क्या उपेन्द्र कुशवाहा भी जीतन राम मांझी की तरह हाशिये पर फेंक दिए जायेंगे?

राजनीति में किसी को एकदम से चूका हुआ कहना हालाँकि जल्दबाजी होगी, क्योंकि कई बार एक पैंतरे से एक नेता सियासत के शीर्ष पर पहुँच जाता है, वही एक गलत चाल उसे गर्त में ले आती है. हाल के दिनों में जदयू के अन्दर जीतन राम मांझी ऐसे ही उदाहरण हैं, जो समाज कल्याण मंत्रालय में एक गुमनामी की जिंदगी बिता रहे थे. जिंदगी उन दिनों मांझी के लिए ठहरी हुई थी, वे विभाग में बैठे रहते, एनजीओ के लोग उनके पास स्कीम के बारे में उनकी राय लेने आया करते थे और वे उन लोगों को भरपूर समय दिया करते थे. उनके दामाद जो उनके पीए भी हुआ करते थे, खुद NCDHR नामक एक राष्ट्रीय स्तर के एनजीओ में कार्य कर चुके थे.

एकाएक जीतन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री बन बैठे:

फिर अचानक 2014 लोक सभा चुनाव में जदयू की करारी शिकस्त की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का मन बना लिया. काफी लोगों ने समझाया, अने मार्ग पर नेताओं और कार्यकर्ताओं की फ़ौज जुटी. पर नीतीश कुमार टस से मस नहीं हुए. अब ऐसे में सवाल पैदा हुआ कि किसे मुख्यमंत्री पद पर बैठाया जाय?

तो नज़र समाज कल्याण विभाग में शांत जीवन बिता रहे महादलित नेता जीतन राम मांझी पर गयी. उस समय राजनीतिक आंकलन ये था कि मांझी महादलित समाज से आते हैं; और नीतीश कुमार ने महादलित वर्ग के लिए काफी काम किया है; तो ऐसे में मांझी को मुख्यमंत्री बनाना एक तगड़ा सन्देश देगा और समय पर उन्हें फिर से वापस समाज कल्याण मंत्रालय भेजना आसान भी होगा. तब तक संगठन को मज़बूत करने का काम किया जाएगा. इस तरह एक तरफ 20 मई 2014 को  मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया,

उनका अजेंडा था कि पार्टी में सीनियर लीडरशिप से निबटा जाए और साथ ही जदयू को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाया जाय. उनके पास शराब बंदी का मुद्दा था, जिसे लेकर वे कई प्रदेशों में गए.

पर इस बीच जीतन राम मांझी नीतीश कुमार के पैर के नीचे से जमीन खिसकाने की तयारी में लग गए. इस काम में उनका साथ नीतीश के पुराने सहयोगियों और जगन्नाथ मिश्रा ( जिन्हें मांझी अपना राजनीतिक गुरु मानते रहे हैं) दे रहे थे. मांझी के सहारे वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की रोटी सेंकने में व्यस्त हो गये. मुख्यमंत्री बनने के बाद मांझी का कद बढ़ा था. वे पुरे बिहार में घूम रहे थे और बयानबाजी कर रहे थे. अक्सरहां वे अपने नेता नीतीश के खिलाफ बोल जाते थे और उनसे लम्बी लकीर खींचने की बात करने लगे थे. नीतीश कैंप में बेचैनी फैलने लगी थी. नीतीश कैंप ने सोचा नहीं था कि घटनाचक्र इस तरह से घूमेगा. उन दिनों भाजपा भी मांझी की महत्वाकांक्षा को हवा देने में लगी थी, हालाँकि कुछ समय पहले ही भाजपा मांझी पर लगातार हमले कर रही थी और उनके बयानों को तोड़ मरोड़ कर मीडिया में पेश कर रही थी.

