सत्ता की मलाई खाने की चाह में बिहार में कई रिटायर्ड नौकरशाह चुनाव लड़ने की तैयारी में

पटना: 2019 का लोक सभा चुनाव नजदीक आ रहा है. और प्रत्याशियों की कतार लम्बी होती जा रही है. इन्ही प्रत्याशियों में कई रिटायर्ड नौकरशाह हैं, जो सक्रिय नौकरी से रिटायर होने के बाद अब राजनीति में अपना भाग्य आजमाना चाहते हैं.

बिहार में कई रिटायर्ड नौकरशाह राजनीति में सक्रीय भूमिका निभा भी रहे हैं. इनमे सबसे ऊपर नाम है जदयू के राष्ट्रीय महासचिव आर सी पी सिंह का. वे वर्षों नीतीश के दायें हाथ रहे हैं. आईएस से वोलंटरी रिटायरमेंट लेकर वे राजनीति में आये. वे फिलहाल जदयू के टिकट पर राज्यसभा सांसद हैं, हालाँकि वे राज्यसभा में कम ही नज़र आते हैं. MP फण्ड के इस्तेमाल में उनका रिकॉर्ड कुछ ख़ास नहीं है. वे मुख्यतः पटना में रहते हुए जदयू के संगठन का काम देखते हैं. हाल के महीनों में उन्हें बिहार के विभिन्न जिलों में दलित/महादलित सम्मलेन किया, महिला समागम आयोजित किया, पिछड़ा/ अतिपिछडा सम्मलेन किया और पार्टी से लोगों को जोड़ने की कवायद की. हालाँकि उनका प्रयास बहुत सफल नहीं रहा जैसा कि कई प्रोग्राम में भीड़ की नगण्य उपस्थिति से पता चला. वे राज्य में बहुत लोकप्रिय नहीं हैं. पर ऐसा अमूमन हर नौकरशाह के साथ है. वे राज्य में जनता के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं होते.

ऐसे में सवाल पैदा होता है कि आखिरकार क्यों पार्टियाँ उन्हें सीधे लोकसभा का चुनाव लड़ा देती हैं? क्योंकि ऐसी मानसिकता किसी खास दल तक सीमित नहीं.  उनके वर्षों के प्रशासनिक अनुभव और मैन मैनेजमेंट से राजनीतिक दल भी लाभ उठाना चाहते हैं. इसी सोच का नतीजा है कि पवन वर्मा, एन के सिंह जैसे नौकर्सहः जदयू के टिकट पर संसद के दरवाजे खटखटाने में सफल हुए.

भाजपा ने भी केन्द्रीय गृह सचिव रहे आर के सिंह को आरा से  लोक सभा का टिकट दिया और वे अभी केन्द्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री हैं. इसी तरह बगहा से विधायक आरएस पाण्डेय भी आईएस अधिकारी रहे हैं.

फिलहाल चुनावी रेस में कई रिटायर्ड आईएस अधिकारी शामिल हैं. इनमे से एक हैं 1977 बैच के आईपीएस अधिकारी एके गुप्ता. पटना में कई ऑटो के पीछे गुप्ता जी का पोस्टर देखा जा सकता है. दुसरे बड़े नाम हैं पंचम लाल. पंचम लाल 1974 बैच के आईएस अधिकारी रहे हैं. पिछली बार वे पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ चुके हैं. इस बार उनकी कोशिश है कि महागठबंधन की ओर से वे उम्मीदवार बनें. माना जा रहा है कि पंचमलाल बिहार के किसी सुरक्षित सीट ( गोपालगंज या हाजीपुर) से अपनी किस्मत आजमाएंगे.

एक और कद्दावर नौकरशाह हैं बिहार के डीजीपी रह चुके आशीष रंजन सिन्हा. वे 2014 लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर नालंदा से लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं, पर सफलता नहीं मिलने पर उन्होंने पलटी मारी और अब भाजपा में आ चुके हैं.

इसके अलावा केपी रमैय्या के नाम से सब वाकिफ हैं. वे जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार के खिलाफ 2014 लोक सभा चुनाव सासाराम से लड़ चुके हैं. हालाकिं वहां से जीत भाजपा उम्मीदवार को मिली.

नौकरशाहों के रिटायरमेंट के तुरंत बाद सक्रीय राजनीति में आने की प्रवृति पर राजनीतिक विश्लेषकों ने कई बार चिंता जताई है. और सलाह   दी है कि सेवानिवृति और सक्रीय राजनीति में आने के बीच कम से कम पांच साल तक का गैप होना चाहिए. हालाँकि अब तक इस पर गंभीर राजनीतिक चिंतन नहीं हुआ है. पर सत्ता की मलाई खाने के फिराक में रहने वाले अवसरवादी नौकरशाहों पर लगाम लगाने के लिए ये बेहद जरुरी है. भारतीय प्रजातंत्र के लिए अवसरवादी और महत्वकांक्षी नौकरशाह बेहद खतरनाक संकेत हैं.

#2019LokSabhaElections


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