भीम आर्मी: व्हात्सप्प ग्रुप से बढ़ते हुए मायावती की नींद उड़ाने वाला विशाल दलित संगठन कैसे बना?

अपने गठन के बाद से भीम आर्मी देश में सबसे तेजी से बढ़ने वाला संगठन बन गया है. इसके संस्थापक चंद्र्शेखर आज़ाद उर्फ़ रावण का नाम सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वहां से बढ़कर पुरे भारत में फ़ैल गया है.

भीम आर्मी की पहली बैठक 21 जुलाई 2015 को हुई जब वकील चंद्रशेखर आज़ाद और विनय रतन सिंह ने अपने समुदाय के बच्चों के लिए मुफ्त की पाठशाला शुरू करने का फैसला लिया. इसकी शुरुआत पश्चिमी उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले में हुई. सहारनपुर जिले के ही फतेहपुर भादो गाँव में ऐसी पहली पाठशाला की शुरुआत हुई. अभी के समय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मेरठ, शामली और मुज़फ्फर् नगर जिले में करीब 350 स्कूल चल रहे हैं. दलित समुदाय  के लोग छोटी छोटी आर्थिक सहायता से संगठन को स्कूल चलाने में मदद कर रहे हैं.

भीम आर्मी का पूरा नाम भीम आर्मी भारत एकता मिशन है और यह फिलहाल एक unregistered संगठन है, इसके अध्यक्ष विनय रतन सिंह हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की शोषक सामाजिक व्यवस्था की उपज है भीम आर्मी:

दरअसल भीम आर्मी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक व्यवस्था की उपज है. जहाँ दलित उच्च जातियों के लोगों के द्वारा प्रतारित किये जाते हैं. इस क्षेत्र से अक्सर दलित दुल्हों की घोड़ी चढ़ने के चलते पिटाई की ख़बरें आती रहती हैं. इसके अलावा बसपा के चलते, कांशी राम के चलते, इस क्षेत्र में आंबेडकर के विचारों के प्रति दलित चेतना ज्यादा है, और ऐसे में दलितों को अक्सरहां राजपूतों, जाटों  के हाथों हिंसात्मक व्यवहार का शिकार होना पड़ता है.  दलित औरतों के साथ छेड़खानी, बलात्कार की खबरे भी छन छनकर देश के दुसरे हिस्सों में भी पहुँचती रही हैं.

भीम आर्मी की स्थापना के बाद 2015 में चंद्रशेखर ने अपने गाँव में एक बोर्ड लगाया जिस पर बोल्ड अक्षरों में लिखा हुआ था: “The Great chamars of Dhadkauli welcome you” इसके साथ ही विवादों के साथ चंद्रशेखर का नाता शुरू हो चुका था.

सोशल मीडिया का शानदार इस्तेमाल किया है: 

भीम आर्मी के युवाओं ने सोशल मीडिया का शानदार इस्तेमाल किया है. और इस मामले में मायावती के समर्थकों से अलग हैं. हजारों की संख्या में उनके फेसबुक पर सिंगल और ग्रुप के अकाउंट हैं, व्हात्सप्प ग्रुप्स हैं, ट्विटर हैंडल हैं, जिनका इस्तेमाल वे कार्यक्रम, भाषणों को लाइव करने में करते हैं. जंतर मंतर पर भी जब वे विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और मेनस्ट्रीम मीडिया ने उन्हें ख़ास तवज्जो नहीं दिया, उन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके अपने सन्देश को देश के कोने कोने में पहुंचाया. भीम आर्मी के समर्थकों में ये विचार मजबूती से बैठा हुआ है कि मेनस्ट्रीम मीडिया उनके साथ पक्षपात करती है और दलित अधिकारों की बात करने के कारण उन्हें नक्सल करार दिया जाता है, ऐसे में उन्होंने सोशल मीडिया का रास्ता चुना है. स्मार्ट  फोन का गाँव गाँव में  बढता  इस्तेमाल, देश में जियो के माध्यम से इन्टरनेट क्रांति, रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन और शहरी संस्कृति और नए विचारों के संपर्क में आना आदि ऐसे कारण रहे हैं जिसके चलते व्हात्सप्प ग्रुप से शुरू हुआ संगठन आज न केवल देश भर में  तेजी से अपने प्रसार की योजना बना रहा है, बल्कि उत्तर प्रदेश में अब तक दलितों की एकमात्र नेता मायावती की नींद भी हराम कर रहा है.

भीम आर्मी के नेता को काफी प्रतारणा का सामना करना पडा है: 

मई 2017 में सहारनपुर एक बार फिर जातीय तनाव के मुद्दे पर उबल पड़ा था जब महाराणा प्रताप की जयंती के अवसर पर ठाकुर जुलुस निकाल रहे थे और काफी तेज संगीत बजा रहे थे. जब दलितों ने इस पर आपत्ति जताई, तो फिर दंगे भड़क उठे. एक ठाकुर की मौत हो गयी, जबकि 24 दलितों के घर आग के हवाले कर दिए गये.

काफी दलित युवकों के खिलाफ FIR पुलिस ने दर्ज किया. इन्ही 24 FIR में आजाद को भी अभियुक्त बनाया गया. भीम आर्मी ने दिल्ली में प्रदर्शन किया जिसमे आंबेडकर की फोटो के साथ, नीला झंडा, और जय भीम का नारा लागाया गया और प्रदर्शकारियों ने आज़ाद का मुखौटा पहन रखा था.
ऐसा कहा जा रहा था कि हालांकि पुलिस की फाइल में आज़ाद फरार चल  रहे थे, पर वो उस प्रदर्शन में उपस्थित थे. वो मंच पर आये  और उन्होंने  भीड़ को एड्रेस किया. और  आत्म समर्पण करने की घोषणा की. पुलिस के अनुमान के अनुसार, उस दिन जंतर मंतर पर कम से कम 10,000 लोग जमा हुए थे.

