बिहार की राजनीति कभी बंगले के इर्द गिर्द, तो कभी 1 अने मार्ग के आम के फलों के इर्द गिर्द घुमती

बिहार की राजनीति में हाल के दिनों में पतन के स्पष्ट संकेत मिले हैं. मुद्दे गायब हो चले हैं, गाली गलौज, व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप की बौछार हो चली है. सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं की एक लिस्ट बनायी जा सकती है, जिनका काम सिर्फ नेता प्रतिपक्ष के ऊपर व्यक्तिगत हमले करने तक रह गया है. इस काम में स्पस्ट रूप से संजय सिंह और नीरज कुमार का नाम सबसे ऊपर है. रिवेंज पॉलिटिक्स की शुरुआत हो गयी है, और इसमें तेजी आई है जब से भाजपा और जदयू साथ आये हैं.

अगर एक साल के इनके बयानों की लिस्ट बनायी जायेगी, तो हास्य और क्षोभ की स्थिति पैदा होती है. इनका व्यवहार ऐसा संकेत देता है मानों ये विपक्ष में बैठे हैं, वर्षों सत्ता में रहने के बाद भी जिम्मेवारी के एहसास से कोसों दूर. और इस स्थिति में नुकसान बिहार की आम जनता का हो रहा है.

बिहार की राजनीति सच में कभी सरकारी बंगले, तो कभी मुख्यमंत्री आवास के आम के पेड़ों और उस पर फलों को गिनने तक सिमट कर रह गयी है. ये राजनीति में घोर अवसरवादिता और नैतिकता के पतन की ओर इशारा कर रही है.

हालिया घटनाचक्र बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को आवंटित सरकारी बंगले को खाली करवाने से जुडा है. कल पुलिस तेजस्वी यादव के बंगले को खाली करवाने गयी, पर राजद के प्रतिरोध के चलते खाली हाथ लौटना पड़ा. ज्ञात हो कि सुशील कुमार मोदी के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार सरकार ने तेजस्वी को सरकारी आवास खाली करने को कहा था.  सरकार के फैसले को तेजस्वी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी. अदालत ने छह अक्टूबर, 2018 को तेजस्वी को आवास खाली करने का निर्देश दिया था.  फिलहाल मामला हाई कोर्ट के डबल बेंच के सामने विचाराधीन है. तेज प्रताप यादव की बातों में दम है जब वे कहते हैं, नीतीश सरकार हमारे परिवार को परेशान करने की कोशिश कर रही है, जब मामला कोर्ट में है तो सरकार क्यों परेशान है.

तेजस्वी यादव के बंगले के गेट पर एक नोटिस भी लगा है जिस पर लिखा है- मामला कोर्ट में है इसलिए बंगला खाली कराने का दबाव न बनाए.

इस पुरे मामले में तेजस्वी यादव ने भी आक्रामक रुक इख्तियार करते हुए कहा कि  विपक्ष का काम सरकार की कमियों को गिनाना है और ऐसा करने पर मुख्यमंत्री को उनके प्रति अपने मन में इतना ‘जहर’ और ‘गुस्सा’ नहीं रखना चाहिए कि उसका बदला कभी आवास के समीप निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाकर अथवा उनके आवास को खाली कराने की कार्रवाई का सहारा लें. तेजस्वी यादव  ने कहा कि आवास का मामला उच्च न्यायालय के दोहरी खंडपीठ के समक्ष विचाराधीन है जिसकी अगली सुनवाई आगामी 10 दिसंबर को होगी और अदालत के निर्णय से संतुष्ट नहीं होने पर वह उच्चतम न्यायालय तक जा सकते हैं.

उन्होंने जदयू के चार विधायकों, बिहार विधान परिषद के एक सदस्य तथा परिषद के पूर्व सदस्यों के मंत्री स्तर का बंगले पर कब्जा करने का आरोप लगाया. उन्होंने दो विधान पार्षद के मिले सरकारी आवास को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह और सांसद आरसीपी सिंह को किराए पर देने का आरोप लगाया.

बिहार की राजनीति में हाल के वर्षों में मुद्दा विहीन मुद्दों पर रह रहकर उबाल आ चुका है. इससे पहले तेजस्वी यादव के बंगले की निगरानी के लिए सरकार पर CCTV कैमरा लगाने का आरोप लगाया गया है. दबाब में आने के बाद सरकार ने कैमरा हटाया, पर तब तक फजीहत हो चुकी थी. याद दिला दूँ कि जब जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री थे, तो उस समय भी एक अने मार्ग में आम के पेड़ों के फल गिनवाये गए थे कि कहीं उन्हें तोड़ तो नहीं लिया गया.

जिस तरह से महागठबंधन के पूर्व घटकों जदयू और राजद के बीच वैमनस्य व्यक्तिगत हो गया है, वो बिहार की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं हैं. ऐसी अराजक स्थिति में बिहार की जनता को नुकसान उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि मुद्दा विहीन राजनीति से सिर्फ राजनीतिक दल लाभान्वित हो सकते हैं, आम जनता नहीं.

 


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