अंत में जदयू दो खेमे में स्पष्ट रूप से बंट गया. दोनों खेमों के बीच सुलह की कोशिश की जा रही थी. मांझी को ऑफर दिया जा रहा था कि वे मुख्यमंत्री पद से उतर जाएँ और इसके बदले वे विधानसभा अध्यक्ष का पद स्वीकार करें. पर नीतीश के पुराने सहयोगी जो अब मांझी के समर्थन में खड़े थे, भीम सिंह, नरेंद्र सिंह, नीतीश मिश्रा ( और परदे के पीछे जगन्नाथ मिश्रा) विधान सभा में फ्लोर पर शक्ति परीक्षण के पक्ष में थे. रात्री भोज का आयोजन हुआ. मांझी कैंप और नीतीश कैंप. दोनों ने किया. इस वक़्त जदयू के विधायक बाहुबली अनंत सिंह ने अपनी ताकत दिखाई और विधायकों को नीतीश के बाड़े में बंद कर दिया. वही रहिये, भोज खाईये. मांझी का भोज फ्लॉप शो साबित हुआ. भाजपा भी मुकर गयी. जब तक मांझी भाजपा का गेम समझ पाते, तब तक देर हो चुकी थी. मांझी विधान सभा में शक्ति परिक्षण की हिम्मत नहीं जुटा सके. उन्होंने मीडिया में आशंका जतायी: मेरे साथ शारीरिक हिंसा हो सकती है. राज्यपाल से मिलकर उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया. नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बने.

मांझी की स्थिति पुनार्मुशिकोभावः वाली हो गयी. मांझी और उनके समर्थकों ने जदयू से बाहर निकलकर अलग दल बनाया: हिन्दुस्तानी अवाम पार्टी. पार्टी का इलेक्शन में अच्छा परफॉरमेंस नहीं रहा. मांझी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और अपरिपक्व फैसलों ने उन्हें हासिये पर ला खड़ा किया. उधर नीतीश को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने कई बार सार्वजानिक मंच से स्वीकार किया कि जिस पर भरोसा किया, उसी ने धोखा दिया.

शरद यादव का हश्र भी जीतन राम मांझी की तरह हुआ:

2016 में शरद यादव को हटाकर नीतीश जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. चर्चा थी कि जीतन राम मांझी के साथ संघर्ष में शरद यादव ने मांझी के विरोध को हवा दी थी. बाद में शरद यादव नीतीश के खिलाफ खुल कर सामने आये और महागठबंधन की सरकार से बाहर आने के नीतीश के फैसले का विरोध किया. आज शरद यादव भी राजनीतिक बियाबान में पहुचा दिए गये हैं. वे राज्य सभा की सांसदी खो चुके हैं और अब कभी कांग्रेस तो कभी राजद के भरोसे संसद में पहुँचने की जुगत में हैं. उन्होंने अपना अलग दल बना लिया है, लोकतान्त्रिक जनता दल, जिसमे बिहार से प्रमुख चेहरा हैं रमई राम.

मांझी  और फिर शरद यादव प्रकरण के बाद अब  कुशवाहा प्रकरण:

मांझी के बाद कुशवाहा अब नीतीश का कोपभाजन बनने की ओर अग्रसर हैं. उपेन्द्र कुशवाहा नीतीश के पुराने राजनीतिक सहयोगी रहे हैं. एक लम्बा अरसा दोनों ने साथ बिताया है और राजनीति का ककहरा उन्होंने नीतीश से सीखा है. नीतीश जहाँ कुर्मी जाति से आते हैं, वही कुशवाहा जाति से उपेन्द्र आते हैं. लव कुश की जोड़ी है दोनों जाति. पर नीतीश ने कुर्मी जाति की संख्या को कम देखते हुए जाति से ऊपर उठ कर विकास की राजनीती को अपना USP बनाया, वही कुशवाहा ने खुद को अपनी जाति के नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की.

