लालू यादव के बिना राजद लड़ेगा 2019 का लोकसभा चुनाव; बीमार लालू NDA की नींद उड़ा सकते हैं

2019 का लोक सभा चुनाव पहला चुनाव होगा, जब राजद अपने नेता लालू यादव के नेतृत्व के बिना लड़ेगा. राजद के लिए चुनौती की घडी है. एक तरफ तेजस्वी यादव के नेतृत्व की अग्नि परीक्षा होगी, वही दूसरी ओर, राजद के कोर वोटर बेस माय ( मुस्लिम और यादव समीकरण) की भी परीक्षा होगी कि वे कितनी मजबूती से तेजस्वी के साथ खड़े होते हैं. राजद के जन्म के समय से लालू यादव सेकुलरिज्म के पैरोकार रहे हैं, और उन्होंने ये प्रयास किया कि उनके कार्यकाल में बिहार में सांप्रदायिक दंगे न हों. उन्होंने अपने कन्विक्शन के बजाय अपने वोट बैंक के चलते सेकुलरिज्म की राह पकड़ी ( जैसा कि उनके विरोधी आरोप लगाते हैं) पर सच्चाई ये है कि बिहार उनके कार्यकाल में सांप्रदायिक दंगों से मुक्त रहा.

और इस दौरान उन्होंने आम जनता से जिस तरह इमोशनल लेवल पर कनेक्ट हुए, उसकी मिसाल बिहार के राजनीतिक इतिहास में नहीं मिलती, जनता की आम भाषा में बात करना, उनके सुख दुःख के बारे में पूछ लेना आदि ऐसे तरीके थे कि मेनस्ट्रीम मीडिया ने उन्हें जोकर कहा, पर फिर भी बाईट के लिए दौड़ कर लालू के पास जाते थे. लालू के बिना उनकी ब्रेकिंग स्टोरी नहीं बनती थी, TRP नहीं उठती थी. उनकी लोकप्रियता ने उनके पहले सहयोगी और बाद में विरोधी नीतीश कुमार को लम्बे समय तक बिहार में मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया. दूसरी ओर, लोजपा प्रमुख रामबिलास पासवान को बिहार की राजनीती से उखाड़ कर केंद्र की राजनीति करने पर मजबूर कर दिया.

1997 में सामने आये चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता होने के बाद भी वे परदे के पीछे से प्रदेश की राजनीति  को निर्देशित करते रहे. और वे यूपीए सरकार में रेल मंत्री भी बने. बतौर रेल मंत्री उनका कार्यकाल शानदार रहा और अपने परफॉरमेंस के बल पर वे आईआईएम, हार्वर्ड जैसी संस्थाओं में लेक्चर देने भी गये. 2005 में वे भले बिहार की गद्दी नीतीश के हाथो खो बैठे, पर उनका वोट बैंक बना रहा. यहाँ तक कि जब वे 2010 के विधान सभा चुनाव में महज़ 22 सीट पा सके, तब भी उनका वोट प्रतिशत बहुत गिरा नहीं. 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश, लालू और कांग्रेस आये, फिर तो ऐसा मज़बूत महागठबंधन बना कि भाजपा को धराशायी होना ही था. इस चुनाव में लालू यादव का जलवा देखने वाला था. स्थिति ऐसी थी कि खुद जदयू के उम्मीदवार भी अपनी चुनावी रैली में लालू के भाषणों की मांग कर रहे थे.

पर अब समय बदल गया है. लालू जेल में  हैं और अस्वस्थ भी हैं. राजद की कमान तेजस्वी यादव के युवा हाथों में है. तेजस्वी उपमुख्यमंत्री पद से हटने के बाद निखरे हैं बतौर नेता के तौर पर. कह सकते हैं लगातार सत्ताधारी जदयू के प्रवक्ताओं के प्रहार, सीबीआई के हमले, ED  के रेड ने न केवल उन्हें मानसिक तौर पर मज़बूत किया है, बल्कि उनके प्रति जनता में सहानुभूति भी पैदा की है. वे लगातार जनता के बीच गए हैं और नीतीश सरकार पर मुज़फ्फरपुर शेल्टर होम, सृजन घोटाले, सरकारी नौकरियों में नियुक्तियों में गड़बड़ियों को लेकर मीडिया, सोशल मीडिया, पब्लिक रैली के प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते हुए हमला करते रहे हैं.

