#2019Loksabha:राजनीति के साथ साथ एनजीओ भी चलाने वाले चिराग पासवान पर होगी नज़र

फिलहाल, इस सारे राजनीतिक दाँव पेंच में जिस एक राजनेता ने अपनी राजनीतिक चाल से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है, वे हैं लोजपा सुप्रीमों के सुपुत्र चिराग पासवान. चिराग पासवान की फिलहाल राजनीतिक पारी लम्बी नहीं है, पर उन्होंने अपने पिता से प्रेशर पॉलिटिक्स का लेसन लिया है. जब उन्होंने देखा कि भाजपा को तीन राज्यों – छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस से मुंह की खानी पड़ी है, तब उन्होंने समय की चाल को पहचाना. उन्होंने देखा कि कुशवाहा के एनडीए से बाहर जाने के बाद अगर लोजपा भी बाहर निकल गयी तो बिहार में एनडीए को शर्तिया हार का सामना करना पडेगा. ऐसे में उन्होंने 7 सीटों की मांग मनवाने के लिए केंद्र सरकार से सवाल कर दिया: सरकार उन्हें बताये कि नोट्बंदी के क्या फायदे हुए, क्योंकि उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र में जनता को समझाना है. दुसरे उन्होंने पब्लिक फोरम से न केवल राहुल गाँधी की तारीफ की, बल्कि राफेल पर भी सवाल खड़े किये.
स्वाभाविक है कि भाजपा इससे दबाब में आ गयी. फिर रूठने मनाने का खेल शुरू हुआ. इस सारे खेल में राम बिलास पासवान चुप रहे, हालाँकि ये समझा जा सकता था कि चिराग पासवान अपने पिता की लिखी स्क्रिप्ट पर ही अपना रोल प्ले कर रहे हैं. नतीजा ये हुआ कि अंत में एनडीए को लोजपा को 6 लोक सभा सीट और 1 राज्यसभा सीट देना पड़ा.
फिलहाल, एनडीए में लोकसभा चुनाव को लेकर सीट बंटवारे के बाद अब सीटों के चयन को लेकर रस्साकशी जारी है. लोजपा ने अब नयी अपील की है कि  कि किस सीट पर कौन सी पार्टी चुनाव लड़ेगी इसका भी फैसला जल्द से जल्द हो जाना चाहिए.
लोजपा संसदीय बोर्ड के चेयरमैन चिराग पासवान ने कहा कि एनडीए में सीटों का बंटवारा हो गया है और हम चाहते हैं कि जहां से हमारे 6 सीटिंग एमपी हैं वो सीटें बरकरार रहे. उन्होंने कहा कि मुंगेर की एक सीट पर एनडीए की बैठक में चर्चा हो सकती है, लेकिन हम चाहते हैं कि एनडीए में जल्द ही सभी सीटों का चयन भी हो जाए. मुंगेर सीट पर फिलहाल पेंच फंसा हुआ है. मुंगेर सीट से फिलहाल लोजपा नेता वीणा देवी सांसद हैं और वे बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी हैं और इसी सीट से जदयू नेता ललन सिंह भी चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं, पर वीणा देवी सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं.
हाजीपुर की सीट को लेकर चिराग पासवान ने कहा कि अब यह तय हो चुका है कि लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम विलास पासवान राज्यसभा जाएंगे. हाजीपुर हमारा गढ़ रहा है और हमारी परंपरागत सीट रही है. हाजीपुर से कोई परिवार का ही सदस्य होगा या पार्टी का कोई अन्य सदस्य होगा इस बात पर चिराग पासवान ने कुछ भी कहने से इनकार किया. उन्होंने कहा कि लोजपा पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक में ये तय किया जाएगा.
