जदयू राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर पटना यूनिवर्सिटी के VC से मिलने गये; ABVP के हमले में बचे

जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर पटना यूनिवर्सिटी में ABVP के हमले में बचे. उस समय वे पटना यूनिवर्सिटी के VC के चैम्बर से निकल रहे थे. हालाँकि उन्होंने ट्वीट करके बताया कि वे सुरक्षित हैं, हालाँकि उनकी गाडी को हल्का नुक्सान पहुंचा है. पथराव में उनकी गाडी के शीशे टूट गये. 
सवाल ये है कि जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष क्योंकर VC से मिलने चले गये?
प्रशांत किशोर अभी परफॉरमेंस के प्रेशर में हैं. उन्हें पार्टी के अन्दर आर सी पी सिंह से भी निपटना है और उनका कद छोटा करना है. उनकी ताकत है नीतीश कुमार का उन पर भरोसा. फिलहाल पार्टी में उनका अपना गुट नहीं है, जो वे चाहेंगे कि समय के साथ बनाएं. फिलहाल टीम के नाम पर उनकी IPAC के लड़के हैं, जो डाटा एनालिसिस का काम करते हैं, और वे युवा जो राजनीति में मौके की तलाश में उनके साथ जुटे हैं. उन पर युवा जदयू की जिम्मेवारी है और उनका पहला टारगेट है पटना यूनिवर्सिटी में छात्र जदयू को जीताना. ऐसे में राजनीतिक दल के राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष होते हुए वे पटना यूनिवर्सिटी के VC से मिलने चले गए.  भाजपा के प्रोफ़ेसर संजय पासवान ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि ये इलेक्शन को प्रभावित करने की रणनीति है. भाजपा नेता अपनी आलोचना में सही हैं. आखिर सत्ता पक्ष का नंबर टू नेता किन मुद्दों के साथ यूनिवर्सिटी के VC से मिलने चला जाता है !!
पटना यूनिवर्सिटी का छात्र चुनाव छोटा मसला है. राजनीतिक दलों ने इसे प्रेस्टीज इशू बना लिया है. लोक सभा चुनाव नजदीक होने के कारण हर राजनीतिक दल अपनी ताकत तौलने में लगा है. ऐसे में यूनिवर्सिटी का माहौल खराब हो गया है. आये दिन प्रत्याशी पर हमले हो रहे हैं. पर तमाम महत्त्व देने के बावजूद सच्चाई यही है कि पटना युनिवेर्सिटी छात्र चुनाव बिहार में लोकसभा के वोटरों का रुझान नहीं दिखाएगा. ऐसे में राजनीतिक दलों के नेताओं के ईगो ज्यादा बड़े हो गए हैं. पटना यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव के नतीजे के इतिहास पर हम गौर करें तो पाते हैं कि इसके छात्र नेता बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सफल रहे हैं. नीतीश कुमार, लालू यादव, सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, प्रोफ़ेसर रणबीर नंदन आदि तमाम नाम जेहन में आते हैं. इसी कारण से यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स को राजनीति की नर्सरी  कहा जाता है. पर ये जो भी नेता हैं, वे जेपी आन्दोलन की उपज हैं. पर उस समय से वक्त बदला है. राजनीति का कारपोरेटीकरण हुआ है. आसमान से नेता उतरने लगे हैं जो आते ही पार्टी में उच्च स्थान पाते हैं और फिर वर्षों से कार्य कर रहे, पार्टी के सिद्धांतों के प्रति समर्पित कार्यकर्ता दरकिनार कर दिए जाते हैं. 
प्रशांत किशोर ने दिखाया है कि उनका कोई राजनीतिक आदर्श नहीं है, कोई राजनीतिक प्रतिबद्दता नहीं है, बस सफलता मिलनी चाहिए. पोल मेनेजर से नेता बने प्रशांत किशोर सिर्फ महत्वाकांक्षा से प्रेरित है. वे एक साथ कांग्रेस, भाजपा, जदयू सबके साथ काम करने में सक्षम हैं. ऐसे युवा की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा काफी गुल खिलाएगी. 2020 में बिहार विधान सभा चुनाव  तक उनकी हिचकोले भरी राजनीतिक यात्रा काफी कुछ दिखायेगी. बैकरूम पॉलिटिक्स उनके काम करने की पहचान है. उनके कार्यशैली का अध्ययन करना रोचक रहेगा. 
इन सबके बावजूद मै उन पर हुए हमले की निंदा करता हूँ. यह दिखा रहा है कि बिहार के विश्विद्यालयों में छात्र राजनीति में कितनी सड़ांध पैदा हो गयी है. जाने राजनीति के ये नर्सरी राज्य को कैसे पौध देंगे और उनके फल कितने विषैले होने वाले हैं !!

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