नीतीश कुमार को यूं ही बिहार की राजनीति का चाणक्य नहीं कहा जाता है !!

पिछले कुछ महीनों से एनडीए में तकरार चल रही है. मुद्दा है सीट शेयरिंग का. बिहार एनडीए में चार घटक हैं: भाजपा, जदयू, लोजपा और रालोसपा. जदयू राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की दिल्ली में हुई बैठक में सीट शेयरिंग के जिस फार्मूले पर सहमति  बनी, उसके अनुसार बिहार के 40 लोक सभा सीटों में 17-17 सीटों पर जदयू और भाजपा लड़ेंगे, वहीँ बाकी बचे 6 सीटों में पांच पर लोजपा और 1 सीट पर रालोसपा चुनाव लड़ती. इस तरह एनडीए में सबसे छोटा घटक रालोसपा होता. पर इस फोर्मुले को रालोसपा और लोजपा दोनों ने ठुकरा दिया. दोनों ने नीतीश कुमार और अमित शाह के बीच बैठक के नतीजों के बारे में अनभिज्ञता जताई.

रालोसपा और लोजपा दोनों ने 2014 के लोक सभा चुनाव के बाद से अपनी बढ़ी हुई ताकत का हवाला दिया और साथ ही 2014 के लोक सभा चुनाव में जदयू के ख़राब परफॉरमेंस की ओर भी लगातार इशारा किया. 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा था. पार्टी को प्रदेश में 2 सीटों पर जीत मिली. 2014 के लोक सभा चुनाव में भाजपा 30 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिसमे उसे 22 सीटों पर जीत हासिल हुई, वही लोजपा 7 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटों पर विजयी रही; वही रालोसपा 3 सीटों पर चुनाव लड़कर तीनों सीट जीतने में सफल हुई.

2009 के लोक सभा चुनाव में जदयू ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था तो भाजपा के हिस्से में 15 सीटें आई थीं. इस चुनाव में जदयू को 25 में से 20 और भाजपा को 15 में से 12 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं इससे पहले 2004 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच 26-14 का फॉर्मूला तय हुआ था. वर्ष 2010 और 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान जदयू बिहार में ड्राइविंग सीट पर रहा.  इन्हीं दिनों भाजपा बिहार समेत देश के अन्य स्थानों पर खासी मजबूत पार्टी बनकर सामने आई है. 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के विधानसभा चुनाव में बिहार में भाजपा का वोट शेयर बढ़ गया है.  2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा था. पार्टी को प्रदेश में 2 सीटों पर जीत मिली और वोट शेयर 16 प्रतिशत के आसपास रहा. वहीं भाजपा लोकसभा चुनाव में 30 सीटों पर लड़ी जिसमें से 22 पर उसे जीत मिली. उसका वोट शेयर, 29.86 प्रतिशत, रहा था.

 नीतीश ने एक तरफ उपेन्द्र कुशवाहा को सबक सिखाया, वही भाजपा में नीतीश विरोधी खेमे को भी परस्त किया: 

बिहार भाजपा में सुशील कुमार मोदी नीतीश समर्थक माने जाते हैं उन्होंने समय समय पर कहा है कि नीतीश राज्य सत्ताधारी गठबंधन के नेता हैं और एनडीए 2019 के आम चुनावों में जदयू अध्यक्ष नीतीश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामों के आधार पर वोट मांगेगा. हालाँकि सुशील मोदी विरोधी खेमा सोचता आया था कि भाजपा को 2019 का लोकसभा चुनाव जेडीयू से अलग होकर लड़ना चाहिए. बिहार भाजपा का जो वर्ग ऐसा सोचता है उसे सुशील कुमार मोदी विरोधी खेमा भी कहा जा सकता है. इस वर्ग का यह कहना है कि अलग होकर चुनाव लड़ने के कई फायदे हैं. पहला फायदा ये होता कि भाजपा अपने 2014 के सहयोगियों के साथ ही एक बार फिर से बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती थी, क्योंकि उनके हिसाब से  बिहार में 2015 वाली स्थिति आनी मुश्किल लग रही है जब जेडीयू और आरजेडी एक साथ हो गए थे और विधानसभा चुनावों में भाजपा की बुरी हार हुई थी. राजद और जदयू के वोट अलग-अलग होने का सबसे अधिक फायदा भाजपा को मिल सकता था जैसे 2014 में मिला था. पर भाजपा के नीतीश विरोधी खेमे को हार माननी पड़ी. अमित शाह ने भी पटना दौरे पर कहा था- जदयू के साथ आने से एनडीए बिहार की सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी. इससे नीतीश विरोधी भाजपाई खेमे के हौसले पस्त हुए.

17 सीट पाने के लिए जदयू के तर्क ये थे, जो अंततः भाजपा को स्वीकार करने पड़े:

भाजपा का मानना था कि लोकसभा 2014 के फार्मूले पर होना चाहिए और विधानसभा 2015 के फार्मूले पर.  पर जदयू की ओर से तर्क रखा गया कि बिहार में नीतीश ने  राजद को हराया. इससे भाजपा भी एक झटके में सरकार में आ गयी. बिहार में एक चेहरा भी मिला.  ऐसे में 2014 को सीट बंटवारे का आधार नहीं बनाना चाहिए क्योंकि उसके बाद 2015 का चुनाव हो चुका है. जदयू नेताओं का दावा है कि 2015 का विधानसभा चुनाव राज्य में सबसे ताजा शक्ति परीक्षण था और आम चुनावों के लिए सीट बंटवारे में इसके नतीजों की अनदेखी नहीं की जा सकती. ज्ञात हो कि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू को राज्य की 243 सीटों में से 71 सीटें हासिल हुई थीं, जबकि भाजपा को 53 और लोजपा- रालोसपा को 2-2 सीटें मिली थीं. जदयू उस वक्त राजद एवं कांग्रेस का सहयोगी था.

