2019 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार महादलित वर्ग के लिए स्वाभाविक आकर्षण हैं

सागरिका चौधरी

बिहार की लगभग दस करोड़ की आबादी में दलितों की आबादी लगभग 16 प्रतिशत है यानि कि लगभग डेढ़ करोड़. अगर बिहार में दलितों की राजनीति पर नज़र डालें, तो हम पातें हैं कि संविधान में ही उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था थी जिसके चलते राज्य में लम्बे समय तक सत्तारूढ़ दल कांग्रेस को दलित नेताओं को चुनाव में टिकट देना पड़ा. यही कारण है कि बिहार ने सत्तर के दशक में ही भोला पासवान शास्त्री के रूप में बिहार में पहला दलित मुख्यमंत्री देख लिया था. भोला पासवान शास्त्री एक बेहद ईमानदार व्यक्ति थे; और आज भी उनकी इमानदारी की मिसालें दी जाती हैं, पर फिर भी सत्ता के लिए  खींचतान इस कदर थी  कि शास्त्री बहुत दिनों तक मुख्यमंत्री पद पर नहीं रह पाए. ये वो दौर था, जब बिहार से पलायन बदस्तूर जारी था, माओवादी ताकतें बिहार में दलित अस्मिता, खेतिहर मजदूरों के  श्रम के उचित मुआवज़े के लिए खुनी संघर्ष लड़ रहे थे; ऐसे में शास्त्री जी का दौर शीर्ष पर राजनीतिक शसक्तीकरण का एक उदाहरण बन कर रह गया. जमीनी स्थिति बिलकुल विपरीत थी. दलित कमजोर, आर्थिक रूप से अशक्त, सामाजिक रूप से असंगठित, मानसिक रूप से जागरूकता से दूर थे. वे अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे थे. इन ज्वलंत शील मुद्दों पर प्रकाश झा ने एक बेहद मार्मिक फिल्म बनायी है, ‘दामुल’ जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया था.

राजद समर्थकों का अधुरा सच: बोनस को सैलरी बताते हैं:

हालाँकि राजद समर्थक इस बात का पूरा प्रचार करते हैं कि लालू यादव के सत्ता में आने के बाद दलितों का सशक्तिकरण हुआ और वे अब सर उठा कर चलने लगे, खटिया पर बैठने लगे, बोलने और बतियाने लगे, उनकी औरतों की इज्ज़त पर सामंती ताकतें जब तब हमला बोलने से हिचकने लगीं. पर ये दावा अधूरा सच है. अगर हम बिहार के इतिहास का अध्ययन करें, तो दलितों की अस्मिता की लड़ाई कई स्तर पर लड़ी गयी, जिसमे नक्सली आन्दोलन की महत्वपूर्ण भूमिका है. 90 के दशक में जातिगत हिंसा चरम पर थी, और राजद पर आरोप लगे कि उसने  सामंती सेना रणवीर सेना का दोहन और पोषण अपने राजनीतिक हितों के लिए किया. दलितों के खिलाफ अमानवीय अत्याचार के खिलाफ पुलिसिया जांच पूरी ताकत से नहीं किया गया, अदालतों में केस लम्बे चले, और नतीजा अपराधी बेगुनाह साबित करके जेल से छोड़ दिए गये. कम्युनिस्ट ताकतों के अलावा दलितों में शिक्षा का प्रचार प्रसार, बाहरी दुनिया की हवा का असर, गांधीवादी लोगों की भूमिका, सामाजिक आंदोलनों का सकारात्मक रोल आदि अन्य कारण थे, कि दलितों में जाग्रति आई.

2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता के जरिये दलितों के सशक्तिकरण का अनूठा प्रयोग शुरू किया:

2005 से नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद से एक परिवर्तन आया और कई प्रयोग शुरू हुए. नीतीश कुमार ने जाति की राजनीति से ऊपर उठते हुए पुरे समाज का नेतृत्व करने के नज़रिए से “सामाजिक न्याय के साथ विकास” का नारा दिया. उद्देश्य स्पष्ट था कि बरसों से आर्थिक ठहराव में जकड़े बिहार को बाहर निकाला जाये.  साथ ही ये भी सुनिश्चित किया जाए कि विकास की दौर में समाज का अंतिम तबका पीछे न छूट जाए और उनकी भी भागीदारी सुनिश्चित हो सके. अब अस्मिता की लड़ाई को एक पायदान ऊपर ले जाने की जरुरत थी. जरुरी था कि दलित न केवल समाज की मुख्यधारा में आयें, बल्कि उनका आर्थिक सशक्तिकरण भी हो.

