#2018: Politician of the Year: राजद नेता तेजस्वी यादव

एक अनुमान लगाया जा रहा था कि अनंत सिंह राजद के टिकट पर मुंगेर लोक सभा सीट से चुनाव लड़ेंगे, ऐसे में राजद का वोट बैंक और खुद अनंत सिंह का बाहुबल और समर्थकों की संख्या देखते हुए अनंत सिंह की जीत पक्की मानी जा रही थी ( ध्यान दिला दें कि पिछले दो लोक सभा चुनावों में मुंगेर लोक सभा सीट से भूमिहार उम्मीदवार विजयी रहे हैं). ऐसे में तेजस्वी यादव ने साहस भरा फैसला करते हुए फैसला सुनाया:

 “अनंत सिंह एक बेड एलिमेंट हैं, उनको पार्टी में नहीं आने देंगे; हमारी विचारधारा के विपरीत है उनकी विचारधारा”- तेजस्वी यादव

8 नवम्बर 1989 को जन्मे राजद सुप्रीमो लालू यादव के सुपुत्र तेजस्वी यादव ने अभी राजनीति में ज्यादा समय नहीं बिताया है, कुल मिलाकर चार साल. अभी वे कुल मिलाकर 30 साल के भी नहीं हुए हैं, पर इतने कम समय में उन्होंने प्रशंसनीय राजनीतिक परिपक्वता दिखाई है.

तेजस्वी यादव अपने पिता की तरह अपनी विचारधारा में स्पष्ट हैं. धर्मनिरपेक्ष राजनीति उनकी पहचान है और वे  केंद्र में मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार के खिलाफ महागठबंधन के मुख्य नेता हैं. केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में अघोषित इमरजेंसी जैसा माहौल है. केंद्र सरकार ने जितनी भी योजनाओं की शुरुआत की, चाहे गंगा सफाई अभियान हो, या मेक इंडिया हो एक भी योजना सफल नहीं रही. आज जो सबसे ज्यादा चिंता की बात है वह संविधान बचाने की. हमलोगों का प्रयास है कि देश तभी बचेगा जब हमारा संविधान बचेगा.

तेजस्वी ने कहा कि केंद्र सरकार, मोदी जी और नीतीश जी सब मिलकर नागपुरिया कानून को लागू करना चाहते हैं. ये सभी बाबा साहेब आंबेडकर के संविधान की जगह आरएसएस का एजेंडा लागू करना चाहते हैं.

अपने पिता के विपरीत तेजस्वी यादव नए जमाने के नेता हैं और इन्टरनेट और सोशल मीडिया की दुनिया के टूल्स फेसबुक और व्हात्सप्प का प्रभावशाली इस्तेमाल करते हैं और साथ ही नीतीश सरकार पर ट्वीट के जरिये लगातार तीखे हमले करते रहते हैं. उनके ट्वीट काफी बड़ी संख्या में पढ़े जाते हैं और फिलहाल बिहार में उनके कमेंट्स पर सबसे ज्यादा रूचि बिहार की जनता दिखाती है. उनके फोल्लोवेर्स की संख्या लाखों में है. वे नए जमाने के नेता हैं.


हालाँकि उनकी औपचारिक शिक्षा ज्यादा नहीं हुई है और उन्होंने नौवी तक की ही पढ़ाई की है, और इसके लिए उन्होंने काफी आलोचना भी झेली है, खासकर जदयू के संजय सिंह और नीरज कुमार के ( महागठबंधन के टूट जाने के बाद से) और भाजपा के सुशील मोदी के निशाने पर वे लगातार रहे हैं. पर राजनीति मानों उनके खून में थी. उन्होंने बहुत तेजी से राजनीति का ककहरा सीखा है.

भाषणों से वे आम जनता से कनेक्ट कर रहे हैं. सत्ताधारी दल जदयू के प्रवक्ता उन्हें हर बार अपने पिता के शासन काल के दौरान घटी अपराध की घटनाएँ याद दिलाते हैं, जब जब वे बिहार में अपराध की ओर इशारा करते हैं.


पर अब समय बदल गया है, और लोग जानते हैं कि नेतृत्व बदल चुका है और लालू यादव के समय हुई अपराधिक घटनाओं के लिए तेजस्वी यादव को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता.

वे अपने वाक प्रहारों में व्यंग का जबरदस्त इस्तेमाल करते हैं. एक बानगी देखिये:


2015 में उन्होंने औपचारिक तरीके से राजनीतिक पारी शुरू की, जब वे चुनाव लड़ने के लिए राघोपुर से उतरे, जो उनका पारिवारिक सीट रहा है. राघोपुर सीट से उनके पिता लालू यादव और माँ राबड़ी देवी चुनाव लड़ चुके हैं और जीत हासिल कर चुके हैं. चुनाव लड़ने के दौरान वे राजनीतिक तौर पर greenhorn थे और ये कहा जा रहा था कि वे सतीश कुमार के हाथो हार का सामना कर सकते हैं. पर उन्होंने अनुमानों को झुठलाते हुए सतीश कुमार को मतों के भारी अंतर से हराया.

