कामाख्या मंदिर के बाद दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ रजरप्पा का मां छिन्नमस्तिके मंदिर

झारखण्ड में राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर जंगलों में स्थित माँ छिन्नमस्तिके मंदिर की महिला निराली है. माँ काली को समर्पित, तंत्र साधना का महान केंद्र है ये मंदिर. अमावस्या  के दिन रजरप्पा में तंत्र-मंत्र की देवी महामाया मां काली की पूजा का विशेष महत्व है. मां छिन्नमस्तिके व मां काली दोनों एक ही कुल की  हैं. इस कारण रजरप्पा में काली पूजा खास होती है.  यह स्थान अमावस्या की  रात में मंत्र सिद्धि के लिए उपयुक्त माना जाता है. रजरप्पा मंदिर जंगलों से घिरा हुआ है. एकांत वास में साधक तंत्र-मंत्र की सिद्धि  के लिए यहां जुटते हैं.  तंत्र साधना के लिए असम के  कामाख्या मंदिर के बाद दूसरा स्थान रजरप्पा के मां छिन्नमस्तिके मंदिर का आता है. इस दिन निशा रात्रि में मां का पूजन हवन करने से  मनोकामना पूर्ण होती है. काली पूजा अमावस्या के दिन राज्य  के अलावा बिहार, बंगाल, ओड़िशा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों से श्रद्धालु व साधक रजरप्पा मंदिर पहुँचते हैं.
झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है. 
रजरप्पा का यह सिद्धपीठ केवल एक मंदिर के लिए ही विख्यात नहीं है.  छिन्नमस्तिके मंदिर के अलावा यहां महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दस महाविद्या मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंग बली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर के नाम से कुल 7 मंदिर हैं. पश्चिम दिशा से दामोदर तथा दक्षिण दिशा से कल-कल करती भैरवी नदी का दामोदर में मिलना मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है. दामोदर और भैरवी के संगम स्थल के समीप ही मां छिन्नमस्तिके का मंदिर स्थित है. मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है.
मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है. किसी के अनुसार मंदिर का निर्माण 6,000 वर्ष पहले हुआ था तो कोई इसे महाभारत युग का मानता है. मंदिर में बड़े पैमाने पर विवाह भी संपन्न कराए जाते हैं.
मंदिर में प्रातःकाल 4 बजे माता का दरबार सजना शुरू होता है. भक्तों की भीड़ भी सुबह से पंक्तिबद्ध खड़ी रहती है, खासकर शादी-विवाह, मुंडन-उपनयन के लगन और दशहरे के मौके पर भक्तों की 3-4 किलोमीटर लंबी लाइन लग जाती है. आमतौर पर लोग यहां सुबह आते हैं और दिनभर पूजा-पाठ और मंदिरों के दर्शन करने के बाद शाम होने से पूर्व लौट जाते हैं.
मां छिन्नमस्तिके मंदिर के अंदर स्थित शिलाखंड में मां की 3 आंखें हैं. बायां पांव आगे की ओर बढ़ाए हुए वे कमल पुष्प पर खड़ी हैं. पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं. मां छिन्नमस्तिके का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है. बिखरे और खुले केश, जिह्वा बाहर, आभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में दिव्य रूप में हैं. दाएं हाथ में तलवार तथा बाएं हाथ में अपना ही कटा मस्तक है. इनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं जिन्हें वे रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं. इनके गले से रक्त की 3 धाराएं बह रही हैं.
मंदिर का मुख्य द्वार पूरबमुखी है. मंदिर के सामने बलि का स्थान है. बलि स्थान पर प्रतिदिन औसतन 100-200 बकरों की बलि चढ़ाई जाती है. मंदिर की ओर मुंडन कुंड है.
दामोदर और भैरवी नदी का संगम स्थल भी अत्यंत मनोहारी है. भैरवी नदी स्त्री नदी मानी जाती है जबकि दामोदर पुरुष. संगम स्थल पर भैरवी नदी ऊपर से नीचे की ओर दामोदर नदी के ऊपर गिरती है. कहा जाता है कि जहां भैरवी नदी दामोदर में गिरकर मिलती है उस स्थल की गहराई अब तक किसी को पता नहीं है.
मां छिन्नमस्तिके की महिमा की पौराणिक कथाएं

मां छिन्नमस्तिके की महिमा की कई पुरानी कथाएं प्रचलित हैं. प्राचीनकाल में छोटा नागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे. राजा की पत्नी का नाम रूपमा था. इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा, जो बाद में रजरप्पा हो गया.