जून 2017 में आजाद को यूपी पुलिस ने हिमाचल प्रदेश में डलहौजी में गिरफ्तार कर लिया. उस समय आजाद के  सर पर 12,000 का इनाम चल रहा था.

गिरफ्तारी के बाद दलितों ने इसका भारी विरोध किया था. यहां तक कि दो दिन के लिए सहारनपुर में इंटरनेट बंद करना पड़ा था. इलाहाबाद  हाईकोर्ट ने करीब पांच महीने बाद नवंबर 2017 में उसे सभी मामलों में ये कहते हुए ज़मानत दे दी थी कि रावण पर दर्ज सभी मुकदमे राजनीति से प्रेरित लगते हैं लेकिन उसकी रिहाई से पहले ही पुलिस ने रावण  पर रासुका लगा दिया, जिसके बाद से ही वह सहारनपुर जेल में बंद थे.
14 सितम्बर को चंद्रशेखर आजाद को रात के 2.24 पर जेल से रिहा किया. प्रमुख सचिव गृह का कहना है कि रावण की रिहाई का फैसला उनकी मां के प्रार्थना पत्र पर लिया गया है. चंद्रशेखर मई 2017 से रासुका कानून ( राष्ट्रीय सुरक्षा कानून ) के तहत जेल में बंद थे.रिहा होने के बाद चंद्रशेखर ने कहा कि सरकार डरी हुई थी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट उसे फटकार लगाने वाली थी. खुद को बचाने के लिए सरकार ने जल्दी रिहाई का आदेश दिया है. मुझे पूरी तरह विश्वास है कि वे मेरे खिलाफ दस दिनों के भीतर फिर से कोई आरोप लगाएंगे. मैं अपने लोगों से कहूंगा कि साल 2019 में बीजेपी को उखाड़ फेंकें.

पेशे से वकील हैं चंद्रशेखर: 

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ने अपना उपनाम रावण रखा है. पेशे से वकील चंद्रशेखर के परिवार में दो बहनें हैं. एक की शादी हो चुकी है. वे दो भाई हैं. चन्द्रशेखर खुद अविवाहित हैं. उनका भाई पढ़ाई के साथ साथ मेडिकल स्टोर पर नौकरी करता है. चंद्रशेखर के अनुसार, भीम सेना एक ऐसा मंच है जहाँ हम युवाओं को अपने दलित समाज के हिट में काम करने के लिए जागरूक करते हैं. वह भगवान् बुद्ध की शिक्षाओं के साथ आंबेडकर के बताये मार्ग पर चलना चाहते हैं. उनके सनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बात है कि दमन से लड़ने के लिए दलित शिक्षित हों.

उनके अनुसार उना, रोहित वेमुला जैसे तमाम मामले ये बताते हैं कि दलितों पर हर रोज अत्याचार किये जाते हैं पर वे पुलिस में नहीं जा सकते. उनकी सुनवाई नहीं होती.

मायावती सशंकित हैं:

उत्तर प्रदेश में मायावती ही अनुसूचित जातियों की सबसे बड़ी नेता हैं ,भले ही मायावती को 2014 के लोकसभा में एक भी सीट न मिली हो लेकिन बीजेपी की आंधी के बावजूद उत्तर प्रदेश में उनका वोट प्रतिशत लगभग 20% रहा था लेकिन अब बसपा के बाद भीम आर्मी भी अनुसूचित जातियों की एक बड़ी संगठित इकाई बन चुकी है जहां मायावती सोशल मीडिया से दूर रहती हैं वहीं भीम आर्मी सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय है जो कि आज की पीढ़ी के युवाओं को प्रभावित करने का बड़ा ज़रिया है.

भीम आर्मी का गठन होने के बाद से ही बसपा प्रमुख मायावती उससे खतरा महसूस करती रहीं हैं, मायावती पहले तो भीम आर्मी को आरएसएस की ही चाल बताया था और अपने कार्यकर्ताओं को भीम आर्मी से दूर रहने की सलाह दी.

दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के जरिए कांग्रेस चंद्रशेखर पर लगातार डोरे डालती रही है, दिल्ली हो या बनारस जिग्नेश मेवाणी चंद्रशेखर की रिहाई के लिए आंदोलन कर चुके हैं , सूत्रों की मानें तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव की भी पूरी कोशिश है कि 2019 में किसी भी प्रकार चंद्रशेखर को अपने साथ रखा जाए. फ़िलहाल चंद्रशेखर 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर रहे हैं  हालाँकि वे  चुनाव लड़ें या न लड़ें पर वो चुनाव में एक महत्वपूर्ण फ़ैक्टर ज़रूर रहेंगे.

फिलहाल चंद्रशेखर का ध्यान देश भर में भीम आर्मी की उपस्थिति दर्ज करवाने पर  है और वे देश भर में जहाँ भी दलितों पर अत्याचार के मामले आयेंगे, वहां वे भीम आर्मी के जरिये विरोध दर्ज करना चाहते हैं. ऐसे में  मायावती की नींद उड़ना स्वाभाविक है, अब देखना ये है कि मायावती के कार्यकर्ता कब तक भीम आर्मी के युवाओं के उत्साह से बचकर रह पाते हैं.


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