शक्तिपीठ कामाख्या मंदिर, जहाँ पीरियड का उत्सव ” अंबुबाची पर्व” मनाया जाता है

गुवाहाटी: पूर्वोत्तर भारत में एक मंदिर ऐसा है, जहां देवी की योनि की पूजा की जाती है  और साल में एक बार उन्हें होने वाले पीरियड पर बहुत बड़ा पर्व मनाया जाता है. गुवाहाटी शहर में कामाख्या मंदिर नीलाचल के पहाड़ों पर बना है. कामाख्या एक ऐसा मंदिर है जिसके गर्भगृह में मूर्ति नहीं, एक पत्थर की पूजा होती है, जिसे देवी की योनि माना जाता है.

असम में 22 जून से अंबुबाची पर्व शुरू होता  है और ये अगले चार दिन यानी 25 जून तक चलता है. देश भर से भक्त मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं. उस दौरान सिटी का ट्रैफिक थम जाता है  और सभी लोग इस फेस्टिवल को धार्मिक और पवित्र ज़ज्बे के साथ मनाते हैं.

कौन हैं माँ कामाख्या?

कामाख्या को ‘सती’ (जो कि भगवान शिव की पत्नी थीं) का एक अवतार माना जाता है. सती की मृत्यु के बाद, शिव ने तांडव नृत्य शुरू कर दिया था. उन्हें उस अवस्था से निकालने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के टुकड़े टुकड़े कर डाले.  कुल 51 टुकड़े धरती पर जहां जहां गिरे, उन्हें “शक्तिपीठ” का नाम दिया गया. इन्ही में एक शक्तिपीठ  देवी कामाख्या मंदिर की जगह है.

इस  मंदिर का निर्माण  1565 में नर-नारायण ने बनवाया था. अपने बनने के साथ ही ये मंदिर अंबुबाची मेले से जुड़ गया था. मंदिर के गर्भगृह में देवी की मूर्ति नहीं है. उनकी पूजा की जाती है एक पत्थर के रूप में जो एक योनि के आकार का है और जिसमें से पानी निकलता है.

कालिका पुराण के अनुसार देवी को कामाख्या इसलिए कहा जाता है क्योंकि वो यहां अपनी शारीरिक कामनाओं को पूरा करने आईं थीं. किवदंतियों के मुताबिक एक दिन कोच वंश के राजा नरनारायण को मालूम पड़ा कि देवी कामाख्या मंदिर में अवतरित हुई हैं. उनके पीरियड्स चल रहे हैं और वो योनि से खून बहाते हुए नग्न अवस्था में मंदिर में नृत्य कर रही हैं. राजा ने मंदिर के पुजारी को निर्देश दिए कि वो देवी को नाचते हुए देखना चाहता है. पुजारी ने राजा को चेताया कि ऐसा कर उसे देवी के क्रोध का भागी बनना पड़ सकता है. पर राजा ने सुना नहीं और मंदिर की दीवार की दरार से झांककर देवी को नाचते हुए देखने लगा. देवी ने उसे देख लिया और श्राप दिया कि अगर उसने आगे से कभी इस मंदिर में कदम रखा, तो उसका पूरा परिवार नष्ट हो जाएगा. राजा को बहुत दुख हुआ. अपराधबोध से भरे राजा ने अपने राज्य की सभी औरतों को ये निर्देश दिए कि माहवारी यानी पीरियड्स के समय वो घर के अंदर ही रहेंगी, ताकि कोई उन्हें देखे नहीं.

अंबुबाची का पर्व ‘अहार’ (जिसे आषाढ़ कहते हैं) के महीने में आता है. आषाढ़ जून-जुलाई में आता है. जबसे कामाख्या मंदिर बना है, हर साल ये पर्व मनाया जाता है. महीने के आखिरी चार दिनों में ये मेला लगता है. ऐसा कहा जाता है कि ये वो चार दिन वो होते हैं, जब कामाख्या देवी को पीरियड आते हैं. मंदिर के दरवाज़े बंद रहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान मंदिर के अंदर बने हुए एक छोटे से तालाब का पानी लाल रंग में बदल जाता है. प्रसाद के तौर पर देवी का निकलने वाला पानी या फिर अंगवस्त्र (लाल कपड़ा, जिससे देवी की योनि को ढका जाता है) मिलता है. लोग ऐसा मानते हैं कि इस प्रसाद में औरतों में होने वाली पीरियड से समस्याओं को ठीक करने और उन्हें ‘बांझपन’ से मुक्त करने की ताकत होती है.

इस पर्व में हिस्सा लेने देश भर से लोग आते हैं:

नागा साधुओं से लेकर अघोरी तक आम भक्त. असम राज्य के और हिस्सों से और भारत के कोने कोने से लोग देवी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने आते हैं.

असम में जब किसी लड़की को पहली बार पीरियड होता है, उसे सैकड़ों नियम मानने पड़ते हैं. पुरुषों से बात करने की छूट नहीं होती, फिर भले ही वो परिवार के सदस्य ही क्यों न हों. एक पंडित आता है. वो लड़की के पीरियड होने का समय देखकर बताता है कि लड़की को कितने दिनों का उपवास रखना होगा. ये उपवास 7 दिनों से लेकर 3 महीने तक का भी हो सकता है. पंडित के मुताबिक़ ये सब तारे, ग्रह-नक्षत्र तय करते हैं. ये संघर्ष एक नकली शादी के साथ ख़त्म होता है, जिसे ‘तुलोनी बिया’ कहते हैं. पर्व का मकसद इस बात को मनाना होता है कि अब लड़की गर्भवती होने के लायक हो गई है.

अंबूबाची के दौरान भक्तों को देवी की योनि के ‘अंगढक’ या ‘अंगवस्त्र’ का टुकड़ा दिया जाता है. मान्यता है कि इससे पीरियड से जुड़ी दिक्कतें ठीक हो जाएंगी और औरतों का ‘बांझपन’ मिट जाएगा. लोग इस अंगवस्त्र के टुकड़े को तावीज में बांधकर पहनते हैं.

असम में अगर किसी औरत को उसी समय पीरियड हो रहे हैं, जिस समय अंबूबाची मेला चल रहा हो, तो उसे वही रस्में फिर से निभानी पड़ती हैं, जो उसने पहली बार पीरियड होने पर निभाई थीं. पीरियड की ख़ुशी मनाने वाले इस पर्व में वे औरतें नहीं आ पाती हैं, जिनके पीरियड चल रहे हों. क्योंकि इन दिनों में औरतें मंदिर नहीं जातीं. असमिया बोली में पीरियड के लिए प्रयोग होने वाला शब्द है ‘सुआ लोगा’, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘अछूत’ है.

 


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