राजा की आंखें खुलीं तो वे इधर-उधर भटकने लगे. इस बीच उनकी आंखें स्वप्न में दिखी कन्या से जा मिलीं. वह कन्या जल के भीतर से राजा के सामने प्रकट हुई. उसका रूप अलौकिक था. यह देख राजा भयभीत हो उठे. राजा को देखकर देख वह कन्या कहने लगी- हे राजन, मैं छिन्नमस्तिके देवी हूं. कलियुग के मनुष्य मुझे नहीं जान सके हैं जबकि मैं इस वन में प्राचीनकाल से गुप्त रूप से निवास कर रही हूं. मैं तुम्हें वरदान देती हूं कि आज से ठीक नौवें महीने तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी.
देवी बोली- हे राजन, मिलन स्थल के समीप तुम्हें मेरा एक मंदिर दिखाई देगा. इस मंदिर के अंदर शिलाखंड पर मेरी प्रतिमा अंकित दिखेगी. तुम सुबह मेरी पूजा कर बलि चढ़ाओ. ऐसा कहकर छिन्नमस्तिके अंतर्ध्यान हो गईं. इसके बाद से ही यह पवित्र तीर्थ रजरप्पा के रूप में विख्यात हो गया.
एक अन्य कथा के अनुसार एक बार मां भवानी अपनी दो सहेलियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने आई थीं. स्नान करने के बाद सहेलियों को इतनी तेज भूख लगी कि भूख से बेहाल उनका रंग काला पड़ने लगा. उन्होंने माता से भोजन मांगा. माता ने थोड़ा सब्र करने के लिए कहा, लेकिन वे भूख से तड़पने लगीं. सहेलियों ने माता से कहा, हे माता। जब बच्चों को भूख लगती है तो मां अपने हर काम भूलकर उसे भोजन कराती है. आप ऐसा क्यों नहीं करतीं? यह सुनते ही मां भवानी ने खड्ग से अपना सिर काट दिया, कटा हुआ सिर उनके बाएं हाथ में आ गिरा और खून की तीन धाराएं बह निकलीं. सिर से निकली दो धाराओं को उन्होंने अपनी सहेलियों की ओर बहा दिया. बाकी को खुद पीने लगीं. तभी से मां के इस रूप को छिन्नमस्तिका नाम से पूजा जाने लगा.
 छिन्नमस्तिका मंदिर शक्तिपीठ होने के साथ-साथ पर्यटन का मुख्य केंद्र भी रहा है.  मां के मंदिर में मन्नतें मांगने के लिए लोग लाल धागे में पत्थर बांधकर पेड़ या त्रिशूल में लटकाते हैं. मन्नत पूरी हो जाने पर उन पत्थरों को दामोदर नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है.

यहां मुंडन कुंड पर लोग मुंडन के समय स्नान करते हैं जबकि पापनाशिनी कुंड को रोगमुक्ति प्रदान करनेवाला माना जाता है. सबसे खास दामोदर और भैरवी नदियों पर अलग-अलग बने दो गर्म जल कुंड हैं. नाम के अनुरूप ही इनका पानी गर्म है और मान्यता है कि यहां स्नान करने से चर्मरोग से मुक्ति मिल जाती है.

इसके अलावा दुर्गा मंदिर के सामने भी एक तालाबनुमा कुंड है, जिसे कालीदह के नाम से जाना जाता है.  विराट शिवलिंग छिन्नमस्तिका के मंदिर से सटा शिव का मंदिर है जहां 15 फीट ऊंचा विशाल शिवलिंग पूजा-पाठ के साथ पर्यटकों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र है. मंदिर परिसर में ही 10 महाविद्याओं का मंदिर अष्ट मंदिर के नाम से विख्यात है. यहां काली, तारा, बगलामुखी, भुवनेश्वरी, भैरवी, षोडसी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, मातंगी और कमला की प्रतिमाएं स्थापित हैं. इसके अलावा सूर्य का भव्य मंदिर व दुर्गा मंदिर भी आसपास ही हैं. सफेद संगमरमर से कमल के आकार का बना दुर्गा मंदिर अपनी भव्यता के कारण लोटस टेंपल के नाम से जाना जाता है. यहां देवी दुर्गा के अपराजिता स्वरूप की पूजा होती है. विराट मंदिर में कृष्ण के विराट रूप की पूजा होती है.  इन दोनों मंदिर के बीच लक्ष्मी की आठ प्रतिमाएं- ऐश्वर्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, विजया लक्ष्मी, वीरा लक्ष्मी व जया लक्ष्मी स्थापित हैं. इसके अलावा मनसा, मधुमति, पंचमुखी हनुमान, उतिष्ठ गणपति, भगवान शिव, बटुक भैरव, सोनाकर्षण भैरव आदि देवी-देवताओं के मंदिर भी आसपास ही हैं. बटुक-भैरव मंदिर में अन्य प्रसाद के अलावा मांस-मछली, शराब, सिगरेट आदि का भी भोग लगता है.

रजरप्पा आनेवाले पर्यटक नौका सैर का आनंद लेना नहीं भूलते. मंदिर के नीचे दामोदर-भैरवी संगम के पास नाव की सवारी की सुविधा है. यहां दामोदर और भैरवी को काम और रति का प्रतीक माना गया है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दामोदर को नद माना गया है, जबकि भैरवी को नदी. दोनों नदियां यहां मिलने के बाद भेड़ा नदी के नाम से बहते हुए तेनुघाट डैम पहुंचती हैं.

मंदिर में दीपावली के समय कालीपूजा बड़े धूमधाम से की जाती है. इसके अलावा वैशाख चतुर्दशी को छिन्नमस्तिका जयंती पर भी खास आयोजन होते हैं. नवरात्र के समय भी यहां खास अनुष्ठान और उत्सव होते हैं. अमावस्या, पूर्णिमा व अन्य त्योहारों के मौके पर भी विशेष पूजा होती रहती है. शक्तिपीठ होने की वजह से रजरप्पा तंत्र साधना के लिए भी प्रसिद्ध है. मंदिर से उत्तर की ओर थोड़ी दूरी पर दामोदर नदी के ऊपर तांत्रिक घाट है जहां तांत्रिक तंत्र साधना करते नजर आते हैं.

 


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