नीतीश के चक्रव्यूह में घिरे कुशवाहा रालोसपा का विलय शरद यादव की पार्टी एलजेडी में करने की तैयारी में

पटना: बिहार में लोकसभा पूर्व राजनीतिक घटनाक्रम ने जबरदस्त मोड़ लिया है. अभी कुछ दिन पहले तक एनडीए के घटक रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा 2014 के लोक सभा चुनाव के बाद से अपने दल की बढ़ी ताकत के आधार पर पिछले चुनाव में मिले तीन सीट से ज्यादा सीट की मांग कर रहे थे, पर भाजपा उनकी मांग मानने के मूड में नहीं थी. वजह थे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. नीतीश कुमार की पार्टी जदयू इस बार 2019 के लोक सभा चुनाव में एनडीए का घटक है और साथ ही बिहार में दोनों दल- जदयू और भाजपा सरकार में भागीदार हैं. कुशवाहा वोट बैंक पर नीतीश और उपेन्द्र कुशवाहा दोनों का दावा रहा है, ऐसे में भाजपा के लिए बिहार में नीतीश के कद और दोनों का एक ही वोट बैंक देखते हुए उपेन्द्र कुशवाहा की मांग मानना भाजपा के लिए कठिन था.

दिल्ली में नीतीश और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के बीच हुई बैठक, जिसके बारे में रालोसपा के साथ साथ लोजपा को भी अँधेरे में रखा गया, में तय किया गया कि भाजपा और जदयू दोनों 17-17 सीटों पर लड़ेंगे और किस सीट पर कौन दल लडेगा, इसका फैसला बाद में होना था. बाकी बची सीटों को लोजपा और रालोसपा के बीच बांटने पर दोनों दलों में सहमती बनी. पर लोजपा और रालोसपा दोनों ने इस फैसले का विरोध किया. उपेन्द्र कुशवाहा ने प्रेशर पॉलिटिक्स के तहत गेस्ट हाउस में राजद नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से भी भेंट की. बिहार में कुशवाहा वोट के प्रतिशत को देखते हुए राजद को भी मौक़ा दिखा और राजद के दूध और कुशवाहा के चावल से खीर बनाने सम्बन्धी बहुचर्चित बयान भी उपेन्द्र कुशवाहा की तरफ से आया.

पर ये प्रेशर टैक्टिस कुशवाहा के लिए काम नहीं आया. नीतीश की जिद के चलते उनके लिए एनडीए में स्पेस सिकुड़ता चला गया. नीतीश और उनके पूर्व सहयोगी रह चुके उपेन्द्र कुशवाहा के बीच तल्खी इतनी बढ़ी कि कुशवाहा ने नीतीश पर “नीच” शब्द का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और इसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करते दिखे. हालाँकि भाजपा ने इस मुद्दे पर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का साथ दिया. ऐसे में मामला ज्यादा तूल नहीं पकड़ सका. पर कुशवाहा को इसका नुक्सान ये हुआ कि वे एनडीए में हासिये पर आते चले गये. वे लगातार बयानबाजी करते रहे. बात इतनी बढ़ी कि खुद लोजपा नेता चिराग पासवान ने भी उन्हें दो नावों में सवारी न करने की नसीहत दे डाली.

ऐसे में चौतरफा हमले में घिरे उपेन्द्र कुशवाहा ने भाजपा अध्यक्ष से मिलकर अपना पक्ष रखने की कोशिश  की, पर बात नहीं बनी. अमित शाह ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया. फिर उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री मोदी से अपील की, पर यहाँ भी उनकी अपील अनसुनी कर दी गयी. उन्होंने भाजपा को सीट शेयरिंग पर अपना पक्ष रखने के लिए 30 नवम्बर का डेडलाइन दिया, पर डेडलाइन आया और चला गया.

ऐसे में रालोसपा प्रमुख भड़क उठे और उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अपने निशाने पर ले लिया और कह डाला, “जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है…” हालाँकि अभी भी उनका स्टैंड है कि एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर उनकी भाजपा से अभी तक अंतिम बात नहीं हो पायी है. पार्टी बाल्मिकी नगर सम्मेलन में इस मुद्दे पर अंतिम फैसला लेगी.

