वो दो घंटे का पर्ल हार्बर पर जापानी हवाई हमला, जिसने दुसरे विश्व युद्ध की दिशा ही बदलकर रख दी

7 दिसम्बर 1941 रविवार की सुबह थी. प्रशांत महासागर में अमेरिकी मुख्य भूमि से 2000 किमी की दूरी पर अमेरिकी नौसेना का विशाल बेड़ा. प्रशांत महासागर के विशाल क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा करने के लिए तैनात. सुबह के आठ बजे थे कि एकाएक लगभग 2200 जापानी विमानों से आकाश भर गया. किसी को कुछ समझ नहीं आया. पर्ल हार्बर का अमेरिकी नौसेना बेड़ा जापान की मुख्य भूमि से 4000 किमी की दूरी पर था. किसी को सपने में भी अनुमान नहीं था कि जापान इतनी दूर आकर हवाई हमले करेगा. पर 7 दिसंबर की सुबह हर उम्मीद से परे तबाही की कहानी रची गयी. उस हमले ने 2400 से अधिक अमेरिकी मारे गए और 1000 से अधिक लोग घायल हुए. 300 लड़ाकू विमान नष्ट कर दिए गये, 20 अमेरिकी युद्धपोत और 8 अन्य फ्रिगेट समुद्र में डुबो दिए गये. अमेरिका सन्न रह गया. अगले ही दिन राष्ट्रपति फ्रेंक्लिन रूज़वेल्ट ने जापान पर युद्ध की घोषणा कर दी.

हालाँकि जापान का पर्ल हार्बर पर हमला एक चौका देने वाला हमला था, पर प्रशांत महासागर क्षेत्र में दशकों से जापान और अमेरिका के बीच प्रतिद्वंद्विता चल रही थी. खासकर जिस तरह से जापान चीन में अपने पाँव पसार रहा था, उससे अमेरिका नाखुश था. जापान का मानना था कि अपनी आर्थिक और जनसंख्या से जुडी समस्यायों से निपटने के लिए उसे पड़ोसी देशों में फैलना होगा और उनकी जमीन और उनके बाज़ार, उनके संसाधनों पर कब्ज़ा करना होगा. 1937 में जापान ने अपने पडोसी चीन पर युद्ध घोषित कर दिया और इसके चलते एक लंबा युद्ध शुरू हो गया. नानकिंग में कत्लेआम ने दुनिया का ध्यान जापानी युद्ध अत्याचारों की ओर खींचा.

इसके खिलाफ अमेरिका ने जापान पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबन्ध लगाए. अमेरिका की राय थी कि अगर जापान की पहुँच तेल, कच्चे माल, ग्लोबल मनी तक रोक दिया जाये, तो जापान को अपने भौगोलिक विस्तार की महत्वाकांक्षा पर रोक लगानी होगी.  लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों का उलटा असर हुआ. जापान और भी प्रतिबद्ध हो गया. वाशिंगटन और टोक्यो के बीच महीनों negotiations चले, पर कोई नतीजा नहीं निकला. ऐसा लगने लगा था कि युद्ध को टाला नहीं जा सकता.

पर्ल हारबर पर हमले की अमेरिकियों को खबर नहीं थी:

महीनों से टोक्यो में पर्ल हारबर पर हमले की तैयारी चल रही थी. पूरा ऑपरेशन एकदम गुप्त रखा गया. कहा जाता है कि इस ऑपरेशन की जानकारी सिर्फ एक आदमी को थी, स्टालिन जिसके टोक्यो में रुसी दूतावास में रुसी जासूसों ने इस प्लान की जानकारी स्टालिन को दी. पर स्टालिन ने इस जानकारी को रूज़वेल्ट के साथ शेयर नहीं किया. रूस उस समय नाज़ी हमले की जद में था और स्टालिन जीवन और मौत के संघर्ष में लगे हुए थे. स्टालिन की शिकायत थी कि पश्चिमी ताकतें वेस्टर्न फ्रंट नहीं खोल रही हैं, ऐसे में रूस पर नाज़ी हमले का पूरा प्रेशर पड़ रहा था. कोल्ड वार की नींव रखी जा रही थी.