2005 से दलितों और महादलितों के लिए उन्होंने अनेकानेक कार्यक्रम लाये.  महादलितों का अलग वर्ग बनाया गया. क्योंकि पाया गया कि पुरे दलित समाज को राजनीतिक, आर्थिक पहल का लाभ नहीं मिल रहा था. मांझी अभी भी चूहा पकड़ कर ही खा रहे हैं, और कुछ लोग दलितों में नव्समंत हो गये हैं. ऐसे में वे इन नव सामंतों के वोट बैंक बन कर रह गये हैं. 22 जातियों को महादलित का दर्जा दिया गया. महादलित विकास मिशन की स्थापना की गयी. महादलितों को पहचान मिली और उन पर पहली बार शासन, मीडिया सब का ध्यान गया. पहली बार सच कहिये तो लोगों को पता चला कि भुइयां, डोम, हलालखोर, मुसहर, जैसी जातियों को पासवान से परे अवसर उपलब्ध होने चाहिए. जो काम सरकार ने किया. उनके विकास के लिए महादलित विकास मिशन की शुरुआत की. फिर तो विकास  योजनाओं की झड़ी सी लग गयी. सच कहिये तो आज़ादी के समय से आजतक किसी मुख्यमंत्री ने महादलितों के विकास पर इतना ध्यान नहीं दिया था.

आंकड़ें खुद गवाह हैं:

इस सम्बन्ध में कुछ आंकड़ों पर गौर करना प्रासंगिक होगा. महादलित टोलों में अब तक 3270 सामुदायिक भवन का निर्माण किया जा चुका है. वर्तमान में राज्य भर में 9532 विकास मित्र कार्यरत हैं, जो सरकार और महादलित परिवार के बीच  सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए एक कड़ी का काम कर रहे हैं. महादलित रेडियो योजना पर 67.9 करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके हैं और इसके तहत अब तक 17 लाख से अधिक महादलित परिवारों को रेडियो उपलभ्द करवाया जा चुका है. दशरथ मांझी कौशल विकास योजना के अंतर्गत 2015-16 तक कुल 2,19,971 महादलित युवकों को विभिन्न ट्रेडों में प्रशिक्षण दिया जा चुका है. अब तक 3,20,524 वास रहित महादलित परिवारों को 8,718 एकड़ वासभूमि उपलब्ध करवाई गयी है. महादलित शौचालय निर्माण योजना ने महादलित परिवारों को डिग्निटी की लाइफ दी है. महादलितों पर अत्याचार के मामले निपटाने के लिए “सहायता” कॉल सेंटर की स्थापना की गयी है. अब तक 1 लाख से ज्यादा लोगों को सहायता उपलब्ध करवाई गयी है.

टोला सेवक और शिक्षा स्वयं सेवी के द्वारा अबतक 26,25,768 बच्चों का नामांकन विद्यालय में कराने एक साथ-साथ 30.53 लाख महादलित, दलित और अति पिछड़ा तथा 12.51 लाख अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को साक्षर बनाया गया है. इतना ही नहीं, प्रतियोगिता परीक्षाओं में तयारी के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोले गए हैं. पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने ग्रामीण समाज का चेहरा बदला है. अपने पंचायतों के विकास के बारे में आज वे महिलाएं फैसले ले रही हैं, जो कभी खेती मजदूरी और बेगारी के अलावा कोई और तरिका नहीं जानती थीं पेट पालने के लिए. आज सुबह सुबह गावों की ओर निकल जाईये, कतार से लडकियां साइकिल चलाती स्कूल जा रही हैं. ये दृश्य आज भी भारत के किसी राज्य में देखने को नहीं मिलेंगे. कहने की जरुरत नहीं कि शिक्षित लड़कियां भविष्य में सशक्त परिवार की रीढ़ की हड्डी बनेंगी. बिहार जैसे सामंती समाज में ये क्रांतिकारी बदलाव हैं. समाज मौन क्रांति की ओर अग्रसर है.

