सामाजिक कुरीतियों को विदा किए वगैर विकसित भारत का सपना अधूरा: वशिष्ठ नारायण सिंह

वशिष्ठ नारायण सिंह 

यह बात सही है कि इन दिनों देश के भीतर विकास को लेकर एक नई चेतना दिखाई पड़ रही है. लेकिन यह बात भी उतना ही सच है कि विकसित भारत का सपना केवल भौतिक विकास के जरिये हासिल नहीं किया जा सकता है.

विकसित राष्ट्र की निर्मिति के लिए हमें सामाजिक स्तर पर भी विकसित और सुदृढ़ बनना पड़ेगा. वर्षों से जड़ पड़ी सामाजिक कुरीतियों को विदा किए बगैर हमारे यहाँ विकास की हर अवधारणा अधूरी ही रहेगी और समय समय पर इसकी अतार्किक व्याख्या भी होती रहेगी.

आज भी हम उसी समाज में रह रहे हैं,जहाँ बेटियों को बोझ माना जा रहा है. सामाजिक कुरीतियाँ व मानसिक जड़ता इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है. ऐसा नहीं है कि इन कुरीतियों के खिलाफ अब तक आवाज नहीं उठी है,लेकिन हर आवाज विवशता की भेंट ही चढ़ती रही है.

राजनीति का कार्य सामाजिक संरचनाओं का परिमार्जन भी है.  उसका हर अंतिम मकसद नागरिकों की ज़िम्मेदारी है. हमने शराबबंदी के जरिये एक लक्ष्य हासिल कर लिया है. हमें इस मुहिम में व्यापक सफलता भी मिल चुकी है. इस समय हमने बालविवाह और दहेज के खिलाफ मुहिम छेड़ रखा है और यह तय मानिए कि हमें यहाँ भी सफलता हासिल होगी.

यह सच है कि हमारी संस्कृति ने अबतक कई रीतियों के साथ कई कुरीतियों को भी ढ़ोया है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB )के मुताबिक भारत में हर घंटे में दहेज के कारण एक बेटी को मार दिया जाता है. 2007 से 2011 ई के बीच इस आंकड़े में भारी बढ़ोतरी देखी गई है. एक आँकड़ा एक डरावने सच की पेशगी भर है. दहेज के कारण ही आज पढ़ी लिखी युवतियों को भी परिवार बोझ मानता है.  कई अवसरों पर तो यह देखा गया है कि परिवार के दर्द को न सह पाने के कारण भी बेटियाँ आत्महत्या कर लेती हैं. दहेज के खातिर ही अनमेल विवाह भी हमारे ही समाज में होता होता है, जिसके परिणाम में एक ओर जहाँ बेटी की जिंदगी तबाह होती है, वहीं दूसरी तरफ भोगवादी मानसिकता को शह मिलती है. भविष्य में दहेज से बचने के खातिर ही भ्रूण-हत्या को अंजाम दिया जाता है.

बाल-विवाह भी हमारे समाज के ऊपर एक कलंक ही है. भारत की कई संस्कृतियाँ इसे आज भी ढो रहीं हैं.  बाल विवाह के कारण बेटियाँ असमय गर्भधारण करती हैं और बदले में उसको कई भीषण बीमारियों से भी जूझना पड़ता है. बालविवाह को रोकने के लिए इतिहास में कई लोग आगे आये जिनमें सबसे प्रमुख राजाराम मोहन राय, केशबचन्द्र सेन जिन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा एक बिल पास करवाया जिसे Special Marriage Act कहा जाता है इसके अंतर्गत शादी के लिए लडको की उम्र 18 वर्ष एवं लडकियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गयी एवं इसे प्रतिबंधित कर दिया गया.  फिर भी सुधार न आने पर बाद में Child Marriage Restraint नामक बिल पास किया गया.  इसमें लडको की उम्र बढाकर 21 वर्ष और लडकियों की उम्र बढाकर 18 वर्ष कर दी गयी. स्वतंत्र भारत में भी सरकार द्वारा भी इसे रोकने के कही प्रयत्न किये गए और कही क़ानून बनाये गए जिस से कुछ हद तक इनमे सुधार आया परन्तु ये पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ.  सरकार द्वारा कुछ क़ानून बनाये गए हैं जैसे बाल-विवाह निषेध अधिनियम 2006 जो अस्तित्व में हैं.  ये अधिनियम बाल विवाह को आंशिक रुप से सीमित करने के स्थान पर इसे सख्ती से प्रतिबंधित करता है.  इस कानून के अन्तर्गत, बच्चे अपनी इच्छा से वयस्क होने के दो साल के अन्दर अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकते है.  बाबजूद इसके सब कुछ हो रहा है. कारण हमारे समाज की जड़वादी मानसिकता है.

आज समाज के सबसे निचले पायदान पर गुजरबसर करने वालों में भी शिक्षा की अलख जगी है.  अभी हाल ही में मुझे ज्ञात हुआ है कि कचरा चुनने वाले समूहों से भी कई प्रतिभाशाली बच्चे सामने आए हैं.  सबके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है. सामाजिक रूढ़िवादिता और कुरीतियों को उखाड़े बिना हम अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते हैं.

हमारी कोशिश है कि सामाजिक सुधार के मुद्दे भी राजनीतिक एजेंडे का विषय बने. राष्ट्रीय स्तर पर इन कुरीतियों के खिलाफ मुहिम चले. जब तक हम सामाजिक स्तर पर पिछड़े रहेंगे तब तक हमारा समर्थ और विकसित भारत का सपना अधूरा होगा.

साभार: दादा के फेसबुक वाल से


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.