हालाँकि इस दौरान राजद को तेज प्रताप के मसले पर परेशानियों को सामना करना पड़ा है, पर फिर भी तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर सवाल नहीं उठा है.  तेजस्वी एनडीए के खिलाफ गठबंधन बनाने की कोशिश में लगे हैं. वे रालोसपा प्रमुख को ऑफर दे रहे हैं, कांग्रेस के साथ उनकी बात चल रही है, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध अच्छे हैं और ऐसे में बिहार महागठबंधन में तेजस्वी की स्थिति बेहद मज़बूत है. उनके आगे कांग्रेस अध्यक्ष या बिहार कांग्रेस के प्रभारी की भी कुछ नहीं चलती है. राजद का माय समीकरण अक्षुण्ण है. रालोसपा, मांझी, कांग्रेस के साथ आने से राजद के नेतृत्व में महागठबंधन मज़बूत होगा. 2014 के विपरीत मोदी का करिज्मा 2019 में कम हुआ है. रोजगार के मसले पर विफलता, मोब लिंचिंग, विरोधियों के खिलाफ टार्गेटिंग, भ्रष्टाचार के खिलाफ सेलेक्टिव टार्गेटिंग आदि के चलते एनडीए सरकार खुद को बैकफूट पर पा रही है. ऐसे में अगर तेजस्वी माय के अलावा दलित वोटों को अपने साथ जोड़ पायेंगे और कांग्रेस के भरोसे भाजपा का सवर्णों का वोट काट पायेंगे, तो फिर 2019 के लोक सभा चुनाव में राजद अच्छा परफॉरमेंस कर सकता है. ऊपर से चर्चा चल रही है कि रालोसपा प्रमुख और शरद यादव के दल मिलने वाले हैं. बिहार में कुशवाहा वोट का अच्छा ख़ासा प्रतिशत है. दूसरी ओर, निषाद वोट पर भी दोनों पक्षों की नज़र है. हाल फिलहाल सन ऑफ़ मल्लाह मुकेश सहनी को एनडीए के पक्ष में लाने के लिए जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर मुकेश सहनी के साथ मौर्या होटल में डिनर करते देखे गये. कहना नहीं होगा कि इन राजनीतिक घटनाक्रम को तेजस्वी भी गौर से देख रहे होंगे और आने वाले वक़्त में वे और मुकेश सहनी बात करते पाए जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

राजनीतिक हलकों में ये भी चर्चा है कि नीतीश एनडीए के साथ सम्बन्ध को टेस्ट कर रहे हैं. 2019 का लोकसभा चुनाव उनके लिए टेस्टिंग ग्राउंड है. वे भाजपा को घुटनों पर झुकने के लिए मजबूर कर चुके हैं और महज़ 2 सीट जीतने वाले जदयू के लिए वे एनडीए में 17 सीट लेने में सफल हुए हैं. पर राजनीतिक विश्लेषक ये मानकर चल रहे हैं कि अगर 2019 का चुनाव मनमाफिक तरीके से नहीं रिजल्ट दे पाया, तो वे फिर एक बार महागठबंधन में जा सकते हैं 2020 के विधान सभा चुनाव के लिए. अगर ऐसा होता है, तो फिर 2015 के विपरीत राजद उतना accomodating नहीं रहेगा. हो सकता है कि मुख्यमंत्री पद पर भी दावा कर दे जदयू से अधिक सीट जीतने की स्थिति में.

तेजस्वी के सामने चुनौतियाँ बहुत हैं, पर इन चुनौतियों में असीम संभावनाएं छुपी हुई हैं:

3 अक्तूबर 2013  को  चारा घोटाला मामले में सुनवाई करते हुए सीबीआई की विशेष कोर्ट ने राजद प्रमुख लालू यादव को पांच साल कैद की सजा सुनाई थी और उनके चुनाव लड़ने पर छह साल का बैन लगा दिया था. अभी भी लालू यादव जेल में ही हैं और खराब स्वास्थ्य के कारण झारखंड की राजधानी रांची में रिम्स अस्पताल में भरती हैं. अब ऐसे में स्पष्ट है  कि 2019 का चुनाव राजद अपने सुप्रीमो लालू यादव के बिना ही लड़ेगा.

उन्हें अभी चारा घोटाले में कई और सजाएं भुगतनी हैं, जो चल रही हैं. कुल 14 साल सजा काटनी है जो दुमका ट्रेजरी से निकासी के मामले में उन्हें मिली है. मार्च 2018 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने लालू यादव को चारा घोटा़ला मामले के चौथे केस में सात-सात साल कैद की सजा सुनाई है, जो अलग-अलग चलेंगी. इस स्थिति में उनका राजनीतिक कैरियर खत्म ही जान पड़ता है. लालू अभी 70 साल के हैं और अगर उन्हें 14 साल अभी और जेल में बिताना पड़े तो वे 84 साल के होकर जेल से बाहर आयेंगे.

तेजस्वी के सामने भी चुनौतियाँ हैं. उन पर ICRTC मामले की तलवार लटक रही है. फिर सगुना मोड में मॉल का भी मामला है. ये उम्मीद की जा रही है कि जिस तरह से भाजपा नेता सुशील मोदी इन मामलों को लेकर आक्रामक हैं, चुनाव से पहले फैसला लिया जाए, ताकि तेजस्वी को चुनाव से पहले घेरा जाए.

तेजस्वी जनता की सहानुभूति को बटोरने के लिए इस बार चुनाव में तकनीक का मारक इस्तेमाल कर सकते हैं. बीमार, शहीद लालू स्वस्थ लालू से ज्यादा ताकतवर हो सकते हैं. तेजस्वी अगर आम सभाओं में लालू के विडियो प्रसारित करते हैं अपने भाषणों के साथ, तो जनता में उबाल आ सकता है.

लालू यादव की अनुपस्थिति में राजद के वरिष्ठ नेताओं जैसे अब्दुल बारी सिद्दीकी, रघुवंश प्रसाद सिंह की भी महत्वपूर्ण भूमिका होने वाली है. ये तय है.


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