सिर्फ बड़ी कंपनियों में नौकरियां बढीं; छोटी कंपनियों में छटनी जारी है

एक हाल के अध्ययन से मिली जानकारी के मुताबिक लगातार दूसरे साल छोटी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की संख्या कम की है, जबकि बड़ी कंपनियों में नौकरियां बढ़ी हैं. जिन 1,610 कंपनियों का अध्ययन किया गया है, उनमें 2017-18 में नौकरियों में बढ़ोतरी 3.8 प्रतिशत रही, जो 2016-17 की 4.2 प्रतिशत वृद्धि दर से कम है, लेकिन 2015-16 के 2.5 प्रतिशत की तुलना में ज्यादा है. कंपनियों के वेतन के बिल में बढ़ोतरी पिछले 3 साल से 8 से 8.5 प्रतिशत पर स्थिर है.

बहरहाल प्रति कर्मचारी वेतन में बढ़ोतरी सुस्त होती जा रही है. 2017-18 में वेतन में बढ़ोतरी 4.3 प्रतिशत रही जो 2016-17 में 4.8 प्रतिशत और 2015-16 में 5.8 प्रतिशत रही है.

केयर रेटिंग द्वारा कॉर्पोरेट क्षेत्र में रोजगार पर जारी रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आए हैं. केयर रेटिंग ने 1,610 भारतीय कंपनियों की सालाना रिपोर्ट के विश्लेषण के माध्यम से रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें सभी प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं. कॉर्पोरेट क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली 12,000 कंपनियों की कुल बिक्री में इन कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत है.

आर्थिक क्षेत्रों में देखें तो खुदरा व वित्तीय सेवाओं में रोजगार में दो अंकों की वृद्धि दर करीब 13 प्रतिशत रही, जबकि निर्माण एवं बुनियादी ढांचे में नौकरियों में 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जो 3.8 प्रतिशत के औसत से ज्यादा है. दूरसंचार क्षेत्र में नौकरियां 7.6 प्रतिशत कम हुई, लेकिन रिलायंस जियो के आंकड़ों को इससे बाहर रखा गया है, दूरसंचार क्षेत्र में उसकी आगाज हुई है.

सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्रों में कच्चा तेल उद्योग है, जिनमें रिफाइनरी और तेल विपणन कंपनियां जैसे आईओसीएल और एचपीसीएल शामिल हैं.

छोटी कंपनियों की हालत खराब 

1,610 कंपनियों में से 705 या 40 प्रतिशत से ज्यादा कंपनियों में नौकरियों का टोटा रहा.  नोटबंदी की वजह से सुस्ती झेल रही छोटी कंपनियों पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने का नकारात्मक असर नजर आ रहा है.

केयर रेटिंग में मुख्य अर्थशास्त्री और इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक मदन सबनवीस ने कहा, ‘नोटबंदी के समय छोटे और मझोले कारोबारी नोटबंदी और जीएसटी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं.’ पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री प्रणव सेन का कहना है कि नकदी के संकट का सबसे खराब असर छोटी कंपनियों पर होता है.  इस सर्वे में सिर्फ स्थायी नौकरियों को शामिल किया गया है. ठेके पर श्रमिकों की संख्या मं धीरे धीरे बढ़ोतरी हो रही है, जिन्हें इस अध्ययन में शामिल नहीं किया गया है.

कृषि, शिक्षा, आभूषण क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित 

कंपनी की बिक्री से उसमें रोजगार पाने वालों की संख्या का पता चलता है. शिक्षा ऐसा क्षेत्र है, जहां ऋणात्मक वृद्धि दर रही. आभूषण, कृषि, आतिथ्य सत्कार क्षेत्रों में भी ऋणात्मक वृद्धि रही. इस तरह से इन क्षेत्रों में नौकरियों की वृद्धि भी ऋणात्मक रही.


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