महिलाएं अपने वोट का फैसला खुद कर सकती हैं, ये अब तक किसी राजनीतिक दल ने नहीं माना था

सागरिका चौधरी 

अमूमन राजनीति में ऐसा होता नहीं. राजनीति का सामान्य अर्थ सत्ता पाने की जुगत में लगे रहना होता है. पर बिहार में नए नए प्रयोग हो रहे हैं, राजनीति के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाना. राजनीति और समाज का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है. जिस समाज से राजनीति उपजती है और सत्ता प्राप्ति का माध्यम बनती है, तो ऐसे में समाज के लिए कुछ करने की प्रतिबद्धता से हम मुंह मोड़ नहीं सकते.

जदयू  की समाज सुधार वाहिनी 24-26 नवंबर के बीच 38 जिलों में महिला समागम का आयोजन करेगी. इसके लिए 12 टीमों का गठन किया गया. मै खूद भारती मेहता के साथ इस मिशन में लगी हुई हूँ. महिला समागम में सुशासन के कार्यक्रम, शराबबंदी, दहेज प्रथा, बालविवाह, भ्रूण-हत्या उन्मूलन, सात निश्चय, महिलाओं को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं पर चर्चा होगी. आरसीपी सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सरकार ने आधी आबादी के लिए जितने युगांतरकारी कार्य किए हैं, उसे घर-घर पहुंचाने का जिम्मा महिला समागम का होगा. महिला समागम के जरिए शराबबंदी, दहेजबंदी, बाल-विवाहबंदी और कन्या-सुरक्षा जैसे सामाजिक सरोकार से जुड़े अभियानों की शत-प्रतिशत सफलता सुनिश्चित किया जाएगा.

जदयू के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व मंत्री श्याम रजक ने कहा कि समाज की कुरीतियों को दूर करने के साथ-साथ राजनीति में व्याप्त गंदगी को भी दूर करना होगा, तभी हम पूरी तरह सफल होंगे.

महिला आधी आबादी है, पर जदयू से पहले किसी दल ने महिलाओं पर फोकस नहीं किया था. महिलाएं क्या सोचटी हैं, उनके मुद्दे क्या हैं, तमाम चीजें पर्दें के पीछे थीं, महिलाओं की तरह. ये मान लिया गया था कि घर में फैसला पुरुष करते हैं किसे वोट करना है, वोटिंग के लिए कब जाना है, कब बूथ से लौटना है. तमाम चीजें. महिलाएं तो कहीं थी ही नहीं. किसी भी पार्टी का इलेक्शन मनिफेस्तो उठा कर देख लीजिये, महिलाएं वहां से भी गायब हैं.

पर चीजें बदली हैं. और अब अपना असर भी दिखा रही हैं. जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का विजन और सुलझी हुई सोच का नतीजा है ये. वे अपने विचार और व्यवहार दोनों में लोहियावादी रहे हैं. लोहिया की चिंतन की स्पस्ट छाप उनके भाषणों में दिखती है. लोहिया ने एक बार नेहरु से कहा था: “आप देश भर में महिलाओं के लिए शौचालय बना दीजिये; मै आपका विरोध हमेशा के लिए छोड़ दूंगा.”

आंकड़ों की नज़र से:

वर्ष 2006 से पंचायती राज संस्थानों और वर्ष 2007 से नगर निकायों के निर्वाचन में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है. प्राथमिक शिक्षक नियोजन में 50 प्रतिशत स्थान महिलाओं के लिए अरक्षित है. राज्य में पहली बार महिला बटालियन का गठन किया गया है. राज्य के सभी 40 पुलिस जिलों और 4 रेल पुलिस जिलों में एक-एक महिला थाना की स्थापना की गयी है.

राज्य में अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए स्वाभिमान बटालियन का गठन किया गया है. पुलिस बल में सिपाही से अवर निरीक्षक तक के पदों पर सीधी नियुक्ति में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गयी है. अब तक पुलिस बल में अनुशंसित 12,360 पदों के विरुद्ध कुल 3701 महिलाओं की नियुक्ति हुई है, जिसमे 3672 महिला सिपाही और 29 चालाक सिपाही हैं.

बिहार में महिलाओं के विकास, सशक्तिकरण और गरीबी उन्मूलन के लिए जीविका एक सशक्त कार्यक्रम है. 2007 में बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन परियोजना ( जीविका) की शुरुआत की गयी. यह वर्तमान में राज्य के सभी 534 प्रखंडों में लागू है.  जीविका के प्रयासों का नतीजा है कि महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता का विकास हुआ और वे अपने शिक्षा, स्वस्थ्य और अधिकारों के प्रति सजग हुई हैं.  जीविका की महिलाएं अपने आप को हुनरमंद बना रही हैं. अब तक 8.15 लाख स्वयं सहायता समूह का गठन किया जा चुका है और अब तक 6.02लाख समूहों को बैंकों से सम्बद्ध किया जा चुका है. जीविका के तहत गठित स्वयं सहायता समूह की बचत राशि 739 करोड़ रूपये है. नीतीश कुमार ने कहा कि बड़े लोग तो कर्ज लेकर विदेश भाग जाते हैं, मगर जीविका से जुड़ी गरीब महिलाएं यहां समय पर बैंकों को अपने कर्ज चुका रहीं हैं.

सर्व शिक्षा अभियान के तहत अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के विद्यालय से बाहर के बच्चों/ बच्चियों को प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए तालीमी मरकज 2008-09 से दिसम्बर 2012 तक संचालित किया गया. राज्य में 20,000 उत्थान केंद्र टोला सेवक और 10,000 तालीमी मरकज शिक्षा स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से संचालित किये गये.

