2019 लोकसभा चुनाव मुकेश सहनी, कुशवाहा और जीतनराम मांझी के लिए अस्तित्व की लड़ाई है

बिहार में लोक सभा चुनाव की तैयारी बेहद रोचक दौर में चली गयी है. रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा को लोकसभा की 6 और राज्यसभा में 1 सीट देने के बाद एनडीए में सीटों के बंटवारे की तस्वीर साफ़ हो गयी है. अब राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान महागठबंधन पर चला गया है. राजद सुप्रीमो लालू यादव ने स्पष्ट किया है कि सीट शेयरिंग की बात खरमास के बाद की जायेगी. जिस तरह से महागठबंधन में पार्टियों का जमावड़ा हो गया है, उससे जाहिर है कि महागठबंधन में भी सीटों को लेकर लट्ठमार स्थिति पैदा होने वाली है.

फिलहाल महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा, शरद यादव की पार्टी, सन ऑफ़ मल्लाह मुकेश सहनी की  विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), और जीतनराम मांझी की हम ( हिन्दुस्तानी अवाम पार्टी) शामिल है.

मुकेश सहनी को साबित करना है कि निषाद वोट पर उनका प्रभाव है: 

मुकेश सहनी जिद पर अड़े हुए थे कि उन्हें एनडीए में रामविलास पासवान से एक सीट ज्यादा दिया जाये, क्योंकि बिहार में निषादों की संख्या दुसादों से ज्यादा है. एनडीए के लिए मानना संभव नहीं था. लिहाजा वे महागठबंधन में आ चुके हैं. इनकी मुख्य मांग है कि निषाद जाति को अनुसूचित जाति (SC) की सूची में शामिल किया जाये. बिहार सरकार ने केंद्र सरकार को इसकी अनुशंसा भेज रखी है. फिलहाल गेंद केंद्र सरकार के पाले में है.

रविवार को मुकेश ने घोषणा की कि माछ भात खाएंगे और महगठबंधन को जिताएंगे और अगर एनडीए दोहरे अंक में पहुंच गया तो राजनीति नहीं करेंगे.  फिलहाल उन्हें साबित करना  है कि उनका निषाद वोट पर प्रभाव है.

2015 के विधान सभा चुनाव में मुकेश सहनी ने भाजपा  को समर्थन दिया था, और भाजपा को उम्मीद थी कि मुकेश सहनी निषाद जाति के वोट को भाजपा के पक्ष में ट्रान्सफर करवाने में सक्षम होंगे, पर चुनाव में भाजपा की जबरदस्त हार हुई और ऐसे में भाजपा की राय बनी कि निषाद वोट पर नीतीश कुमार का ज्यादा प्रभाव है.

उपेन्द्र कुशवाहा को सिद्ध करना है कि वे जमीनी नेता हैं:

भाजपा ने इस बार के सीट शेयरिंग में उपेन्द्र कुशवाहा को बहुत भाव नहीं दिया. और उसे एक सीट पर सीमित करने का फैसला लिया, खासकर जब वे नीतीश कुमार के खिलाफ खड़े दिखने लगे. भाजपा की राय थी कि उपेन्द्र कुशवाहा का कुशवाहा वोट पर प्रभाव का दावा अतिश्योक्ति से भरा है और अभी वे इस मामले में नीतीश कुमार से पीछे हैं.

ऐसे में दोनों ने महागठबंधन का दामन थाम लिया है. जहाँ एक ओर मुकेश सहनी माछ भात का नारा बुलंद कर रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर उपेन्द्र कुशवाहा खीर बनाने की बात कर रहे हैं और नीतीश कुमार पर शिक्षा के फ्रंट पर लगातार हमले कर रहे हैं.

कांग्रेस का हौसला भी तीन विधानसभा चुनाव में जीतने के बाद बढ़ गया है. अब वे महागठबंधन में अधिक सीटों की मांग पर अडेंगे और छोटे दलों के क्लेम पर अंकुश लगाने की कोशिश करेंगे.

जीतन राम मांझी भी अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं: 

महागठबंधन के घटक जीतन राम मांझी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. जीतन राम मांझी को भी सिद्ध करना है कि महादलित वोट पर उनकी पकड़ है और वे राजनीतिक रूप से महागठबंधन के लिए लाभदायक हैं.  कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उनका कद मुख्यमंत्री बनने के बाद बढ़ा है  पर बिहार में उन्हें भी सिद्ध करना है कि महादलित वोट पर उनका अधिकार है और उनका प्रभावक्षेत्र महज गया तक सीमित नहीं है.

जीतन राम मांझी ने सीट के लिए दवाब की राजनीति शुरू कर दी है. हम ने बुधवार को धमकी दी कि यदि उसे पर्याप्त सीटें नहीं मिली, तो वह अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनावों का बहिष्कार करेगी।  जीतन राम मांझी  ने एनडीए और महागठबंधन की तुलना ‘नागराज’ और ‘सांपराज’ से कर दी है.

