नक्सलबारी आन्दोलन: चारु मजुमदार मिथक बन गये, पर जंगल संथाल भुला दिए गये

चारू मजुमदार 1972 में पुलिस कस्टडी में मर गये, जंगल संथाल 1988 में अत्यधिक शराब पीने के चलते प्राण गंवा बैठे; कनु सान्याल ने सिलिगुरी के नजदीक हतिघिशा गाँव में आत्महत्या कर ली. इस तरह नक्सलबारी आन्दोलन के त्रिगुट नेताओं का दुखद अंत हुआ. चारू और कनु याद रह गये, पर जंगल संथाल भुला दिए गये.

नक्सलबारी भी अब बदल गया है. पहले की तरह गांव नहीं रहा. शहर बन गया है. सड़क, स्कूल, अस्पताल सब हैं, एक कॉलेज भी है. लेकिन 1967 में नक्सलबारी एक छोटा सा गाँव हुआ करता था.

 कम्युनिस्टों की अगुआई में आदिवासी किसानों ने चीन में हुई क्रांति की तर्ज़ पर हथियारबंद ब़गावत की शुरुआत की थी. पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के सत्ता में होने के कारण जुझारू किसान आंदोलन अपने उफान पर था. इससे घबराए ज़मींदारों ने बटाईदारों को बेदखल करना शुरू कर दिया था. बटाईदार किसान कभी आंदोलन के ज़रिए, तो कभी अदालत के ज़रिए अपने हकों के लिए लड़ रहे थे. इन्हीं में से एक किसान था बिगुल, जिसने अपने पक्ष में दीवानी अदालत का आदेश प्राप्त कर लिया था. बिगुल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट का पार्टी सदस्य भी था. पर ज़मींदार ईश्वर टिर्की उसे कब्ज़ा देने के लिए तैयार नहीं हुआ.

इसके जवाब में एक सम्मेलन करने के बाद किसानों ने पार्टी के स्थानीय नेतृत्व की अगुआई में किसान समितियाँ और हथियारबंद दस्ते बना कर ज़मीनों पर कब्ज़ा करना शुरू किया. हदबंदी को चकमा देने वाले झूठे दस्तावेज़ जलाए जाने लगे, कर्ज़ के प्रोनोट नष्ट किए जाने लगे और ज़मींदारों के कारिंदों से बंदू़कें छीनने की मुहिम शुरू हो गई.

टिर्की के लठैतों ने बिगुल के समर्थन में सामने आए किसानों की पिटाई की और तहकी़कात के बहाने पुलिस ज़मींदार के समर्थन में आ गई. 23 मई 1967 को तीर-कमान से लैस किसानों का पुलिस से संघर्ष हुआ जिसमें तीन पुलिस वाले घायल हुए और दरोगा सुनाम वांगदी ने घायल हो कर अस्पताल में दम तोड़ दिया.

25 को पुलिस भारी संख्या में वहाँ पहुँची और फिर टकराव हुआ. इस बार पुलिस की गोली से 10 लोग मारे गए. नक्सलबाड़ी में विद्रोह 52 दिन तक जारी रहा.

चीन के अखबार peoples Daily और बीजिंग रेडियो  के शब्दों में, भारत के पहाड़ों में “spring thunder” की शुरुआत हो चुकी थी. आगे चलकर नक्सल आन्दोलन देश के कई राज्यों में फैला. कॉलेज के, अकादमिक दुनिया के क्रीम अपना करियर, अपने सपने छोड़कर एक नए समाज को गढ़ने का सपना लेकर इस आन्दोलन से जुड़े.

इस आन्दोलन के ओरिजिनल नेता थे जंगल संथाल और कनु सान्याल. चारू मजुमदार बाद में इस आन्दोलन से जुड़े. आन्दोलन के पचास साल बीत जाने के बाद भी कुछ सवाल बने हुए हैं, कि क्या होता जंगल संथाल 1967 में सीपीएम के टिकट से विधान सभा चुनाव जीत जाते? क्या चारु उतने ही सफल और नामचीन हो पाते अगर उन्हें जंगल संथाल की लोगो को एकजुट करने की ताकत का सहारा नहीं मिला होगा?

शुरूआती दिनों में नक्सल क्रांतिकारियों की तुलना २०वी सदी की शुरुआत के बंगाल के क्रांतिकारियों से की जाती थी. और उनके लिए लोगों में पर्याप्त सहानुभूति भी थी. पर एक बार जब आन्दोलन का फोकस ग्रामीण, आदिवासी किसानों को mobilise करने से हटकर शहरों में व्यकतिगत हत्याओं और सम्पत्ति के नुक्सान पर शिफ्ट हो गया, तो आन्दोलन को मिडिल क्लास और सरकार के हिंसक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. ऐसी विपरीत परिस्थितियों में आन्दोलन ज्यादा दिन अपने पैरों पर खड़ा नही रह सका. और आन्दोलन में कई बार विभाजन आदर्श, हिंसा में यकीन, प्रजातंत्र को समर्थन आदि के मुद्दे पर हुए.

कनु सान्याल को 1970 में गिरफ्तार कर लिया गया और पार्वतीपुरम कांस्पीरेसी केस में चार्ज शीट किया गया. चारू मजुमदार की मृत्य कलकत्ता के जेल में 1972 में हो गयी. तब तक कनु सान्याल हिंसा में यकीन छोड़ चुके थे और उनका यकीन संसदीय प्रजातंत्र में हो चला था. एक वजह ये भी हो सकती है कि कनु सान्याल का फोकस ग्रामीण, आदिवासी किसानों को संगठित करना रहा था. चारु अपनी असामयिक मौत के साथ लीजेंड बन चुके थे. पर एक नेता जिसे भुला दिया गया था, वे थे जंगल संथाल. पुरे नक्सलबारी इलाके में उनका स्मारक नहीं है. कई आंदोलनों को अच्छे परिवारों से आने वाले नेताओं ने हड़प लिया था. इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, ऐसे नेताओं के द्वारा जो मार्क्सिस्ट साहित्य में ‘petty bourgeoisie’ कहकर हिकारत की नज़र से देखी जाते हैं.

जंगल संथाल ने सबसे पहले 1949 में नेपाल में राजशाही की सामंतवादी शासन के खिलाफ आन्दोलन में हिस्सा लिया था.  नक्सलबारी आन्दोलन में हिस्सा लेने के लिए वे लम्बे समय के लिए जेल में कैद रहे और काफी कठिन वक़्त बिताया. 1979 में उन्हें जेल से रिहाई मिली. जेल से निकलने के बाद उन्होंने खुद को आन्दोलन से कटा हुआ पाया. लोगों ने उन्हें हाशिये पर डाल दिया था. वे निराशा के अन्धकार में डूब गये. अंततः 9 साल के बाद 1988 में गुमनामी की जिंदगी जीते हुए वे मौत में मुंह में चले गये.

पर सवाल अब भी बना हुआ है: क्या चारु उतने नामचीन हस्ती हो पाते, अगर उन्हें जंगल संथाल की संगठनिक क्षमता का साथ नहीं मिल पाता? फिर जंगल संथाल को उन्हें हिस्से की ख्याति क्यों नही मिली?

 


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