जहाँ माओवादियों ने 31 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतारा था,झीरम घाटी हत्याकांड की जाँच होगी

रायपुर: जैसे ही छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री के तौर पर भूपेश बघेल (Bhupesh Baghel)  के नाम पर कांग्रेस आलाकमान ने मुहर लगाई, उन्होंने सबसे पहले झीरम घाटी हत्याकांड का मुद्दा उठाया और कहा: “झीरम घाटी कांड आपराधिक साजिश थी. इसकी जांच के लिए समिति बनाई जाएगी.”

25 मई 2013 को हुए झीरम घाटी हमले में कांग्रेस नेता नंद कुमार पटेल (Nand Kumar Patel), महेंद्र करमा (Mahendra Karma), विद्या चरण शुक्ल (vidyaCharan Shukla)और उदय मुदलियार समेत 29 लोगों की मौत हो गई थी. आज़ाद भारत के इतिहास में यह सबसे बड़ा माओवादी हमला था. और राजनेताओं की हत्या की दृष्टि से भी यह सबसे बड़ा था. बस्तर इस समय देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित इलाक़ों में से एक है. झीरम घाटी को माओवादियों गतिविधियों का गढ़ माना जाता है.

क्या हुआ था उस दिन झीरम घाटी में? 

25 मई 2013 का दिन था. दोपहर के चार बजे थे. विधान सभा चुनाव की तैयारी जोरों से चल रही थी. प्रदेश में परिवर्तन यात्रा की शुरुआत बस्तर के सुकमा जिले से हो रही थी. अरसे बाद कांग्रेस के सभी दिग्गज नेता एक साथ नज़र आ रहे थे. सुकमा की सभा को संबोधित
करने के बाद कांग्रेसी नेताओं का काफिला दर्भा की ओर बढ़ चला. करीब 40 गाड़ियों का काफिला जैसे ही झीरम घाटी पहुंचा, यहाँ घाट लगाये माओवादियों ने विस्फोट किया. माओवादी सलवा जुडूम चलाने वाले कांग्रेसी नेता महेंद्र करमा को खोज रहे थे. उसके साथ साथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल की भी खोज शुरू हुई. तभी पीछे पीछे विद्याचरण शुक्ल की भी गाडी पहुँच गयी.

करमा के साथ गाड़ी में अजय सिंह, सत्तार अली, विक्रम मंडावी, मलकीत सिंह, चंद्रप्रकाश झाडी और करमा का एक गनमैन सवार था. गोलियों की आवाज उन्हें सुनाई दी, लेकिन उन्होंने इसे अपने समर्थकों की ओर से की जाने वाली आतिशबाजी समझा. अगले ही मोड़ पर
3-4 गोलियां करमा की गाडी में लगी. सभी गाडी से उतर कर जंगल में छिप गए. करमा अपने गनमैन के सतह गाडी के निचे लेट गये. इसके बाद हथियारबंद माओवादियों की संख्या कम देखकर महेंद्रकरमा के बॉडीगार्ड ने फायरिंग की.

सलवा जुडूम के नेता महेंद्र करमा

माओवादियों ने महेंद्र करमा का नाम सुनने के बाद तुरंत फायरिंग बंद करते हुए उन्हें सड़क किनारे बंधक बनाया. उन्होंने करमा को बन्दुक की बट से जमकर मारा. इसके बाद कांग्रेस्सियों को 50 मीटर दूर लेजाकर उलटा लेटने को कहा और 10 मीटर आगे करमा को खडा कर दिया. इसके बाद करमा पर AK 47 का पूरा मैगज़ीन खाली कर दिया. करमा की ह्त्या करने के बाद अन्य कांग्रेसी नेताओं को निशाना बनाया गया. माओवादियों ने घटना को अंजाम देने के बाद गाँव में शरण ली और फिर वहां से भागने में सफल रहे. घटना के कई घंटों के बाद भी पुलिस प्रशासन एक्शन लेने में नाकाम रहा. देर रत तक घायलों के जगदलपुर आने का सिलसिला चलता रहा. अस्पताल में ही महेंद्र करमा, नन्द कुमार पटेल, उनके बेटे और उदय मुदलियार की मृत्यु हो चुकी थी. दस दिन बाद विद्याचरण शुक्ल की मौत दिल्ली में उपचार के दौरान हो गयी. कुल मिलाकर 31 कांग्रेसी नेताओं की ह्त्या हुई. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस एक झटके में नेत्रिव्विहीं हो गयी.

