बिहार की दो लोकसभा सीटों पर उपचुनाव नहीं होंगे; विधानसभा उपचुनाव में दल ताकत आजमाएंगे

पटना: बिहार में एक बार फिर मुख्य चुनाव से एनडीए और महागठबंधन के दल ताकत आजमाईश करेंगे और अपने अपने जनाधार को परखेंगे और फिर यथोचित रणनीति बनायेंगे. बिहार में लोक सभा की दो और विधानसभा की दो सीटें खाली हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम समय रह गये हैं. ऐसे में राज्य की दो संसदीय और एक राज्य सभा सीट पर चुनावी मुकाबला नहीं होगा. दोनों लोकसभा सीट पर चुनाव 2019 के आम चुनाव के साथ ही कराये जायेंगे. ज्ञात हो कि बेगुसराय लोकसभा सीट भाजपा सांसद भोला सिंह के देहांत और किशनगंज लोक सभा सीट कांग्रेसी सांसद असरारुल हक के देहांत के बाद खाली हो गयी है. दूसरी तरह राज्यसभा सांसद शरद यादव की राज्यसभा की सदस्यता को लेकर कोर्ट के फैसले का चुनाव आयोग अभी इन्तजार कर रहा है.

बिहार विधान सभा की दो सीटें फिलहाल खाली हैं. देहरी ऑन सोन के विधायक इलियास हुसैन के कोर्ट के द्वारा दोषी घोषित होने के बाद देहरी की सीट खाली हुई है. वहीँ दूसरी ओर, राजद विधायक राज्बल्लभ यादव के नाबालिग के साथ बलात्कार केस में दोषी घोषित होने के बाद ये सीट भी खाली हो जायेगी. हालाँकि अभी तक नवादा सीट के लिए अभी अधिसूचना जारी नहीं की गयी है.

ज्ञात हो कि जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधान के अनुसार, आम चुनाव के एक साल पहले तक रिक्त होने वाली सीटों पर उपचुनाव नहीं कराने का प्रावधान है.

अलकतरा घोटाल में दोषी होने के बाद इलियास हुसैन विधान सभा की सदस्यता गंवा चुके हैं:

अगर विधान सभा उपचुनावों की बात करें, तो देहरी ऑन सोन विधान सभा सीट पर 2005 में निर्दलीय उम्मीदवार प्रदीप कुमार जोशी ने  जीत हासिल की थी, उनके जेल जाने के बाद उनकी पत्नी ज्योति रश्मि ने 2010 में इस सीट से जीत  हासिल की. 2015 में राजद के इलियास हुसैन ने इस सीट से  जीत   हासिल   की.

इलियास हुसैन राजद  में बडे़ मुस्लिम चेहरे के रूप में जाने जाते हैं और राजद सुप्रीमो लालू यादव के करीबी माने जाते हैं. सीबीआई की विशेष अदालत ने इलियास हुसैन को अलकतरा घोटाला में दोषी पाते हुए चार साल सश्रम कारावास तथा दो लाख रुपये जुर्माना की सजा दी थी.  अलकतरा घोटाला झारखंड के चतरा जिले से संबंधित है. इसमें 375 मीट्रिक टन अलकतरा की हेराफेरी कर 18.75 लाख रुपये का घोटाला किया गया था. आरोप था की कि घोटाले के पैसे से इलियास हुसैन ने रिवॉल्वर, स्टीम कार तथा चांदी का टी-सेट सहित अन्य कई चीजें खरीदी थीं. घटना 1992-93 की है. इलियास हुसैन उस वक्त सड़क निर्माण मंत्री थे. उन्हें अयोग्य ठहराए जाने के बाद 243 सीट वाली विधानसभा में राजद विधायकों की संख्या घट कर 80 हो गई है.

इससे पहले बिहार के सुपौल से जुड़े 39 लाख के अलकतरा घोटाले के एक अन्‍य मामले में 21 साल बाद सीबीआइ की विशेष अदालत ने 24 मई 2017 को इलियास हुसैन को आरोप मुक्त कर दिया था.

इन पर सीपीसी की धारा 407 और 420, भ्रष्टाचार निरोधक एक्ट की धारा 13 (2)आर-13 के तहत सजा सुनाई गई थी. अब उनके खिलाफ विधानसभा द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 और संविधान के अनुच्छेद 191 (ई) के प्रावधानों के तहत यह कार्रवाई की गई है.

इलियास  हुसैन ने लोकदल से पहली बार 1977 में डिहरी से विधानसभा चुनाव जीत कर संसदीय जीवन की शुरुआत की थी. 1980 में लोकदल से ही एक बार फिर चुनाव जीते. 1985 में वे चुनाव  हार गए. फिर जनता दल से 1990 में विधायक बने और पहली बार लालू मंत्रिमंडल में पथ निर्माण मंत्री बनाए गए. इसके बाद वे लगातार लालू-राबड़ी मंत्रिमंडल में 2005 तक मंत्री रहे. पहली बार राजद से 2000 में विधायक चुने गए. 2005 व 2010 में इन्हें हार का सामना करना पड़ा.  2015 में इन्होंने फिर चुनाव जीता. इलियास  हुसैन राजद के गठन के बाद से ही (1997) राष्ट्रीय महासचिव, प्रवक्ता पद पर रहे.

