक्का की आदमकद प्रतिमा लगी है. यह जगह अल्बर्ट एक्का चौक के नाम से प्रसिद्ध है. लांस नायक अल्बर्ट एक्का, भारत-पाकिस्तान युद्ध (1971) में वीरगति को प्राप्त हुए थे. तब वे महज 29 साल के थे. एकीकृत बिहार में मरणोपरांत परमवीर चक्र का सम्मान पाने वाले वे पहले वीर सपूत थे. उन्हें हासिल प्रशस्ति पत्र पर भारत-पाक युद्ध में उनकी वीरगाथा लिखी है. भारत सरकार ने साल 2000 में इस वीर सपूत की याद में एक डाक टिकट भी जारी किया था.

झारखंड की राजधानी रांची से 160 किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल गुमला जिले में पहाड़ों-जंगलों से घिरा अल्बर्ट एक्का का गांव है- जारी.साल 2010 में सरकार ने अल्बर्ट एक्का के पैतृक जारी गांव को ब्लॉक (प्रखंड) का दर्जा दिया और इसका नाम अल्बर्ट एक्का प्रखंड रखा गया. यहां पुलिस थाना भी इसी नाम से खोला गया है. पर सामाजिक कार्यकर्ता जोसेफा तिर्की को इस बात का दुख है कि जारी गांव को साल 2010 में सरकार ने अल्बर्ट एक्का प्रखंड का दर्जा तो दे दिया, लेकिन मुकम्मल बिजली, स्वास्थ्य, सिंचाई, शिक्षा की सुविधा को लोग दशकों से तरसते रहे हैं. जोसेफा कहती हैं, ‘वीर योद्धा के नाम पर पूरे इलाके के लोग गर्व महसूस करते हैं. इलाके के कई युवकों को फौज में भर्ती होने की प्रेरणा भी अल्बर्ट से ही मिलती रही है. पर प्रशासनिक तौर पर होती उपेक्षाएं लोगों को बेहद खटकती रही है.’

साल 2015 के नवंबर महीने में सरकार ने पहली दफा अगरतला स्थित अल्बर्ट एक्का के समाधि स्थल से वहां की मिट्टी मंगवाई थी. अल्बर्ट एक्का की शहादत के 44 साल बाद यह संभव हो सका था. 3 दिसंबर 2015 को अल्बर्ट एक्का की पुण्यतिथि पर मिट्टी भरा कलश उनके परिवार वालों को सौंपने के लिए रांची से गुमला ले जाया गया था. जिस वाहन पर वो कलश भेजा गया था, उसका जगह-जगह लोगों ने अभूतपूर्व स्वागत भी किया था.

अलबर्ट एक्का का जन्म 27 दिसम्बर, 1942 को झारखंड के गुमला जिला के डुमरी ब्लाक के जारी गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम जूलियस एक्का, माँ का नाम मरियम एक्का और पत्नी का नाम बलमदीन एक्का था. उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा सी सी स्कूल पटराटोली से की थी और माध्यमिक परीक्षा भिखमपुर मिडल स्कूल से पास की थी. इनका जन्म स्थल जारी गांव चैनपुर तहसील में पड़ता है. एल्बर्ट की दिली इच्छा भारतीय सेना में जाने की थी, जो दिसंबर 1962 को पूरी हुई.

उन्होंने सेना में बिहार रेजिमेंट से अपना कार्य शुरू किया. बाद में जब 14 गार्ड्स का गठन हुआ, तब एल्बर्ट अपने कुछ साथियों के साथ वहाँ स्थानांतरित कर किए गए. एल्बर्ट एक अच्छे योद्धा तो थे ही, यह हॉकी के भी अच्छे खिलाड़ी थे. भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 में अलबर्ट एक्का वीरता, शौर्य और सैनिक हुनर का प्रदर्शन करते हुए अपने इकाई के सैनिकों की रक्षा की थी. इस अभियान के समय वे काफी घायल हो गये और 3 दिसम्बर 1971 में इस दुनिया से विदा हो गए. भारत सरकार ने इनके बलिदान को देखते हुए मरणोपरांत सैनिकों को दिये जाने वाले उच्चतम सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया था.

एक्का भारत-पाक बॉर्डर पर 1971 की लड़ाई में गोलियां खाते हुए पाक बॉर्डर में घुस गए थे और ग्रेनेड फेंककर दुश्मन के तीन बंकर उन्होंने उड़ा  दिया. इस लड़ाई में दुश्मनों के कैंप में घुसकर अपनी टीम को बचाने वाले एक्का की वीरता को याद करते हुए भारत सरकार ने मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया.

अल्बर्ट ने पाकिस्तानी सेना के तीन बंकर ध्वस्त कर दिए: 

1971 में पाक के नापाक इरादों ने एकाएक जंग की शक्ल अख्तियार की. घमासान युद्ध छिड़ गया. अल्बर्ट एक्का (नंबर 22397461/एन.के.) पूर्वी अग्रभाग में गंगा सागर के पास 14 गार्डस के बाईं ओर पूरे जोशो खरोश के साथ दुश्मनों को रौंदते हुए आगे बढ़ रहे थे. इनके लक्ष्य के उत्तरी छोर पर पाक शत्रु दल द्वारा एक दो मंजिला मकान से एक लाइट मशीनगन से लगातार धुंआधार गोलियों की बौछार हो रही थी. लेकिन वो धीरे-धीरे रेंगते हुए दुश्मन के उक्त दो मंजिले मकान तक पहुंचकर एका-एक उक्त बंकर के एक छेद से दुश्मनों पर एक हैंड ग्रेनेड फेंक दिया. हैंड ग्रेनेड फटते ही दुश्मनों के बंकर के अंदर खलबली मच गई. इसमें दुश्मन के कई सैनिक मारे गए। पर उक्त लाइट मशीनगन चलती ही रही जिससे भारतीय सैन्य दल को खतरा बना रहा. अल्बर्ट उक्त बंकर में घुसकर दुश्मन के पास पहुंचे और अपने बंदूक के बायनेट से वार कर दुश्मन सैनिक को मौत के घाट उतार दिया. इससे दुश्मन एवं उसके लाइट मशीनगन की आवाज एक साथ बंद हो गई. मगर इस दौरान गंभीर रूप से घायल होने के कारण कुछ ही पलों में अल्बर्ट एक्का शहीद हो गए.

छोटानागपुर के आदिवासी इलाकों में कई परिवारों में लोग अपने बच्चों के नाम बड़े गर्व के साथ बिरसा मुंडा, अल्बर्ट एक्का रखते रहे हैं. यह वीर सपूत और योद्धा के प्रति उनके प्रेम और सम्मान को जाहिर करता है. सुदूर इलाकों में पहाड़ों- जंगलों के बीच इन वीरों की गाथा अब भी गीतों में गूंजती है.

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