क्या महागठबंधन से निकल भाजपा से हाथ मिलाने से जदयू अल्पसंख्यकों का विशवास खो चुकी है?

लोक सभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और ऐसे में जदयू समाज के हर धड़े का समर्थन पाने के लिए जी तोड प्रयास कर रही है. मन में एक आशंका सी है कि आखिर कौन सा वर्ग पार्टी के साथ है. ऐसे में हर वर्ग के बीच पैठ बनाने के लिए प्रयास जारी हैं. भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में आने के बाद से जनता दल (यूनाइटेड) अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने के लिए प्रयास कर रही है लेकिन इसके बावजूद जेडीयू जिला स्तर की बैठकों में मुस्लिम समर्थकों का समर्थन पाने में नाकाम रही है. ऐसी ही एक बैठक गुरुवार को पटना में हुई. बिहार में करीब 16 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं.

हालांकि जदयू के साथ अल्पसंख्यक सेल के अध्यक्ष मोहम्मद सलीम, राज्य सभा सांसद कहकशां परवीन, एमएलसी और पूर्व राज्य सभा सांसद गुलाम रसूल बलियावी जैसे  कई मुस्लिम नेता जुड़े हुए हैं और पार्टी ने उन्हें उंचा स्थान भी दिया है, पर लगता है कि समुदाय उनके साथ नहीं. जिस तरह का हश्र अल्पसंख्यक सम्मलेन का हुआ, उससे ये संकेत जाना लाजिमी है. गुरुवार को पटना में आयोजित जेडीयू के अल्पसंख्यक कार्यकर्ता सम्मेलन में 1500 लोगों को शामिल होना था जिनके लिए 600 किलो बिरयानी भी बनवाई गई. मटन बिरयानी मेन्यू में शामिल करने का उद्देश्य था मुस्लिम मतदाताओं को रिझाना लेकिन सम्मेलन में कुर्सियां खाली दिखाई दीं. मुस्लिम कार्यकर्ता भी नहीं पहुंचे.

पार्टी से जुड़े एक सूत्र का कहना है, “हमने मटन बिरयानी बनवाई ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आकर्षित किया जा सके. पटना में सम्मेलन का आयोजन किया गया. हमें उम्मीद थी कि इसका नतीजा अच्छा रहेगा. अधिक संख्या में बची बिरयानी को फिर मजदूरों और बिन बुलाए लोगों के बीच बांट दिया गया.”

वहीं जेडीयू के महासचिव आरसीपी सिंह गुस्से में वहां से चले गए, जब वहां मौजूद लोगों में से किसी ने उन्हें कहा कि वह अपना भाषण बंद करें. उन्हें कहा गया, “बस हो गया अब.” इसके बाद कई लोग वहां से जाने के लिए अपनी कुर्सियों से उठ गए हालांकि इसके बाद भी सिंह थोड़ी देर तक बोलते रहे जिसके बाद खाना शुरू किया गया.

जानकारी के मुताबिक ये व्यवस्था अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खुर्शीद फिरोज अहमद की तरफ से की गई थी. वहीं सम्मेलन में मौजूद अन्य पार्टी के सूत्र का कहना है कि यातायात की ठीक से व्यवस्था न होने के कारण लोग नहीं पहुंच पाए.

लोक सभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और संकेत दिख रहे हैं कि महागठबंधन को तोड़ कर भाजपा के साथ आने को प्रदेश के अल्पसंख्यक समुदाय ने सही तरीके से नहीं लिया और वे राजद के साथ बेहद मजबूती के साथ खड़े दिख रहे हैं. हाल् फिलहाल के दिनों में जिस तरह से भाजपा नेताओं के द्वारा अल्पसंख्यक विरोधी भड़काऊ बयानबाजी की गयी, सरेराह तलवार के साथ प्रदर्शन किये गए और उन पर त्वरित कार्यवाही नहीं हो सकी, उसने कहीं न कहीं अल्पसंख्यकों का विशवास नीतीश कुमार में कमजोर किया है.

जदयू के लिए ये बेहद चिंता की बात है खासकर नीतीश कुमार ने जिस तरह से राजद के माय समीकरण में सेंध लगाने के लिए पिछड़े और अति पिछड़े मुसलामानों को उठाना शुरू किया और उनके लिए कई कल्याणकारी योजनायें चलायीं, पर दिख रहा है कि मोब लिंचिंग की बढती घटनाएं, भाजपा नेताओं की आक्रामकता ने अल्पसंख्यकों में एक भय का माहौल पैदा किया है, जिसका इलाज कल्याणकारी योजनायें चलाने भर से नहीं होगा. कम से कम अल्पसंख्यक कार्यकर्ता सम्मलेन का हश्र तो यही बता रहा है.

ऐसे में सवाल ये है कि क्या समय रहते चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरुरत है?


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