अनुमान लगाया गया कि इस हत्याकांड में करीब 150 से अधिक महिला माओवादी शामिल थीं. हत्याकांड को अंजाम देने के बाद महिला माओवादी देर तक नाचती रहीं.

झीरम घाटी में मौत के नंगे नाच ने कई सवाल को जन्म दिया: 

इस हत्याकांड के बाद कई सवाल पैदा हो गये. मसलन, हमले के कुछ दिन पहले इसी झीरम इलाक़े में मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा हुई थी, तब वहां उनकी सुरक्षा के लिए 1786 सुरक्षाकर्मी तैनात थे. लेकिन कुछ ही दिन बाद कांग्रेस की विकास यात्रा के लिए इसी झीरम घाटी में सुरक्षा के लिए 218 कर्मियों की तैनाती थी.

छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल की लाश

महेंद्र कर्मा पर ज़ाहिर तौर पर नक्सली हमले का ख़तरा था. उन्हें ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई थी. नंदकुमार पटेल पर भी  एक से अधिक बार नक्सली हमला हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद माओवादियों के ख़िलाफ़ चल रहा कथित जनांदोलन सलवा जुड़ुम बंद हो चुका था और जैसा कि लोग कहते हैं महेंद्र कर्मा की उपयोगिता सरकार के लिए ख़त्म हो चुकी थी.

जिस समय हमला हुआ राज्य में भाजपा की सरकार थी और छह महीने बाद नई सरकार के गठन के लिए चुनाव होने वाले थे. दोनों दलों के बीच पिछले चुनावों में वोटों का अंतर सिर्फ़ एक फ़ीसद था. इस अंतर को पाटने के लिए कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल अच्छी रणनीति के साथ पार्टी को खड़ा कर रहे थे और भाजपा ज़ाहिर तौर पर डरी हुई थी.

इतने बड़े हमले के बाद राज्य सरकार को जिस तरह की कार्रवाई करनी थी, वह तो नहीं हुई. लेकिन इसके बाद एनआईए ने अपनी जांच के बाद जो चार्जशीट फ़ाइल की है उसमें भी कई बड़ी खामियां नज़र आयीं.  एनआईए ने अपनी जांच में बस्तर के तीन बड़े पुलिस अधिकारियों बस्तर के एसपी, सुकमा के एसपी और बस्तर के आईजी को पूछताछ के लिए ही नहीं बुलाया.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस के दोनों बड़े नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने तत्परता से राज्य का दौरा किया. लेकिन वे राष्ट्रपति शासन लगाने का फ़ैसला लेने से चूक गए. इसके बाद भाजपा यह झूठा प्रचार करने में भी सफल रही कि यह हमला कांग्रेस की अंदरूनी कलह का नतीजा था. दूसरा यह कि ऐन वक़्त पर परिवर्तन यात्रा का मार्ग बदलने की वजह से सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी.

अब क्या सही तस्वीर सामने आ पाएगी? 

झीरम घाटी हत्याकांड के बाद प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व विहीन हो गयी. ऐसे में प्रदेश के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ही प्रदेश में पार्टी को खड़ा किया. घटना को हुए 6 साल से ज्यादा हो चुके हैं. अब ऐसे में एक और सवाल मुंह बाए खड़ा हो गया है कि क्या हम 25 मई 2013 को हुए मौत के नंगे नाच का सच कभी जान पायेंगे?


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