मांझी ने कुछ महीने पहले यह भी  दावा किया था कि उनकी पार्टी राज्य में 20 लोकसभा सीटों पर बेहतरीन प्रदर्शन करने की स्थिति में है. राज्य में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं. उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि वह इतनी सीटों के लिए जोर नहीं दे रहे हैं और इसके बजाय जिन स्थानों पर पार्टी की अच्छी मौजूदगी है वह गठबंधन सहयोगियों को जीत हासिल करने में मदद करेगी.

ध्यान दिला दें कि मांझी  ने इस साल फरवरी में एनडीए छोड़ दिया और महागठबंधन में शामिल हो गए.  मई 2015 में हम पार्टी की स्थापना करने वाले मांझी ने 2015 में दो जगहों से विधान सभा चुनाव लड़ा था. वे इमामगंज से जीत गए थे, हालाँकि मखदुमपुर सीट से राजद उम्मीदवार से हार गए थे.

नीतीश कुमार का दांव:

नीतीश कुमार फिलहाल इन तीनों नेताओं या पार्टियों के वोट बैंक पर पकड़ रखते हैं. उनकी राजनीति EBC जातियों और महादलित जातियों के एक जुटान से चलती है. इसके अलावा वे भाजपा के फॉरवर्ड वोट पर निर्भर करते  हैं.

इसी रणनीति के तहत, बिहार सरकार ने मल्लाह और नोनिया और निषाद जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए इथेनोग्राफिक अध्ययन रिपोर्ट के साथ केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय को अनुशंसा भेजी है. इसमें निषाद की उपजातियों बिंद, बेलदार, चाई, तीयर, खुलवट, सुरहिया, गोढ़ी, वनपर और केवट को भी शामिल किया गया है। लोकसभा सीटों के लिहाज से ये तीनों जातियां 10 सीटों पर असर डालती हैं.

इससे पहले 2015 में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार ने मल्लाह, निषाद (बिंद, बेलदार, चाई, तीयर, खुलवट, सुरहिया, गोढ़ी, वनपर, केवट) और नोनिया जाति को एससी में शामिल कराने की पहल की थी. तब केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्य सरकार से इन जातियों पर इथेनोग्राफिक अध्य्यन कराकर रिपोर्ट के साथ अनुशंसा भेजने को कहा था.

तीनों जातियों की संख्या करीब 10 फीसदी है. दरभंगा, सुपौल, मधुबनी, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, छपरा, सीवान और गोपालगंज जिले में इनकी संख्या अधिक है। लोकसभा की करीब 10 सीटों पर तीनों का प्रभावी असर है.

2015 के विधान सभा चुनाव के आंकड़े:

इस सिलसिले में हम एक बार 2015 के विधान सभा चुनाव् के नतीजे पर गौर फरमाएं, जो इस बारे में  तस्वीर को स्पष्ट करने में मददगार साबित होंगे.

56.8%  वोटरों ने वोट डाला. राजद 101 सीट में 80 सीट पर जीत हासिल करने में सफल रहा. इसे 69,95,509 वोट मिले, जो कुल वोट का 18.4% था, जदयू 101 सीट में 71 सीट पर जीत हासिल करने में सफल रहा, इसे 64,16,414 वोट मिले, वोट प्रतिशत रहा 16.8%. कांग्रेस को 41 में 27 सीट पर जीत हासिल हुई. कुल वोट 25,39,638 मिले, वोट प्रतिशत रहा 6.7%.

बीजेपी को 159 सीटों में 53 सीट पर जीत हासिल हुई. पर इसे सबसे अधिक 93,08,015 वोट मिले. वोट प्रतिशत सबसे अधिक 24.4% रहा.

अन्य दलों में लोजपा को 40 सीटों में महज 2 सीट पर जीत हासिल हुई. इसे कुल 18,40,834 वोट मिले. रालोसपा को 23 सीट में 2 सीट पर जीत हासिल हुई. इसे कुल 9,76,787 वोट मिले. वहीँ हम को 21 सीट में सिर्फ एक सीट, इमामगंज ( जीतन राम मांझी) पर जीत हासिल हुई और इसे कुल 8,64,856 वोट मिले.

महागठबंधन में किसको कितने सीट मिलेंगे? 

राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि राजद कम से कम 20 सीटों पर चुनाव लडेगा. हालाँकि लालू यादव चाहेंगे कि राजद 25 सीटों पर चुनाव लड़े. इन परिस्थितियों में महागठबंधन के अन्य घटकों के लिए 15 से 20 सीटें रहेंगी. तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि रालोसपा को एक सीट ( कराकाट लोक सभा सीट खुद उपेन्द्र कुशवाहा के लिए), मुकेश सहनी को एक सीट ( खुद के लिए), हम को एक सीट या दो सीट (वृषिण पटेल और जीतन राम मांझी के लिए, हालाँकि वृषिण पटेल को मुंगेर से सीट चाहिए और मुंगेर पहले से ही काफी हॉट सीट बन चुका है; अनंत सिंह वहां से महागठबंधन की ओर से दावा ठोक रहे हैं और उसी सीट पर वृषिण पटेल भी दावा कर रहे हैं), कांग्रेस को बाकी सीटें मिलेंगी.

ऐसे में जहाँ एक ओर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि राजद और कांग्रेस सबसे ज्यादा सीट पर चुनाव लड़ेंगे, वहीँ मुकेश सहनी, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ेंगे.


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