अमेरिकी गुप्तचर आश्वस्त थे कि कोई भी जापानी हमला दक्षिण प्रशांत महासागर के किसी यूरोपियन उपनिवेश जैसे, सिंगापुर, इंडोनेशिया या फिर डच ईस्ट इंडीज पर होगी. चूँकि अमेरिकी घर के इतने नजदीक जापानी हमले की उम्मीद नहीं कर रहे थे, ऐसे में पूरा पसिफ़िक बेड़ा फोर्ड आइलैंड के पास सिमटा हुआ था और नजदीक के हवाई पट्टियों पर लड़ाकू विमान खड़े थे. जापानी लड़ाकू विमानों के लिए पर्ल हारबर एकदम आसान टारगेट था. जापानियों की सोच थी कि पसिफ़िक बेडा अगर नष्ट कर दिया जाए तो जापानी वायु सेना और नौसेना पुरे दक्षिण प्रशांत महासागर में फ़ैल जायेगी और अमेरिकी प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं रहेंगे.

8:10 बजे रविवार की सुबह सबसे पहला बम 1800 पोंड का, USS Arizona के डेक पर गिरा, जहाँ उसका हथियारों का स्टॉक रखा हुआ था. पुरे युद्धपोत में भीषण आग लग गयी और युद्धपोत 1000 नौसैनिकों के साथ समुद्र में डूब गया.

तबाही का ये मंजर अगले दो घंटे तक चला.

पर जापानी हवाई हमला अमेरिका के पसिफ़िक बेड़े को पूरी तरह नष्ट करने में सफल नहीं हो पाया. 1940 के दशक के आते आते युद्धपोत (Battleship) नौसेना के सबसे महत्वपूर्ण अंग नहीं रह गये थे, उनकी जगह एयरक्राफ्ट करियर (aircraft carriers) ने ले ली थी. हमले के दौरान एयरक्राफ्ट करियर पर्ल हार्बर बेस से दूर थे. इसके अलावा जापानी हमले में तट पर तेल टंकारों, मरम्मत की जगहें, शिपयार्ड, सबमरीन डॉक को नुकसान नहीं पहुंचा. इसके चलते अमेरिकी नौसेना इस अप्रत्याशित हमले से तेजी से उबर गयी.

अगले दिन आठ दिसम्बर को प्रेसिडेंट रूज़वेल्ट ( President Franklin D Roosevelt) ने कांग्रेस के जॉइंट सेशन को संबोधित करते हुए जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी.तीन दिन के बाद जापान के सहयोगी राष्ट्रों जर्मनी और इटली ने अमेरिका के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी.  पहली बार अमेरिकी लोगों ने भी अपने राष्ट्रपति के निर्णय का पूरा समर्थन किया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरू होने के दो साल बाद अमेरिका भी युद्ध में कूद पडा. इसने युद्ध का क्षेत्र बढ़ा दिया और अमेरिका का विशाल संसाधन अलाइड फोर्सेज ( जापान के खिलाफ पहले, बाद में जर्मनी के खिलाफ) के खिलाफ झोंक दिया गया. इस विश्व युद्द में अमेरिका एकमात्र ऐसा देश था जिसके युद्ध में भाग लेने के बाद भी उसके कल कारखानों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा. उसके मेनलैंड पर कोई हमला नहीं हुआ. दिन रात उसके कारखाने टैंक, हवाई जहाज़, बन्दूक, तोप, बनाने में लगे थे. अमेरिकी संसाधनों के आगे जापान का टिक पाना संभव् नहीं था.

जापान की मंशा थी कि अमेरिका उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाये, पर पर्ल हारबर हमले (Pearl Harbour Attacks) ने उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को उसके खिलाफ युद्ध में उतार दिया, जिसकी अंतिम परिणति जापान पर एटम बम के हमले और इतिहास में पहली बार जापान पर विदेशी ताकत के अधिकार के रूप में हुआ.


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