2014 के लोक सभा चुनाव में जहाँ जदयू ने अपने बलबूते चुनाव लड़ा, वही कुशवाहा एनडीए गठबंधन का हिस्सा थे. जदयू को दो सीटें मिलीं, वही कुशवाहा की रालोसपा तीन सीटों पर चुनाव लड़ी और तीनों सीटों पर जीत हासिल की. नीतीश ने अपना सबक लिया और 2015 के विधान सभा चुनाव में एनडीए के खिलाफ राजद, जदयू और कांग्रेस को एक प्लेटफार्म पर लाकर महागठबंधन बनाया. महागठबंधन को आशातीत सफलता मिली. रालोसपा महज दो सीट हासिल कर पायी.

2019 के चुनाव आने से पहले बिहार में भाजपा और जदयू ( महागठबंधन से अलग होने के बाद) साथ आ चुके थे और उन्होंने मिलकर सरकार बनायी. बिहार में नीतीश ब्रांड से भाजपा को काफी फायदा पहुंचा है. और बिहार में जमने में उसे काफी मदद मिली है. ऐसे में भाजपा के लिए नीतीश और उनकी पार्टी जदयू महत्वपूर्ण है. कुशवाहा इस बात को नहीं समझ सके. और अपनी हड़बड़ी उन्होंने दिखा दी. इस बीच उनकी पार्टी भी जहानाबाद से सांसद अरुण कुमार के विद्रोह और फिर अलग पार्टी बना लेने के चलते कमजोर हुई. पर कुशवाहा कहते रहे कि कुशवाहा वोट पर पहला अधिकार उनका है और उनकी पार्टी 2014 के लोक सभा चुनाव के बाद से मजबूत हुई है. इसलिए अब 2019 के लोक सभा चुनाव के लिए सीट शेयरिंग में उन्हें तीन से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए. एनडीए के सहयोगी दलों पर दबाब बनाने की राजनीती के तहत वे राजद के भी संपर्क में आये. गेस्ट हाउस में तेजस्वी यादव से मीटिंग काफी चर्चित रही. उन्होंने इस दौरान कंफ्यूज करने वाले बयां भी दिए:खीर का स्टेटमेंट तो अच्छा ख़ासा चर्चित हुआ.

पर इस बीच नीतीश कुमार और अमित शाह की दिल्ली में बैठक के बाद ये तय हुआ कि बिहार में भाजपा और जदयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बाकी बचे छह सीटों में लोजपा 5 सीटों पर और 1 सीट पर रालोसपा चुनाव लड़ेगी. ये उपेन्द्र कुशवाहा को गवारा नहीं हुआ. वे अमित शाह से मिलने दिल्ली पहुँच गये. पर अमित शाह से समय नहीं मिला. वे शरद यादव से मिल बैठे. ये समझ से परे थे. आखिर शरद यादव उनकी बिहार में किस तरह मदद कर सकते हैं. क्योंकि शरद यादव खुद राजद पर निर्भर हैं अपनी राज्यसभा संसदी के लिए. राजद भी उपेन्द्र कुशवाहा की बेचैनी को गौर से देख रहा है. पहले ये चर्चा चल रही थी कि उपेन्द्र कुशवाहा को महागठबंधन में सात सीटें मिलेंगी, पर कांग्रेस के विरोध और इधर कुशवाहा के घटे कद ने राजद को भी अपनी रणनीति पर दुबारा गौर करने के लिए मजबूर कर दिया है.

सवाल उठना वाजिब है:

अब सवाल ये है कि क्या कुशवाहा भी मांझी के रस्ते चलते हुए बिहार की राजनीती में दरकिनार कर दिए जायेंगे. मांझी और कुशवाहा दोनों में एक समानता है कि दोनों ने बगावत का झंडा नीतीश के खिलाफ बुलंद किया है. और आज की बिहार की राजनीती में नीतीश सबसे बड़े नेता हैं और उनका विरोध करके एनडीए में रह पाना संभव नहीं, कम से कम अपनी शर्तों पर. जिस कुशवाहा वोट बैंक पर उपेन्द्र भरोसा कर रहे हैं, उसने नीतीश का भरपूर समर्थन किया है. ऐसे में बिहार में उपेन्द्र कुशवाहा के लिए  पोलिटिकल स्पेस लगातार सिकुड़ता जा रहा है.


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