एक अधुरा ख्वाब: 2020 में रामबिलास पासवान चाहेंगे कि चिराग को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखें

एनडीए से रालोसपा की आखिरकार विदाई हो गयी. ऐसे में एनडीए को निःसंदेह कुछ वोटों का नुकसान जरुर उठाना होगा. उपेन्द्र कुशवाहा अपने साथ कुछ वोट जरुर महागठबंधन के खेमे में ले जायेंगे और जब वे शरद यादव की पार्टी के साथ मिल जायेंगे, तो उनका वैल्यू महागठबंधन में और बढेगा. एनडीए में रहने से कुशवाहा के अस्तित्व पर बन आई थी और ऐसे में जब जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार से उनकी सीधी टक्कर हो चली थी, तो फिर उनके लिए अस्तित्व का सवाल भी पैदा हो गया था. कुशवाहा ऐसे नेता हैं, जो अपना भविष्य केंद्र की राजनीति में नहीं, बल्कि बिहार में देख रहे हैं.

बिहार में अपना राजनीतिक भविष्य देखने वाले कुशवाहा अकेले नहीं हैं. रामबिलास पासवान भी कुछ इसी तरह की सोच रखते हैं. पासवान सत्ता से जुड़कर रहने वाले राजनेता हैं. वे संघर्ष की राजनीति करने में यकीं नहीं करते. वे महत्वकांक्षी तो हैं, पर वे अपनी सीमाओं को जानते हैं. एक बार बिहार की राजनीति की चाभी उनके हाथों में आई थी, पर उन्होंने उसे गंवा दिया. पहले लालू यादव और फिर नीतीश कुमार के द्वारा लम्बी राजनीतिक पारी खेलने के चलते रामबिलास पासवान की राजनीतिक संभावनाएं बिहार में सीमित रहीं. ऐसे में इसकी भरपाई उन्होंने केंद्र में सत्ता में रहकर की.

पर 2019 उनके लिए फिर से संभावनाओं के द्वार खोल रहा है. उन्होंने खुद को चुनावी राजनीति से दूर रखने की घोषणा की है, पर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वे राजनीति से संन्यास ले रहे हैं. वे जानते हैं कि बिहार में पासवानों का वोट प्रतिशत सभी दलित जातियों में सबसे ज्यादा है, और ये वोट बैंक पूरी तरह उनके साथ है. और आज की तारीख में वे एकमात्र राजनीतिज्ञ हैं जिनमे अपने वोट बैंक को जिधर इच्छा हो, उधर मोड़ देने की ताकत रखते हैं. वे बस लोक सभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं, और केंद्र की राजनीति में राज्यसभा के रास्ते दखल देना चाहते हैं.

2019 रामबिलास पासवान के लिए संभावनाओं के द्वार खोल रहा है. रालोसपा के एनडीए से बाहर निकलने से ऐसी परिस्थितियां बनी हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के बीच तय फोर्मुले के अनुसार भाजपा और जदयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और बाक़ी सीटों पर रालोसपा और लोजपा को चुनाव लड़ना था. 17 सीटें अपने पाले में करना नीतीश कुमार का मास्टर स्ट्रोक रहा. पर अब जबकि रालोसपा को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, तो इसका फायदा सीधे सीधे लोजपा को मिलने जा रहा है. और एनडीए में तय फोर्मुले को बिना बिगाड़ते हुए यह कहा जा सकता है कि लोजपा बिहार में अब छह सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

सीटों का फायदा तो महज एक फायदा है. पर इससे बड़ा फायदा ये हुआ लोजपा को कि 2019 के लोक सभा चुनाव के अगले साल ही 2020 में बिहार में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं. और यह स्पष्ट है कि उपेन्द्र कुशवाहा की मुख्यमंत्री पद के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं. अब चूँकि कुशवाहा एनडीए में हैं नहीं, तो एक मौक़ा फिर से पासवान के हिस्से आया है जब वे विधान सभा चुनाव में शानदार परफॉरमेंस करके चिराग पासवान के लिए उपमुख्यमंत्री पद के लिए दावा ठोंके. एनडीए गठबंधन में भाजपा की ओर से सुशील मोदी पहले से उपमुख्यमंत्री हैं. नीतीश कुमार खुद कद्दावर नेता हैं. एनडीए में मुख्यमंत्री पद के लिए वैकेंसी नहीं है. पर एक और उपमुख्यमंत्री तो बनाया ही जा सकता है. फिलहाल इससे बेहतर राजनीतिक चाल पासवान के लिए कुछ नहीं हो सकती. खुद केंद्र में मंत्री और चिराग पासवान बिहार में उपमुख्यमंत्री. आने वाले दिनों में अमित शाह और नीतीश कुमार दोनों को इस राजनीतिक बारगेनिंग के लिए तैयार रहना होगा.

क्योंकि नीतीश कुमार और भाजपा दोनों नहीं चाहेंगे कि जीतन राम मांझी के महागठबंधन में चले जाने के बाद बिहार का सबसे कद्दावर दलित नेता उनके खेमे से बाहर चला जाए. ये सीधे सीधे एनडीए को दलित वोटों का नुकसान करवा देगा. लोजपा का एनडीए से बाहर जाने का मतलब 2020 के विधान सभा चुनाव में नीतीश कुमार की पक्की हार !

2014 के लोक सभा चुनाव में लोजपा सात सीटों पर चुनाव लड़ी थी और छह में जीत हासिल की थी. लोजपा ने समय समय पर भाजपा को आगाह भी किया है कि 2019 के लोक सभा चुनाव में बिहार में वे राम मंदिर का मुद्दा न उठायें. इससे लोक सभा में नुकसान उठाना पड़ सकता है. छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में चुनावी हार के बाद भाजपा रालोसपा की बिन मांगे सलाह को एकबारगी खारिज करने की स्थिति में नहीं है. लोजपा ने और साथ ही जदयू ने भी भाजपा को राहुल गांधी पर व्यक्तिगत हमले नहीं करने की सलाह भी दी है. भाजपा ने भी इस पर किसी तरह का प्रतिरोध का स्वर नहीं उठाया है.

लोजपा का सॉलिड वोट बैंक देखते हुए लोजपा की बात टालना फिलहाल भाजपा के लिए मुश्किल भी है. रालोसपा चीफ को तो अभी सिद्ध करना है कि कुशवाहा वोट उनके साथ है, और उस पर नीतीश कुमार का एकाधिकार नहीं है. पर लोजपा ने बार बार सिद्ध किया है कि पासवान वोट पर उनका एकाधिकार है.

ऐसे में इसका पूरा माइलेज राम बिलास पासवान 2020 के विधान सभा चुनाव में लेना चाहेंगे. अपने बेटे चिराग पासवान को बिहार के उपमुख्यमंत्री के रूप में देखकर. आखिर ये लोजपा सुप्रीमो का एक अधूरा ख्वाब है !!

 

 


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.