शिक्षा के क्षेत्र में, और प्रशासनिक सेवा में दलितों, महादलितों की भागेदारी बढाने के लिए नीतीश कुमार ने कोचिंग सेंटर स्थापित किये. प्रेलिम्स पास करने पर स्कालरशिप देने की घोषणा की. इससे महादलितों में एक सकारात्मक सन्देश गया है. वे अब खुद को सिर्फ वोट बैंक नहीं समझते. वे जानते हैं कि जब राजनीतिक दल का चुनाव से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है, तब भी उनकी बेहतरी के लिए राज्य लगा हुआ है.

शराबबंदी खुद बिहार की महिलाओं की मांग रही है: 

नीतीश कुमार ने महिलाओं की मांग पर पुरे बिहार में शराबबंदी लागू किया. कई कठिनाईयां आयीं. शराब माफिया ने कई तरह से प्रेशर बनाने की कोशिश की, पर नीतीश कुमार अपने निर्णय पर अटल रहे. आज पुरे बिहार से सफलता की कहानियां सामने आ रही हैं, अपराधियों के मनोबल टूटे हैं और कोई भी खुलेआम शराब पीने की हिम्मत नहीं कर सकता. ऐसे में दलित परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई, कपडे और भोजन पर पैसे खर्च करने की हिम्मत जुटा पा रहा है.

2019 का चुनाव नजदीक है: 

2019 का लोक सभा चुनाव नजदीक है. सीट शेयरिंग का मामला लगभग तय हो चुका है. दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और जदयू राष्ट्रीय अध्यक्ष की बैठक में तय हो गया है कि जदयू और भाजपा 17-17 सीटों पर लड़ेंगे और बाकी सीटों पर लोजपा और रालोसपा. ये एक तरफ जदयू के राजनीतिक कद की ओर इशारा कर रहा है, वही दूसरी ओर लोजपा और रालोसपा को संकेत है कि अपनी राजनीतिक कद को पहचानें और स्थिति को स्वीकार करें.  राम बिलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का लगभग 4 प्रतिशत पासवान वोट के ऊपर  एकाधिकार सा है. NDA को उसका लाभ मिलेगा. जीतन राम मांझी महत्वाकांक्षा के शिकार होकर जदयू छोड़ गए, पर उनकी विश्वसनीयता को ठेंस पहुंची है. वे खुद मखदुमपुर से विधान सभा चुनाव हार चुके हैं. उनके अनर्गल बयानबाजी ने न केवल उन्हें हास्य का पात्र बनाया है, बल्कि मुख्यमंत्री पद पर बैठने के चलते एक ऐतिहासिक मौका मिला था, उन्होंने व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा में उसे भी गंवाया है. राजद ने श्री मांझी से काफी उम्मीदें लगा रखी हैं, पर वे उम्मीदें सही नहीं हैं. लोक सभा चुनाव में महादलित वोटर जागरूक हो चले हैं. वे काम देखते हैं, न कि हवा हवाई वायदे.  पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी, जदयू नेता श्याम रजक, महेश्वर हजारी आदि नेताओं के सहयोग से जदयू के पास दलित, महादलित नेतृत्व सशक्त रूप में उपलब्ध है. राज्य भर में जदयू महादलित सम्मलेन करवा रही है. लोगों से बातचीत चल रही है. और एक सन्देश दिया जा रहा है कि पार्टी उनके साथ हर घड़ी खड़ी है.

और सबसे बड़ी बात महादलितों में इस बात का भरोसा कि नीतीश कुमार के रहते राज्य में कानून व्यवस्था बनी रहेगी और विकास योजनाओं को तेज गति से लागू किया जाता रहेगा, महादलितों को स्वाभाविक रूप से नीतीश कुमार और जदयू की ओर खिंच कर लाता है.

 


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