फिल्मों से राजनीति का रुख करने वाले चिराग पासवान: 
31 October 1983 को जन्मे चिराग पासवान रामबिलास पासवान और उनकी दूसरी पत्नी रीना शर्मा उर्फ़ पासवान के बेटे हैं. उनका सपना एक्टर बनना था. 2011 में कंगना रानौत के साथ उनकी फिल्म आई थी: मिले न मिले हम. बताया गया था कि राम बिलास पासवान ने अपने बेटे को लौन्चिंग पैड देने के लिए इस फिल्म में पैसा लगाया था पर फिल्म बुरी तरह पिट गयी थी. और इसके साथ ही चिराग पासवान के फ़िल्मी सपने चकनाचूर हो गये. ऐसी परिस्थितियों में चिराग पासवान ने बॉलीवुड में संघर्ष जारी रखने के बजाय सेफ गेम खेलना बेहतर समझा और 2014 में जमुई लोक सभा सीट से चुनाव लड़े और उन्होंने राजद के सुधांशु शेखर भास्कर को 85,000 से अधिक वोटों से हराया. इस साल मोदी लहर से लोजपा को फायदा हुआ और पार्टी 7 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही.
आगे बढ़ते हुए चिराग पासवान लोजपा के संसदीय बोर्ड के नेता बन चुके हैं. ऐसे में कौन कहाँ से चुनाव लडेगा, इस पर अंतिम निर्णय उनका रहेगा.
चिराग फिलहाल 35 साल के युवा हैं और उनके सामने लंबा राजनीतिक करियर है. उनके पिता ने बिहार की दलित राजनीति में अपना अलग मुकाम बनाया है. वे पिछले तीन दशकों से बिहार में सबसे बड़े दलित नेता रहे हैं. पर नीतीश कुमार ने महादलित कार्ड खेलकर उनके दलित वोट बैंक में सेंध लगा दिया. ऐसे में पासवान का वोट बैंक सिमट कर अपनी जाति दुसाध के बीच सिमट कर रह गया है. फिर भी दुसाधों की बिहार में लगभग 6 प्रतिशत जनसख्या को देखते हुए और साथ ही पासवान की दुसाध वोट बैंक को अपनी इच्छा नुसार ट्रान्सफर कर देने की  क्षमता देखते हुए बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं.
अब सवाल ये है कि क्या चिराग पासवान भी अपने पिता की तरह दुसाध वोट बैंक पर अजगर की तरह पकड़ बना पायेंगे? उन्होंने फिलहाल संघर्ष नहीं किया है, जैसा कि तेजस्वी यादव कर रहे हैं. तेजस्वी यादव संघर्ष करके निखर रहे हैं, वही चिराग पासवान अपने पिता की तरह मौके की राजनीति करते हैं. क्या आने वाले वक्त में चिराग अपने पिता की खूबियों को बटोरते हुए अपने राजनीतिक करियर में नये अध्याय जोड़ेंगे? अगर वे ऐसा कर सके, तो वे पासवानों से बढ़कर अन्य समुदाय में भी स्वीकृत होंगे.
चिराग पासवान एनजीओ चिराग पासवान फाउंडेशन के डायरेक्टर भी हैं: 
चिराग पासवान राजनीति के साथ साथ एनजीओ भी चलाते हैं. उनका चिराग पासवान फाउंडेशन दलितों के मुद्दे पर काम करता है. वे इसके डायरेक्टर हैं. कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसके लिए उनकी आलोचना करते हैं कि पिता मंत्रालय में हैं ऐसे में कंपनी के CSR फंड्स से वे लाभ में रहते हैं. हालाँकि युवा चिराग ऐसी आलोचनाओं को नज़रंदाज़ करते हैं. फिलहाल उनकी पार्टी को उनसे आगमी लोक सभा चुनाव में काफी उम्मीदें हैं. पहला राउंड उन्होंने जीत लिया है, दुसरे राउंड में उन्हें काफी मेहनत करनी होगी. क्योंकि इस बार 2014 की तरह मोदी लहर पर सवार होकर वे अपनी नैय्या पार नहीं लगा सकते. बिहार को भी उनसे काफी उम्मीदें हैं. दलित समुदाय में फिलहाल उन्हें टक्कर देने वाला कोई युवा नेता नहीं है. अगर वे अपनी स्वीकार्यता अन्य समुदायों में बढ़ा सकते हैं, तो वे आने वाले वक़्त में बिहार के उपमुख्यमंत्री हो सकते हैं.

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