पूर्वांचल के प्रभावशाली नेता पूर्व विधायक अब्दुल जलील मस्तान का निधन

कटिहार : कदवा के पूर्व विधायक अब्दुल जलील नहीं रहे. वे विगत कई महीनों से बीमार चल रहे थे. शनिवार की सुबह 6:30 बजे रेडिएंट अस्पताल कटिहार में  उन्होंने अंतिम सांस ली. निधन की खबर फैलते ही समर्थकों में शोक की लहर दौड़ पड़ी. बड़ी संख्या में लोग आजमनगर स्थित उनके आवास पर चाहनेवालों व समर्थकों का पहुंचना शुरू हो गया. आजमनगर दक्षिण टोला स्थित आवास पर उनके अंतिम दर्शन के लिए समर्थकों का तांता लगा है.  .

पूर्व विधायक अब्दुल जलील सीमांचल में मरहूम पूर्व सांसद तस्लीमुद्दीन के बाद सीमांचल का गांधी कहे जानेवाले दूसरे शख्स थे. कटिहार संसदीय क्षेत्र के कदवा विधानसभा क्षेत्र में लोगों ने जलील को ‘हीरो’ की उपाधि दी थी. अब्दुल जलील कदवा विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक रहे. इसके अलावा वह पूर्णिया के अमौर से भी विधायक रहे हैं. जलील लगातार 24 वर्ष तक मुखिया के पद पर भी काबिज रहे. जलील राजनीति की पारी शुरुआत करते हुए पहली बार पूर्णिया जिले के अमौर विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लड़ कर 1985 में विधायक बने. वर्ष इसके बाद वह 1990 में निर्दलीय चुनाव लड़े. कदवा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में भाजपा के भोला राय को करारी शिकस्त देते हुए पहली बार विधायक बने. वहीं, 1995 में सेहत का साथ नहीं मिलने से चुनाव लड़ नहीं पाये थे. फिर वर्ष 2000 के चुनाव में उन्होंने पूर्णिया के अमौर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की थी.   जीतने के बाद राबड़ी देवी के मंत्रिमंडल में उन्हें बतौर राज्यमंत्री शामिल होने का न्योता मिला जिसे मस्तान ने मना कर दिया. राज्यमंत्री का पद उन्हें अपने खिलाफ साजिश लगा. मस्तान 2005 का चुनाव जीते लेकिन फिर 2010 में उनकी हार हुई.

बिहार के आबकारी मंत्री अब्दुल जलील मस्तान को बिहार के बाहर ज्यादातर लोगों ने तब पहचानना शुरू किया जब टेलीविजन पर उनकी एक क्लिप चलने लगी. वीडियो क्लिप में वो जनता से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले को जूते मारने की बात कहते दिखे.

विवादों का मस्तान से बड़ा पुराना नाता है. अब्दुल जलील मस्तान ने 2015 में चुनाव आयोग को जो शपथपत्र दिया था,  उसमें उनकी उम्र 57 साल दर्ज है. वहीं, शपथपत्र कहता है कि मस्तान ने 1963 में मैट्रिक की परीक्षा पास की है. मतलब मस्तान ने 3 वर्ष की आयु मे ही 10वीं की परीक्षा पास कर ली.  साल 2010 में मस्तान को चुनाव में हराने वाले सबा जफ़र ने कहा था, ‘ रौटा थाना क्षेत्र के पटगांव में एक संपन्न किसान के यहां डकैती हुई थी जिसमें मस्तान नामजद अभियुक्त थे’. जफर आरोप लगाते हैं कि, मस्तान इसी मुकदमे से पीछा छुड़ाने के लिए एक स्थानीय वकील की सलाह पर राजनीति में आ गए.’ बाद में मस्तान इस मुकदमे से बरी हो गए. दूसरी तरफ मस्तान दावा करते थे  कि उनके इलाके में 1990 से अभी तक एक भी डकैती की वारदात नहीं हुई है और तो और वो कहते हैं कि लोगों की सुरक्षा के लिए वो 10 हजार जवानों का एक सामानांतर सुरक्षा दल चलाते थे.

मस्तान सामंती मानसिकता से प्रभावित पूर्णिया जिले के अमौर विधानसभा से पहली बार 1985 में निर्दलीय विधायक बने. 1990 में हुए चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में वो शामिल हो गए. भागलपुर दंगों से बुरी तरह घायल कांग्रेस की चुनाव में हार हुई लेकिन मस्तान ने जीत कर सबको चौंका दिया था.

 


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