MP विधानसभा एमएलए बनने के लिए छिंदवाडा जिले से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे कमलनाथ

भोपाल: मध्यप्रदेश विधान सभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के बाद कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री कमलनाथ विधान सभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. कमलनाथ ने संकेत दिए हैं कि वे छिन्द्वारा जिले से विधान सभा चुनाव लड़ेंगे. हालाँकि अभी स्पष्ट नहीं है कि जिले की किस विधान सभा सीट से वे चुनाव लड़ेंगे. नियम के अनुसार उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के छह महीने के अन्दर मध्यप्रदेश विधान सभा का सदस्य बनना जरुरी है. 72 वर्षीय कमलनाथ 1998 से लोकसभा सदस्य हैं. उन्होंने दून स्कूल और कोलकाता के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से पढ़ाई पूरी की है. इमरजेंसी के दौरान वे संजय गाँधी के बेहद करीबी थे. 1984 के दंगों में उन पर सिखों के खिलाफ भीड़ को उकसाने और नेतृत्व करने के आरोप हैं. मुख्यमंत्री पद की होड़ में उन्होंने मध्यप्रदेश के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को मात दी है.

छिंदवाडा जिले के समीकरण पर अगर नज़र डालें तो हम पाते हैं कि छिंदवाड़ा जिले में विधानसभा की सात सीटें हैं. इनमें से चार सीटें अमरवाड़ा (एसटी), परासिया (एससी), जुन्नारदेव (एससी) और पान्दुर्ना (एसटी) आरक्षित वर्ग के लिये है. कमलनाथ सामान्य वर्ग से ताल्लुक रखते है, इसलिये वह जिले में बची तीन सामान्य सीटों छिंदवाड़ा, सौंसर और चोराई से ही उपचुनाव में प्रत्याशी बन सकते हैं.

इस दफा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने छिंदवाड़ा जिले की सभी सात सीटों पर विजय हासिल की है. संयोग से छिंदवाड़ा जिले में कांग्रेस सौंसर विधानसभा सीट से सबसे अधिक 20,742 मतों के अंतर से जीती है और सौंसर विधानसभा क्षेत्र में ही कमलनाथ का निवास है और वह इसी विधानसभा क्षेत्र के मतदाता भी हैं.

छिंदवाड़ा से नौ बार सांसद कमलनाथ (72) बृहस्पतिवार को कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गये. इसके बाद कमलनाथ और कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से राजभवन में मुलाकात कर राज्य में कांग्रेस की सरकार बनाने का दावा पेश किया.

मध्य प्रदेश में RSS का सबसे ज्यादा प्रभाव माना जाता है. उस राज्य में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में सफलता पायी. बहुमत के लिए ज़रूरी 116 सीटों में से कांग्रेस को 2 सीटें कम यानी 114 सीटें  मिलीं. वहीँ भाजपा के हिस्से 105 सीट, बसपा के हिस्से 2 सीट और अन्य के हिस्से 5 सीटें गयीं. ऐसे में कांग्रेस को बसपा के बैशाखी पर निर्भर करना पड़ रहा है. राजनीतिक  विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी लहर के बावजूद बीजेपी को वैसी हार नहीं मिली और न ही कांग्रेस को एक बड़ी जीत. ये कांटे का मुकाबला रहा.

मध्य प्रदेश में डेढ़ फीसदी वोट नोटा को पड़े जो अपने आप में काफी अहम था. मध्य प्रदेश की 11 सीटों पर नोटा ने बीजेपी का खेल खराब कर दिया. जहां बीजेपी कांग्रेस के हाथों बेहद कम अंतर से हारी. कई सीटें तो ऐसी रहीं जहां जीत का अंतर महज़ 100 से कुछ ज्यादा ही था.


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