स्मिता पाटिल: संवेदनशील अभिनेत्री, वक़्त के क्रूर हाथों ने जिसे असमय हमसे छीन लिया

नवीन शर्मा 

स्मिता पाटिल हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिभावान अभिनेत्रियों में से एक हैं. उन्होंने अपनी कई फिल्मों में एक से बढ़कर एक यादगार रोल किए हैं. स्मिता का जन्म 1955 में पुणे में हुआ था.  महज 21 साल की उम्र में उन्हें ‘भूमिका’ फिल्म में अपनी दमदार अदाकारी के लिए पहला नेशनल अवॉर्ड मिला था. भूमिका, मंथन, आक्रोश, चक्र, चिदंबरम, मिर्च मसाला जैसी कई आर्ट फिल्मों से उन्होंने अपनी अहम जगह बनाई. अपने सिर्फ दस साल के करियर में स्मिता ने हिंदी और मराठी की लगभग 80 फिल्मों में काम किया. आर्ट फिल्मों के अलावा उन्होंने शक्ति, नमक हलाल जैसी व्यवसायिक फिल्मों में भी काम किया.

अर्थ में शबाना से कांटे का मुकाबला

मुझे स्मिता की अर्थ फिल्म काफी पसंद है. हालांकि ये फिल्म पूरी तरह शबाना आजमी के इर्द-गिर्द घुमती है लेकिन जिस दमदार तरीके से स्मिता अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं वो शबाना जैसी अभिनेत्री को कड़ी टक्कर देती नजर आती हैं. इस फिल्म में उन्होंने कुछ हद तक मानसिक रोगी को अभिनय किया था.अपने पूरे हावभाव और आवाज से वो वैसी ही नजर आती हैं.

चक्र में लाजवाब अभिनय
1981 में आई चक्र फिल्म में स्मिता का अभिनय जबर्दस्त उंचाइयों को छूता नजर आता है. वे झुग्गी-झुपड़ी की एक गरीब महिला के किरदार को एकदम सहज तरीके से निभातीं हैं. उन महिलाओं के रहन-सहन, बोलचाल और शैली को वो पूरी तरह से आत्मसात कर लेतीं हैं. इस फिल्म में उनके शानदार अभिनय को काफी तारीफ मिली थी. इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था. इससे पहले वो भूमिका में यह पुरस्कार प्राप्त कर चुकी थीं.

बाजार एक नया मुकाम
स्मिता पाटिल की एक और यादगार फिल्म है बाजार इसमें भी वो हैदराबादी महिला के किरदार को जीवंत रूप देती हैं. स्मिता की आवाज में एक अलग तरह की कशिश है.

केतन मेहता की मिर्च मसाला में भी वो महिला सशक्तीकरण के एक यादगार किरदार को निभाती हैं. अपनी इज्जत की रक्षा के लिए वो पुलिस, जमींदार के गठजोड़ के साथ ही पूरे गांव से टकराती हैं. उन्होंने अपने दमदार अभिनय से नसीरउद्दीन शाह और ओम पुरी को कड़ी टक्कर दी है.

मंडी और अर्द्धसत्य में हालांकि उनका रोल छोटा था पर उसे भी वो पूरी शिद्दत से निभातीं हैं.
अंतिम फिल्म वारिस
उन्होंने अपनी अंतिम फिल्मों में से एक वारिस में भी अच्छा काम किया है. कुल मिला कर देखा जाए तो आर्ट फिल्मों में हमें शबाना और स्मिता के बीच जबर्दस्त मुकाबला नजर आता है.

सिर्फ 31 साल का सफरनामा
स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्तूबर 1955 को पुणे (महाराष्ट्र) के राजनीतिज्ञ शिवाजीराव गिरधर पाटिल और सामाजिक कार्यकर्ता विद्याताई पाटिल के यहाँ कुनबी मराठा परिवार में हुआ था. उन्होंने पुणे के रेणुका स्वरुप मेमोरियल हाई स्कूल से पढाई पूरी की. उन्होंने 1970 के दशक में वो मुंबई दूरदर्शन पर बतौर न्यूज़रीडर के रूप में काम करती थी. वो एक अच्छी फोटोग्राफर थी. स्मिता पाटिल पुणे के फ़िल्म और टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया की भी छात्रा रह चुकी थी.

 

न्यूज शो ऑन एयर होने से कुछ ही मिनट पहले स्मिता जींस पर फटाफट साड़ी बांध लेती थीं. उनके न्यूज शो को देखकर ही उन्हें फिल्मों में ब्रेक मिला. फिल्ममेकर श्याम बेनेगल ने उन्हें फिल्म ‘चरणदास चोर’ में कास्ट किया. जिस वक्त उन्हें फिल्मों में ब्रेक मिला, उस वक्त स्मिता एंकरिंग के साथ-साथ बेहतरीन फोटोग्राफर भी बन चुकी थीं.

उनकी ज्यादातर फिल्मो में वे एक मजबूत महिला की भूमिका में नजर आती हैं. इस तरह की उनकी भूमिकाओं ने उन्हें फ़िल्म जगत में एक अलग पहचान दी. एक अभिनेत्री के अलावा वो सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी एक्टिव थी और महिलाओ से जुड़े मुद्दे उठाती थी.

करियर के एक अहम मुकाम पर पहुंचने के बाद स्मिता की जिंदगी में प्यार ने दस्तक दी और उन्हें अभिनेता राज बब्बर से प्यार हो गया. राज बब्बर उस वक्त शादीशुदा थे. राज बब्बर भी स्मिता से बेहद प्यार करने लगे थे. लिव इन रिलेशन में रहने के लिए स्मिता की काफी आलोचना हुई. पर स्मिता और राज बब्बर ने इसकी परवाह नहीं की. दोनों के एक बेटा भी हुआ प्रतीक बब्बर.  वह प्रतीक को जन्म देने के कुछ ही घंटों के भीतर चल बसीं. 13 दिसंबर 1986  का वो मनहूस दिन था. महज़ 31 साल की उम्र में वक़्त के क्रूर पंजों ने स्मिता को हमसे छीन लिया.

स्मिता की मौत के बाद उनका सुहागिनों की तरह मेकअप किया गया था और लिबास भी ऐसे ही पहनाए गए. उनके पार्थिव शरीर का मेकअप करने वाले मेकअप आर्टिस्ट दीपक सावंत ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कैसे स्मिता ने मौत से पहले ही यह इच्छा जाहिर की थी कि वह जब मर जाएं तो उन्हें सुहागन की तरह तैयार किया जाए.

स्मिता पाटिल को मिले हुए पुरस्कार

साल 1977 में उन्हें फिल्म ‘भूमिका’ के लिए नैशनल अवॉर्ड मिला, वहीं साल 1980 में फिल्म ‘चक्र’ ने उन्हें यह अवॉर्ड दिलाया। साल 1985 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया.

फिल्मफेयर पुरस्कार : 1982, चक्र;
पद्म श्री पुरस्कार (1985)

स्मिता की मौत के बाद 14 फिल्में रिलीज हुईं थीं. उनकी आखिरी फिल्म ‘गलियों का बादशाह’ थी. स्मिता पाटिल के नाम पर फिल्मी दुनिया में ‘स्मिता पाटिल अवॉर्ड’ दिया जाता है. आज तक स्मिता की कमी खलती है.

#SmitaPatil


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