उपेंद्र कुशवाहा ने मंत्री पद से त्यागपत्र दिया, बिहार में अब खीर बनेगी

नयी दिल्ली : आखिरकार उपेन्द्र कुशवाहा ने एनडीए से अपनी राह एनडीए से अलग कर ली. रालोसपा (RLSP) अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी. साथ ही उन्होंने एनडीए से अलग होने की भी घोषणा कर दी. प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( Narendra Modi)  ने बिहार की जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया. स्पेशल पैकेज की मांग पूरी नहीं की. ना ही राज्य में शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोई कोशिश की. ऐसे में उनके साथ रहना प्रदेश के हित में नहीं होगा.

भाजपा (BJP) अध्यक्ष अमित शाह  के द्वारा उनकी अधिक सीटों की मांग के दावे को नज़रंदाज़ करने  और साथ ही अमित शाह ( Amit Shah) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा सीट शेयरिंग पर बात करने के लिए समय नहीं दिये जाने से उपेन्द्र कुशवाहा नाराज चल रहे थे.  ऐसे में एनडीए में बने रहना उनके लिए आसान नहीं था. खासकर जब महा गठबंधन के घटक दल- राजद और कांग्रेस लगातार उन्हें अपने साथ लाने के लिए प्रस्ताव दे रहे थे.

उन्होंने इस अवसर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी तीखा हमला बोला और कहा कि उनका एकमात्र एजेंडा मुझे नुकसान पहुंचाना है.  राष्ट्रीय लोक समता पार्टी प्रमुख पिछले कुछ सप्ताहों से भाजपा और उसके अहम सहयोगी दल के नेता, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साध रहे हैं. उन्होंने एनडीए के घटक जदयू पर दवाब बनाने के लिए 25 सूत्री मांग पेश की थी और कहा था कि अगर ये मांगे मान ली जाती हैं, तो वे अधिक सीटों की मांगों से पीछे हट जायेंगे. पर राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में ये उनका राजनीतिक दाँव ज्यादा था, बजाय कि बिहार के हितों की बातें करने की. इन मांगों को मानना जदयू के लिए आसान नहीं था और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए कुशवाहा के प्रयासों की जदयू ने खिल्ली भी उडाई.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभी कुशवाहा की राह आसान नहीं है. महागठबंधन में भी सीट शेयरिंग पर अभी लम्बी चर्चा चलेगी. राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस देश की सबसे बड़ी पार्टी बनने की जद्दोजहद में है, ऐसे में कांग्रेस उनकी ज्यादा सीटों की मांग में रोड़ा अटका सकती है.  फिलहाल उपेन्द्र कुशवाहा का  ध्यान शरद यादव के दल के साथ अपनी पार्टी के  विलय पर होगा. ऐसे में उन्हें शरद यादव के रूप में एक राष्ट्रीय नेता का चेहरा मिल जाएगा, जो केंद्र में कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग पर बात प्रभावी तरीके से रख पायेगा, वही शरद यादव (Sharad Yadav) को भी बिहार की राजनीति में पाँव पसारने के लिए प्लेटफार्म मिल जाएगा. हालाँकि बिहार में सीट शेयरिंग पर अंतिम राय राजद की होने की ही संभावना है.

बिहार में कुशवाहा वोट की अच्छी खासी संख्या देखते हुए ये कहा जा सकता है कि महागठबंधन को उपेन्द्र कुशवाहा के साथ आने से फायदा मिल सकता है. ऐसे में एनडीए कुशवाहा के एनडीए से हटने के नुकसान की भरपाई करने के लिए अन्य दलों को साथ लाने की कोशिश कर सकता है. ऐसे में आने वाले दिनों में सन ऑफ़ मल्लाह मुकेश सहनी (Mukesh Sahni) पर एनडीए डोरे डाल सकता है. हालाँकि एनडीए (NDA) के राजनीतिक प्रयासों पर राजद भी नज़र गडाए रखेगा.

कुल मिलाकर बिहार में लोकसभा चुनाव नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और उपेन्द्र कुशवाहा ( Upendra Kushwaha) के बीच नेतृत्व की भी लड़ाई है. दोनों को अभी साबित करना है कि कुशवाहा वोट पर ज्यादा अधिकार किसका है. लोकसभा में कुशवाहा वोट पर दाँव की धमक विधान सभा चुनाव में दिखाई पड़ेगी जो 2020 में होने वाला है.

 


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