6 दिसम्बर को वाल्मीकिनगर में रालोसपा के चिंतन शिविर में कुशवाहा अंतिम फैसला लेंगे:

4 दिसंबर से पश्चिम चंपारण के वाल्मीकि नगर में शुरू हो रहे रालोसपा के तीन दिवसीय चिंतन शिविर के दौरान नेताओं से चर्चा करके निर्णय लिया जाएगा. पर ऐसी चर्चा है कि एनडीए से रालोसपा को बाहर करने का अमित शाह मन बना चुके हैं. उपेन्द्र कुशवाहा भी इस बात को समझ चुके हैं. इसलिए नीतीश कुमार को embarass करने के लिए उन्होंने 25 सूत्री मांग रख दी है. वाल्मीकि नगर के चिंतन शिविर में अब बस औपचारिक घोषणा करनी बाक़ी है.

ज्ञात हो कि कुशवाहा ने बिहार में एनडीए में सीट बंटवारे के मामले में हस्तक्षेप के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से समय मांगा था हालांकि दिल्ली में रहने के बावजूद उन्हें समय नहीं दिया गया. कुशवाहा की उम्मीदें उस समय समाप्त हो गई, जब मोदी उन्हें बिना वार्ता के लिए आमंत्रित किए जी20 सम्मेलन के लिए अर्जेंटीना चले गए.

इससे पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी कुशवाहा को मामले को सुलझाने के लिए समय नहीं दिया था. कुशवाहा ने पिछले दिनों नीतीश कुमार पर ये आरोप भी लगाया कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल-यूनाइटेड (जद-यू) रालोसपा में विभाजन कराने का प्रयास कर रही है.

रालोसपा के एनडीए से बाहर निकलने का सीधा फायदा लोजपा को मिलने वाला है:

बिहार भाजपा के सूत्रों के अनुसार रालोसपा को एनडीए से बाहर करने के बारे में अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कर चुके हैं. बस इसकी औपचारिक घोषणा होनी बाक़ी है. ऐसा होने पर रालोसपा के हिस्से की एक सीट जदयू या भाजपा न लेकर लोजपा को देने वाले हैं. लोजपा को भाजपा के प्रति लॉयल्टी का इनाम दिया जाने वाला है. क्योंकि लोजपा के चिराग पासवान ने लगातार ये कहा है कि बिहार में अगर एनडीए के चेहरा नीतीश कुमार हैं, तो फिर नरेंद्र मोदी और रामविलास पासवान भी हैं. ये भाजपा के नेताओं के कानों के लिए संगीत जैसा है. वही दूसरी ओर, लोजपा ने लगातार रालोसपा को भी खरी खोटी सुनाई. चिराग पासवान ने रालोसपा प्रमुख को दो नावों में सवारी न करने की सलाह दी थी. ज्ञात हो कि उपेन्द्र कुशवाहा लगातार राजद के भी संपर्क में बने रहे. उनकी पीठ कांग्रेस के बिहार प्रभारी ने भी रह रहकर सहलाई.

राजद खेमे की भी डगर आसान नहीं है:

भाजपा इस बात का आकलन भी कर रही है कि राजद खेमे में भी सीटों का बंटवारा बहुत आसान नहीं है. राजद को कांग्रेस, जीतन राम मांझी और शरद यादव को खुश करके चलना है. अगर  रालोसपा के लिए जगह बनानी पड़ गई, तो फिर और भी परेशानी हो जाएगी. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर भाजपा अभी गो-स्लो की रणनीति पर काम कर रही है. फिलहाल ये चर्चा चल रही है कि शरद पवार और उपेन्द्र कुशवाहा अपने दलों का परस्पर विलय करेंगे. ऐसे में नए दल के लिए राजद को नए सिरे से सोचना पड़ सकता हिया.

नीतीश कुमार को यूं ही नहीं बिहार की राजनीति का चाणक्य कहा जाता है !!

कुल मिलाकर सीट शेयरिंग का मसला दोनों पक्षों ( एनडीए और महागठबंधन) के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है. राजनीतिक खेल की अब तक की स्थिति को देखते हुए कह सकते हैं कि अब तक के खेल के स्पष्ट विनर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार हैं, जिन्होंने अमित शाह जैसे घाघ राजनीतिज्ञ से अपनी हर मांग मनवाने में सफलता पायी है, चाहे वो अधिक सीट (17) लेने का मसला हो, बिहार भाजपा में मौजूद नीतीश विरोधी खेमे को परास्त करने का हो या फिर उपेन्द्र कुशवाहा की स्थिति एनडीए में संकटग्रस्त बना देने का मसला. नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति का चाणक्य कहने के पीछे कुछ तो वजह होगी ही !!

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