2015 के विधान सभा चुनाव में महागठबंधन में राजद, जदयू और कांग्रेस साथ थे और इस सीट पर राजद उम्मीदवार को खड़ा किया गया था. इस बार परिस्थितियां बदल गयी हैं. अब देखने वाली बात होगी कि इस सीट पर जदयू या भाजपा में से कौन दल अपना उम्मीदवार खड़ा करेगा.

नवादा विधानसभा सीट पर बलात्कार के मामले में राजद विधायक राज बल्लभ यादव के दोषी घोषित होने के बाद उपचुनाव होगा:

राजद विधायक राज बल्लभ यादव नवादा के दबंग नेता है. इलाके में उनकी तूती बोलती है. आरोप तो ये है कि उन्होंने सिर्फ नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया, बल्कि नाबालिग लड़की की बड़ी बहन के साथ भी बलात्कार किया. उस वक्त भी सुलेखा ही लड़की की बहन को राजबल्लभ के पास लेकर गई थी और इसके एवज में सुलेखा को 1 लाख रुपये मिले थे.

1990 में जब लालू यादव के बिहार के मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा आया तो उस समय जनता दल को  बिहार में विधानसभा में बहुमत जुटाने के लिए 10 सीटें कम पड़ रही थीं. बीजेपी के पास 39 विधायक थे. एक विधायक कृष्णा यादव पार्टी को तोड़ते हुए 10 विधायकों के साथ जनता दल में शामिल हो गए. कृष्णा यादव की बदौलत लालू यादव की सरकार बन गई. राजबल्लभ यादव इन्हीं कृष्णा यादव के छोटे भाई हैं.

कृष्णा यादव नवादा जिले के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के इंग्लिश पथरिया गांव के रहने वाले थे. उनके पिता जेएल प्रसाद कांग्रेस के नेता थे  और कांग्रेस से जिला परिषद अध्यक्ष बने थे. उनके बेटे कृष्णा प्रसाद बीजेपी से विधायक बन गए. बीजेपी से जनता दल में जाने के बाद कृष्णा प्रसाद को लालू यादव का अच्छा खासा सपोर्ट मिला. नवादा के एक वरिष्ठ पत्रकार उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं कि कृष्णा प्रसाद विधायकी करते रहे. उनके एक भाई मुखिया बन गए और एक भाई राजबल्लभ घर पर रहने लगे. कहा जाता है कि राजनैतिक संरक्षण मिला तो राजबल्लभ ने अपने घर के पास पत्थर के पहाड़ से अवैध तरीके से पत्थर बेचने शुरू कर दिए. इससे उन्होंने करोड़ों रुपये कमाए. कृष्णा प्रसाद विधायकी का एक टर्म भी पूरा नहीं कर सके कि एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई. इसके बाद लालू ने कृष्णा यादव  की पत्नी को एमएलसी बना दिया, हालाँकि राजबल्लभ को विधानसभा का टिकट नहीं मिला. ऐसे में राजबल्लभ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर  चुनाव में उतर गए. आयोग की ओर से छाता चुनाव चिह्न मिला और जीत गए. 1995 के विधानसभा चुनाव में लालू ने राजबल्लभ को नवादा से टिकट दिया और राजबल्लभ यादव जीत गए. फिर लालू ने उनको मंत्री भी बनाया.

2005 में जब लालू यादव की सत्ता गई तो राजबल्लभ भी चुनाव हार गए. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने नवादा के पहाड़ का लीज एग्रीमेंट कर दिया. पत्थर निकालने के लिए चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी ने लीज ली और काम शुरू किया. लेकिन राजबल्लभ यादव का ऐसा रूतबा था कि  पत्थर लेकर निकल रही कंपनी की गाड़ियों से रंगदारी वसूलते रहे. नतीजा ये हुआ कि चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी ने लीज छोड़ दी. 2010 में एक बार फिर विधान सभा चुनाव  हारे. तब इस सीट पर जीत मिली थी जदयू उम्मीदवार पूर्णिमा यादव को . 2015 में महागठबंधन बना और जदयू, राजद और कांग्रेस ने हाथ मिलाया. इसका फायदा राज बल्लभ को मिला.  राजबल्लभ फिर से चुनाव जीतकर विधायक बन गए. 2016 में रेप केस दर्ज हुआ और 2018 में कोर्ट ने उसको रेप का दोषी पाया है.

इस साल हुए विधानसभा उपचुनावों में जदयू को बार बार राजद के हाथों हार मिली है. अब ऐसे में जदयू चाहेगा कि कम से कम एक सीट वो अपने नाम करे, क्योंकि विधानसभा उपचुनाव में जीत या हार आगे की रणनीति तय करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.


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