भारत सरकार मुंबई में जिन्ना हाउस का अधिग्रहण करेगी और इसे कल्चरल सेंटर में तब्दील करेगी

मुंबई: लम्बे समय से मुंबई में मालाबार हिल्स पर स्थित जिन्ना हाउस भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय रहा है. पर अब भारत सरकार ने लम्बे समय से चले आ रहे विवाद को विराम देने का फैसला किया है और यह तय किया गया है कि विदेश मंत्रालय जिन्ना हाउस का अधिग्रहण करेगी और इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक केंद्र में बदलेगी.


विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि जहां तक इस संपत्ति की बात है, तो पाकिस्तान को बोलने का कोई अधिकार नहीं है। यह भारत सरकार की संपत्ति है और इसका जीर्णोद्धार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जिन्ना हाउस का उपयोग हैदराबाद हाउस की तर्ज पर ही करने का निर्णय लिया है और इसी के तहत उसे तैयार किया जा रहा है। बता दें कि केंद्र सरकार हैदराबाद हाउस का उपयोग विदेशी मेहमानों के साथ बैठक करने और उनके सम्मान में आयोजन करने के लिए करती है।

ज्ञात हो कि मुंबई के मालाबार हिल इलाके में समुंदर किनारे बने जिन्ना हाउस का निर्माण आर्किटेक्ट क्लाउड बैटले ने यूरोपियन शैली में किया था. पाकिस्तान के संस्थान मोहम्मद अली जिन्ना इस भवन में 1930 के दशक के अंत में कुछ सालों तक रहे थे. पाकिस्तान लगातार इस संपत्ति पर अपना हक होने का दावा ठोकता रहा है और उसकी मांग है कि यह भवन उसे मुंबई में अपना दूतावास स्थापित करने के लिए हैंडओवर कर दिया जाए. जिन्ना की बेटी दीना वाडिया ने अगस्त 2007 में बांबे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने खुद को जिन्ना का कानूनी उत्तराधिकारी बताते हुए इस भवन का कब्जा देने की मांग की थी. दीना वाडिया की मौत के बाद यह मुकदमा उनके बेटे व वाडिया समूह के चेयरमैन नुस्ली नेविले वाडिया लड़ रहे हैं.

जिन्ना हाउस मुंबई में मालाबार हिल्स पर ढाई एकड़ ज़मीन पर बना हुआ है, जिसकी अनुमानित कीमत 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 2,603 करोड़ रुपये) है. अखरोट की लकड़ी की पैनलिंग के साथ इटैलियन संगमरमर के इस्तेमाल से बने शानदार खूबसूरत खंभों वाला जिन्ना हाउस कई दशक तक ब्रिटेन के डिप्टी हाईकमिश्नर का आवास भी रहा, लेकिन वर्ष 1982 में खाली होने के बाद से इस्तेमाल में लगभग नहीं है.

विभाजन के बाद भारत ने ऐसी सभी चल तथा अचल संपत्ति को जब्त कर लिया था, जो उन लोगों द्वारा छोड़ी गई थी, जिन्होंने पाकिस्तान जाने का निर्णय किया था, और इस तरह की संपत्ति को ‘विस्थापितों की संपत्ति’ करार दिया गया था. लेकिन सद्भावना के तहत उठाए गए कदम के तौर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यह सुनिश्चित करवाया कि मोहम्मद अली जिन्ना या उनकी पुत्री को विस्थापित न लिखा जाए, और न ही उनकी संपत्ति को ‘विस्थापितों की संपत्ति’ के रूप में दर्ज किया जाए.

पिछले ही सप्ताह संसद ने नए शत्रु संपत्ति कानून को पारित किया है, जिसमें कहा गया है कि बंटवारे के वक्त पाकिस्तान और चीन चले गए लोगों के वंशजों का उस संपत्ति पर कोई दावा नहीं रहेगा, जो उनके परिवारों ने भारत में छोड़ी थी.

 


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