रालोसपा की नयी चाल: एनडीए में बने रहने के लिए उपेन्द्र कुशवाहा ने एनडीए के सामने 25 सूत्री मांगे रखी

पटना: उपेन्द्र कुशवाहा दिन प्रतिदिन एनडीए में अपनी राजनीतिक जमीन खोते जा रहे हैं.  अब नया पैतरा बदलते हुए उन्होंने एनडीए और एनडीए के प्रमुख घटक जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के सामने उन्होंने पचीस सूत्री मांगे रखीं हैं. उनका कहना है कि अगर उनकी ये मांगे मान ली जाएँ, तो वे न केवल एनडीए में बने रहेंगे, बल्कि ज्यादा सीटों की अपनी मांग भी छोड़ देंगे.

यह है उपेन्द्र कुशवाहा की प्रमुख मांगें-
1. विद्यालयों में आयोग के जरिए हो शिक्षकों की बहाली
2. 2003 और उसके बाद के शिक्षकों का पुनर्मूल्यांकन हो
3. सभी स्तरों पर नियुक्त शिक्षकों को समान वेतन
4. उर्दू पढ़ाने वाले शिक्षकों की नियुक्ति हो
5. शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से पूर्णरूप से मुक्त रखा जाए
6. सभी स्कूलों में छात्र व शिक्षकों के लिए बायोमेट्रिक व्यवस्था
7. मिड-डे-मील से शिक्षकों को दूर रखा जाए
8. प्राईवेट स्कूल की मनमानी रोकने विशेष उपाय
9. विद्यालय, महाविद्यालय में व्यवसायिक शिक्षकों की बहाली हो
10. मदरसों का अविलंब आधुनिकीकरण किया जाए

मांगों की लिस्ट को देखने से इस निष्कर्ष पर तुरंत पहुंचा जा सकता है कि इन मांगों को माना नहीं जाएगा. ये बात उपेन्द्र कुशवाहा भी अच्छी तरह जानते हैं और उनका असली उद्देश्य नीतीश कुमार को घेरना है.

शिक्षा में सुधार को लेकर रालोसपा प्रमुख की 25 सूत्री मांग पर बिहार के शिक्षा मंत्री केएन वर्मा ने कहा कि कुशवाहा हमारे महत्वपूर्ण सहयोगी हैं, उनकी मांग पर गंभीरता से विचार किया जाएगा. वर्मा ने कहा कि कुशवाहा शिक्षा में सुधार की बात बहुत दिन से कह रहे थे लेकिन अब जा कर सलाह दी है. वहीं जदयू प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा कि 25 सूत्री मांग पत्र में 25 गलतियां हैं. इस बीच, राजद प्रवक्ता भाई बीरेंद्र ने कहा कि कुशवाहा अब राजग में क्यों हैं यह समझ में नहीं आ रहा है.

अगर उपेन्द्र कुशवाहा की मांगों को गौर से देखा जाए तो हम पाते हैं कि उनका असली उद्देश्य एनडीए में रहना नहीं है, बल्कि नीतीश कुमार को embarass करना है. उन्होंने बिहार में समान काम के लिए समान वेतन, मिड डे मील का मुद्दा उठा कर नीतीश कुमार की दुखती रग पर हाथ रखने का प्रयास किया है. हाल के वर्षों में नीतीश कुमार बिहार में शिक्षा के फ्रंट पर विरोधियों द्वारा लगातार घेरे गये हैं. चुनाव में सीटों के बंटवारे का आधार वोट बैंक की ताकत होता है, पर कुशवाहा ने प्रशासन सम्बन्धी मुद्दों को उठाकर बिहार में अपनी पैंठ गहरी बनाने के प्रयास करते दिख रहे हैं. वे जानते हैं कि अगर वे नीतीश कुमार पर सुधारों के लिए प्रेशर बना पाए, तो फिर उनका प्रभाव क्षेत्र कुशवाहा वोट बैंक से बढ़कर बिहार के अन्य वोटर्स के बीच हो पायेगा. और अगर नीतीश कुमार इन मांगों के लिए राजी नहीं होते, तो वे खुद को शहीद और सुधारक के रूप में जनता के सामने प्रोजेक्ट कर सकते हैं.

2005 से दो साल पीछे करके 2003 से शिक्षकों का पुनर्मूल्यांकन की बात उठाकर कहीं न कहीं उन्होंने राजद को भी निशाने पर लेने का प्रयास किया है. दरअसल ये कुशवाहा की लॉन्ग टर्म स्ट्रेटेजी का हिस्सा है. वे लोकसभा चुनाव से ज्यादा 2020 के बिहार विधान सभा चुनाव को देख रहे हैं और नीतीश कुमार से नाराज वोटर्स को अपने पक्ष में लेने के लिए पब्लिक प्लेटफार्म से मुहीम चला रहे हैं. वे 2020 में खुद को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. और इसके लिए उन्हें नीतीश कुमार से लोहा लेना होगा. एनडीए में बने रहकर वे ऐसा नहीं कर सकते. इसके साथ ही उन्हें राजद के साथ महागठबंधन का हिस्सा रहने के बावजूद राजद और तेजस्वी पर भी परोक्ष रूप से निशाना साधना होगा.

इन परिस्थितियों में आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर कुछ दिनों में या तो उपेन्द्र कुशवाहा को एनडीए से बाहर निकाल दिया जाए, या फिर वे खुद बाहर निकलने की घोषणा कर दें. उनकी लम्बी चौड़ी मांगें कम से कम इसी ओर इशारा कर रही हैं.


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