अपनी महत्वाकांक्षा के शिकार हुए उपेन्द्र कुशवाहा; NDA से अलग होते ही दो धड़े में बंटी रालोसपा

पटना: ऐसा लग रहा है कि रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा का कोई दाँव सही नही लग रहा है. उनकी पार्टी एनडीए छोड़ने के उनके निर्णय पर दो धड़े में बंट गयी है. ऐसा लग रहा है कि कुशवाहा ने अपनी ही पार्टी के विधायकों का यकीन खो दिया है. पार्टी के दोनों विधायकों ने उनके लिए गए फैसले के विपरीत एनडीए में ही रहने का निर्णय लिया है. इतना ही नहीं, उन्होंने खुद को असली रालोसपा घोषित कर दिया है और इस सिलसिले में चुनाव आयोग से मिलने का भी फैसला कर लिया है. 

ज्ञात हो कि पिछले कुछ महीने से उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए में सीट शेयरिंग के मसले को लेकर नाराज चल रहे थे. उनकी मांग एनडीए में अधिक सीट को लेकर थी, पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उनकी मांग को तवज्जो नहीं दे रहे थे. उन्होंने कुशवाहा को मिलने का भी समय नहीं दिया. दुसरी ओर, जब उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात करने की कोशिश की, तो मोदी बिना उनसे मिले विदेश यात्रा पर चले गये.

इधर नीतीश कुमार पर लगातार हमले की वजह से जदयू से भी उनकी ठन गयी. इतना ही नहीं, समय समय पर लोजपा के नेताओं ने भी उन्हें दो नावों पर सवारी से बचने की सलाह दी.  ऐसी परिस्थितियों में उनकी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) शनिवार को दो टुकड़ों में बंट गई. बिहार में रालोसपा के सभी दो विधायकों और इकलौते विधान पार्षद ने राजग(एनडीए) के साथ रहने की घोषणा करते हुए रालोसपा पर खुद दावा ठोंक दिया. इन नेताओं ने खुद को असली रालोसपा का नेता बताते हुए अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा पर व्यक्तिगत राजनीति करने का आरोप भी लगाया.

पटना में रालोसपा के दोनों विधायकों सुधांशु शेखर और ललन पासवान तथा विधान पार्षद संजीव श्याम सिंह ने एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित की. इस दौरान उन्होंने एनडीए  में ही रहने की घोषणा करते हुए कहा कि वे एनडीए में थे और आगे भी रहेंगे. उन्होंने कहा कि रालोसपा एनडीए से कभी अलग हुई ही नहीं है.

पटना में हुए संवाददाता सम्मेलन में रालोसपा के विधान पार्षद संजीव शेखर ने एनडीए  नेतृत्व पर विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि बिहार विधान मंडल में रालोसपा के तीनों सदस्य एनडीए  के साथ हैं और आगे भी रहेंगे. उन्होंने हालांकि एनडीए  नेतृत्व पर सवाल खड़ा करते हुए एनडीए  नेतृत्व से भागीदारी के हिसाब से हिस्सेदारी की भी मांग की. उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि एनडीए  उन्हें सरकार में प्रतिनिधित्व दे या नहीं दे परंतु वे एनडीए  को मजबूत करने के लिए काम करते रहेंगे.

इन तीनों नेताओं ने रालोसपा का दावा ठोंकते हुए कहा कि अगर जरूरत पड़ेगी तो वे लोग निर्वाचन आयोग से मिलकर अपनी बात रखेंगे. उन्होंने दावा करते हुए कहा कि रालोसपा के अधिकांश कार्यकर्ता भी उनके साथ हैं. उपेंद्र कुशवाहा पर व्यक्तिवादी राजनीति करने का आरोप लगाते हुए इन नेताओं ने कहा कि वे केवल अपने लाभ की बात करते हैें.

ऐसी परिस्थितियों में ये सवाल मुंह बाए खड़ा हो गया है कि क्या उपेन्द्र कुशवाहा पार्टी विहीन नेता हो जायेंगे?


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