पर राजनीति के जानकार ये स्पष्ट देख रहे हैं कि एनडीए में उपेन्द्र कुशवाहा के दिन गिने चुने हैं. बिहार के कांग्रेस प्रभारी भी इन घटनाओं पर गहरी नज़र रखे हुए थे. हालाँकि कांग्रेस रालोसपा को महागठबंधन में सीट की संख्या पर अपनी राय नहीं बना पायी है, पर कांग्रेस ने उपेन्द्र कुशवाहा को लगातार उकसाया है कि वे आत्मसम्मान के साथ समझौता न करें और एनडीए से बाहर निकल आयें और महागठबंधन में उनका स्वागत है.

शरद यादव के साथ भी मिल आये कुशवाहा:

इन तमाम राजनीतिक घटनाक्रम के बीच उपेन्द्र कुशवाहा अपने घटते राजनीतिक विकल्प को देखते हुए दिल्ली में शरद यादव से भी मिल आये. शरद यादव से मिलने को राजनीतिक विश्लेषकों ने एनडीए से कुशवाहा के और दूर जाने के क्रम में देखा. राजनीतिक हलकों में ये खबर उछल रही है कि अब सीट बंटवारे पर असंतुष्ट राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) एनडीए से अलग होने के बाद शरद यादव की पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल (एलजेडी) के साथ विलय की तैयारी में है. बता दें कि बिहार में महागठबंधन से अलग होकर बीजेपी के साथ सरकार बनाने पर शरद यादव और नीतीश कुमार के बीच मतभेद उभरे थे. इसके बाद शरद यादव ने जेडीयू से अलग होकर नई पार्टी बनाई. फिलहाल वह बिहार में जेडीयू-बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को मजबूत करने में जुटे हैं. दोनों ही पार्टी के करीबी सूत्रों के मुताबिक आरएलएसपी चीफ और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और एलजेडी संरक्षक शरद यादव के बीच विलय को लेकर पिछले दिनों लंबी बातचीत हुई है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक अब विलय को लेकर बातचीत अंतिम दौर में है और यह कभी भी संभव है.

दोनों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है ये विलय:

कहा जाता है कि जिस तरह से शरद यादव को हटाकर नीतीश खुद जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए, उससे शरद यादव नाराज चल रहे थे. नीतीश समर्थकों का ये कहना था कि नीतीश बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष पार्टी को बिहार से बाहर ले जायेंगे और इसे राष्ट्रीय पार्टी का दरजा दिलवाएंगे. पार्टी ने यूपी में विधान सभा चुनाव लड़ने का भी फैसला किया था, पर सीट पर समझौता नहीं हो पाने और पार्टी के नेता आर सी पी सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते नीतीश ने यूपी में चुनाव लड़ने से कदम पीछे खींच लिया. ज्ञात हो कि यूपी चुनाव के आसपास आर सी पी सिंह के ग्रुप के लोगों ने उन्हें यूपी का भावी मुख्यमंत्री घोषित करते हुए यूपी में कई अभियान चलाये थे. पर नीतीश की शरद यादव से नाराजगी जीतन राम मांझी प्रकरण के समय से थी. राजनीतिक सूत्रों के अनुसार जिस तरह से शरद यादव जीतन राम मांझी की राजनीतिक  महत्वाकांक्षाओं को हवा दे रहे थे, उससे नीतीश शरद यादव से खासे नाराज हो गये थे.

नीतीश की नाराजगी मोल कर शरद यादव बिहार की राजनीति से उखड गये. अब ऐसे में रालोसपा और उनकी पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल (एलजेडी) का विलय दोनों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है. कुशवाहा को  भी शरद जैसे राष्ट्रीय कद के नेता का साथ मिलेगा और दूसरी ओर शरद यादव को भी बिहार की राजनीति में पैर पसारने का मौक़ा   मिलेगा. कहीं न कहीं शरद यादव के मन में जदयू और नीतीश के समता दल का विलय  होगा.

फिलहाल ये देखना रोचक होगा कि उपेन्द्र कुशवाहा और शरद यादव के कैलकुलेशन 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र कितने कारगर बैठते हैं.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.