कालांतर में राज्य सरकार द्वारा अक्षर अंचल योजना प्रारंभ किया गया. वर्ष 2011 की जनगणना में राज्य की महिलाओं की साक्षरता दर में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इसके लिए बिहार को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया. हुनर और औजार कार्यक्रम के जरिये अब तक कुल 1,21,700 बालिकाओं को प्रशिक्षण दिया गया है.

राज्य में 535 कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय संचालित हैं, जिनमे समाज के कमजोर वर्ग की 50,581 छीजन ग्रस्त बालिकाएं आवासीय सुविधा के साथ मध्य विद्यालयों में कक्षा 6-8 तक की शिक्षा प्राप्त कर रही हैं. मुख्यमंत्री बालिका पोषक योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा 2016-17 में 87 लाख से अधिक छात्रों को लाभान्वित किया जा चुका है. इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना के तहत 2017-18 तक नियमित रूप से अध्ययनरत 66.27 लाख से अधिक बालिकाएं लाभान्वित हुई हैं. मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत जिस परिवार की वार्षिक आय 60,000 से कम है, उनकी कन्या के विवाह के लिए 5,000  रूपये का भुगतान किया जाता है.

बिहार में बिहार राज्य महिला सशक्तिकरण नीति-2005 लागू की गयी. अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया गया. इसके तहत राज्य सरकार द्वारा अंतरजातीय विवाह करने वाली महिला को आर्थिक दृष्टि से सबल बनाने हेतु 1 लाख रूपये अनुदान के रूप में दिया जाता है.

समाज की पीड़ित महिलाओं को निःशुल्क सामाजिक-मनोवैज्ञानिक परामर्श, क़ानूनी सहायता और पुनर्वास आदि प्रदान करने के लिए राज्य के सभी 38 जिलों में महिला हेल्पलाइन कार्यरत है. मुख्यमंत्री सामाजिक सहायता और प्रोत्साहन योजना के तहत बिहार में तेजाब पीड़िता को सहायता प्रदान किया जा रहा है. बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना के अंतर्गत महिला आवेदकों को मात्र एक प्रतिशत सरल ब्याज की दर से ऋण उपलब्ध करवाया जा रहा है.

राज्य सरकार ने बाल विवाह  और दहेज़ प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध 2 अक्टूबर 2017 से व्यापक अभियान चलाया है. इस दिन राज्य में लगभग 2.42 करोड़ लोगों द्वारा बाल विवाह न करने और दहेज़ न लेने की शपथ ली गयी. बाल विवाह और दहेज़ प्रथा के विरुद्ध अभियान के प्रचार प्रसार के लिए राज्य के सभी 534 प्रखंड में जागरूकता रथ चलाने के साथ ही कुल 16,932 स्थानों पर नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्शन, 8,46,600 स्थानों पर दिवार लेखन और लगभग 5000 सेवा प्रदाताओं, पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और धर्म गुरुओं का संवेदीकरण किया गया.

राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2008-09 से जेंडर बजटिंग की शुरुआत की गयी. जेंडर बजट का मुख्य उद्देश्य समाज में उत्पन्न असमानताओं को दूर कर महिलाओं को सशक्त बनाना है. बिहार स्टार्ट अप नीति 2017 के तहत प्रति स्टार्ट अप 10 लाख रूपये तक 10 वर्षों के लिए ब्याज मुक्त लोन बीज निवेश सहायता हेतु वित्तीय सहायता के रूप में दिया जा रहा है. ऐसे निवेशों में महिला उद्यमी को 5 प्रतिशत की अतिरिक्त वित्तीय सहायता दी जा रही है.

शराब बंदी पर तो काफी बबेला मचा. गाँधी की विचारधारा में शराबबंदी का प्रमुख स्थान है, बिहार में इसे लागू किया गया और पूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई गयी. काफी विरोध हुआ, ब्लैक मार्किट में शराब की बिक्री का हवाला दिया गया.  उन पर विजय पाने का प्रयास किया जा रहा है. पर ये हकीक़त है कि आज बिहार में कोई भी खुलेआम शराब पीकर हंगामा नहीं कर सकता. रोज शराब के स्टॉक पकडे जा रहे हैं. महिलाओं का शराबबंदी को पूरा समर्थन है, ये पुरे राज्य में दिखने को मिल रहा है. सफलता के किस्से रोज अख़बार छाप रहे हैं.

अब ऐसे में वक़्त है कि महिला समागम कार्यक्रम के जरिये पार्टी महिलाओं के बीच जाए और उनसे फीडबैक ले कि अब तक का कार्यक्रम कैसा रहा, आगे के लिए उनके पास क्या विचार हैं. इस तरह के कार्यक्रम से जनता और राजनीतिक दल के बीच सम्बन्ध बने रहते हैं.

ये कह सकते हैं कि अब तक बिहार में महिलाओं को किसी ने स्वतंत्र दिमाग का वोटर नहीं माना था. नीतीश कुमार ने बिहार की आधी आबादी की पब्लिक लाइफ में भागेदारी बढाई है और महिला वोटरों ने भी नीतीश कुमार पर अपना भरोसा जताया है. आंकडें बताते हैं कि 2015 के विधान सभा चुनाव में महिला वोटरों ने पुरुष वोटरों से ज्यादा वोट डाले थे और इसका फायदा जदयू को गया था.


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