नीतीश कुमार से प्रशासन की बारीकियां सीखीं:

राजद को 81 सीट मिले और इसका स्ट्राइक रेट जदयू से बेहतर था. राजद के 81 सीटों की तुलना में जदयू को 70 सीट मिले थे, पर उस समय राजद सुप्रीमो लालू यादव चारा घोटाले के चलते राजनीति से बाहर थे. ऐसे में राजद ने नीतीश कुमार का नेतृत्व स्वीकार किया. बदले में तेजस्वी यादव को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया गया और साथ ही इनके जिम्मे परिवहन और भवन निर्माण विभाग आये. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन विभागों में तेजस्वी यादव ने कामकाज में तेजी लाने की कोशिश की. उनकी एक कोशिश लोगों को याद रह गयी है जब बिहार भर में सड़क के गड्ढों को भरने के लिए उन्होंने लोगों से व्हात्सप्प पर गड्ढों के साथ तस्वीर शेयर करने के लिए कहा. इसके साथ ही सरकार में रहने के दौरान तेजस्वी यादव को नीतीश कुमार का सानिध्य मिला और उन्हें प्रशासन की बारीकियों को नजदीक से जानने समझने का मौक़ा मिला. उनके पिता और माँ दोनों मुख्यमंत्री रह चुके थे पर वे लम्बे समय से सत्ता से बाहर रहे थे.

तेजस्वी एक क्रिकेट खिलाड़ी रह चुके थे और वे झारखण्ड राज्य की ओर से क्रिकेट खेल चुके थे और साथ ही आईपीएल में भी Delhi daredevils टीम में थे, हालाँकि वहां उन्होंने एक भी मैच नहीं खेला था. हालाँकि एक क्रिकेटर के तौर पर वे ज्यादा सफल नहीं रहे, पर क्रिकेट ने उनके अन्दर एक sportsman का जज्बा जरुर भर दिया और उन्हें समस्यायों से जूझने में मदद मिली.

घरेलु मोर्चे पर भी चुनौतियों से निपटे: 

2018 में उन्हें कई तरफ से राजनीतिक हमलों का सामना करना पडा. घर में भाई तेज प्रताप यादव और बहन मीसा भारती और जीजा शैलेश कुमार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से वे सुलझे अंदाज़ में निपटे और खुद को राजद का निर्विवाद नेता साबित किया. लालू  के जेल जाने के बाद राजद और खुद परिवार के लिए बुरे दिन आये, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और नीतीश सरकार और साथ ही मोदी सरकार के खिलाफ जनता के बीच गए. बिहार में कई जिलों का दौरा किया.

अररिया लोक सभा, जहानाबाद विधान सभा और इससे पहले जोकीहाट विधान सभा उपचुनाव में जीत हासिल किया और हर बार जदयू को पटखनी दी. ऐसे में उनके नेतृत्व की स्वीकार्यता बढ़ी. लालू का हाथ सर पर था. ऐसे में नेतृत्व के दावेदारों को पीछे हटना पडा.

विधान सभा में वे बतौर नेता प्रतिपक्ष शानदार प्रदर्शन करते नज़र आये. उन पर कई तरह के आरोप भाजपा नेता सुशील मोदी ने लगाए, IRCTC स्कैम में और दानापुर में मॉल के निर्माण, मिटटी घोटाले आदि तमाम मामले में सुशील मोदी ने उन्हें घेरा. उन्हें अदालत के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. उन्होंने भी सृजन घोटाले में सुशील मोदी पर तीखा हमला किया. मुज़फ्फरपुर शेल्टर होम काण्ड में नीतीश कुमार को घेरा.

लोकसभा चुनाव के लिए अच्छा होम वर्क किया है तेजस्वी यादव ने: 

लोक सभा चुनाव के लिए तेजस्वी यादव बेहतरीन होम वर्क कर रहे हैं. वे सन ऑफ़ मल्लाह मुकेश सहनी, महादलित नेता जीतन राम मांझी, रालोसपा नेता उपेन्द्र कुशवाहा को अपनी तरफ मिला चुके हैं. साथ ही कांग्रेस को सन्देश देने में सफल रहे हैं कि भले देश में कांग्रेस बड़ी पार्टी है, पर बिहार में लोकसभा चुनाव राजद के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा. फिलहाल सीटों का बंटवारा नही हुआ है, पर राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि लालू यादव के मार्गदर्शन में सीटों का बंटवारा राजद के पक्ष में जाएगा. हालाँकि ये भी चर्चा है कि अगर लालू यादव जेल से बाहर नहीं आ सके, तो तेजस्वी यादव को राजद का कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाएगा.

2019 में लोक सभा चुनाव एनडीए के लिए cakewalk victory नहीं होने वाला है. incumbency factor भी एक मुद्दा है, महागठबंधन के हौसले बुलंद हैं. ऐसे में तेजस्वी के नेतृत्व क्षमता की अग्नि परीक्षा होनी है, पर अभी तक से उनके परफॉरमेंस से कहा जा सकता है कि बिहार का यह युवा नेता न बेबाकी से अपनी बात रखने में डरता है और न ही चुनौतियों का सामना करने में पीछे है.

2018 में तेजस्वी के परिपक्व राजनेता के रूप में उभार देखते हुए marginalised.in बिहार के युवा नेता तेजस्वी यादव को politician of the year घोषित करता है.


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