आखिर क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 जिसका इतना विरोध हो रहा है …

नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 पर विपक्ष की आपत्तियों पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा कि यह बिल असम विशेष के लिए नहीं है और इससे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बन रहे नैशनल सिटिजन रजिस्टर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. पर जब इसे गहराई से देखा जाता है, तो इस बिल का असर असम के साथ साथ नेशनल सिटीजन रजिस्टर पर भी पडेगा और साथ ही इसके दूरगामी परिणाम देश के संविधान और नीतियों पर भी पड़ेंगे.  कांग्रेस ने बिल के विरोध में वॉकआउट किया.


नागरिकता संशोधन विधेयक-2016  लोकसभा में 15 जुलाई 2016 को पेश किया गया था.  यह विधेयक ‘नागरिकता अधिनियम’ 1955 में बदलाव के लिए लाया गया है. 1955 नागरिकता अधिनियम के अनुसार, बिना किसी प्रमाणित पासपोर्ट, वैध दस्तावेज के बिना या फिर वीजा परमिट से ज्यादा दिन तक भारत में रहने वाले लोगों को अवैध प्रवासी माना जाएगा. पर केंद्र सरकार ने इस विधेयक के जरिए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैन, पारसियों और ईसाइयों को बिना वैध दस्तावेज के भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव रखा है. इसके लिए उनके निवास काल को 11 वर्ष से घटाकर 6 वर्ष कर दिया गया है.  अब ये शरणार्थी 6 साल बाद ही भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं.  अवैध प्रवासी कौन हैं, इस बात पर इस बिल से जबरदस्त असर पड़ेगा.

 

असम में बीजेपी की गठबंधन पार्टी असम गण परिषद ने बिल को स्वदेशी समुदाय के लोगों के सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के खिलाफ बताया है.  ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) भी इस बिल के विरोध में अपना स्वर बुलंद किया है. इसके अलावा विपक्षी दल कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट ने भी किसी शख्स को धर्म के आधार पर नागरिकता देने का विरोध किया है.


विरोध इस बात पर भी किया जा रहा है बिल अपने मौजूदा स्वरुप में नेशनल सिटीजन रजिस्टर को अप्रभावी कर देगा. कांग्रेस ने भी बिल को 1985 के असम समझौते की भावना के खिलाफ बताकर इसका विरोध किया है. विरोधियों का कहना है कि मौजूदा बिल 1985 के ‘ऐतिहासिक असम करार’ के प्रावधानों का उल्लंघन है जिसके मुताबिक 24 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से आए सभी अवैध विदेशी नागरिकों को वहां से निर्वासित किया जाएगा भले ही उनका धर्म कुछ भी हो.

यह पहली बार है जब देश में स्पष्ट तौर से धार्मिक आधार पर नागरिकता दिए जाने की बात कही जा रही है.  ऐसे संशोधन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ हैं जो कि समानता के अधिकार की बात करता है. साथ ही इन संशोधनों को अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी नियमों के भी विरुद्ध माना जा रहा है.

ज्ञात हो कि 7 मई को बिल को लेकर विभिन्न संगठन और व्यक्तियों की राय जानने के लिए जेपीसी की एक टीम बीजेपी सांसद राजेंद्र अग्रवाल की  अध्यक्षता में असम  के दौरे पर गयी थी, उस समय भी जेपीसी का जमकर विरोध हुआ था.

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, असम में वर्तमान में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) को अपडेट किया जा रहा है. इसे उन बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान करने के लिए अपडेट किया जा रहा है जो 24 मार्च 1971 के बाद भारत-बांग्लादेश बंटवारे के समय अवैध रूप से असम में घुस आए थे. 1985 असम समझौते में तारीख तय की गई थी जो प्रधानमंत्री राजीव गांधी और ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के बीच समझौता हुआ था.

दरअसल, एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल एक-दूसरे के विरोधाभासी है. जहां एक ओर बिल में बीजेपी धर्म के आधार पर शरणार्थियों को नागरिकता देने पर विचार कर रही हैं वहीं एनआरसी में धर्म के आधार पर शरणार्थियों को लेकर भेदभाव नहीं है. इसके अनुसार, 24 मार्च 1971 के बाद अवैध रूप में देश में घुसे प्रवासियों को निर्वासित किया जाएगा. इस वजह से असम में नागरिकता और अवैध प्रवासियों का मुद्दा राजनीतिक रूप ले चुका है.

भारत में विदेशी नागरिकों के पंजीकरण

‘भारत के विदेशी नागरिकों’ (ओसीआई) के पंजीकरण को रद्द करने संबंधी जो बदलाव इस विधेयक में किये गए हैं, वे भी विवादों से परे नहीं हैं. 1955 के नागरिकता अधिनियम के अनुसार किसी भी ओसीआई का पंजीकरण तीन आधारों पर रद्द किया जा सकता था. पहला, अगर ओसीआई ने धोखाधड़ी से पंजीकरण कराया हो. दूसरा, अगर पंजीकरण के पांच साल के भीतर ही उसे किसी मामले में दो साल या उससे ज्यादा के कारावास की सजा हुई हो. और तीसरा, अगर देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए ऐसा किया जाना जरूरी हो. हालिया संशोधन विधेयक इनमें एक और आधार जोड़ने की बात करता है – अगर ओसीआई ने देश में लागू किसी कानून का उल्लंघन किया हो. माना जा रहा है कि यह नया प्रावधान इतना अस्पष्ट और विस्तृत है कि इसके दुरूपयोग की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं.

असम में भले ही इस विधेयक के खिलाफ सबसे ज्यादा आक्रोश दिख रहा हो, लेकिन इस बदलाव के नतीजे सिर्फ इस राज्य तक ही सीमित नहीं रहने वाले. इसका असर अन्य राज्यों में भी होगा.

इस विधेयक से असम की आबादी में विभाजनकारी पुराने मतभेद भी दोबारा उभरने की आशंका पैदा हो गई है. असम से बाहरी लोगों को निकालने के लिए 1970 के दशक से असम आंदोलन शुरू हुआ था. ये आन्दोलन धर्म के आधार पर अवैध प्रवासियों के बीच भेदभाव नहीं कर रहा था. पर  हाल के सालों में हिंदूवादी संगठनों के उभार के बाद इस बहस पर एक धार्मिक रंग चढ़ गया, जिसमें बाहरी की पहचान बांग्लादेश मूल के मुसलमानों तक सीमित हो गई.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 से जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि इसकी वजह से राज्य में ब्रह्मपुत्र और बराक घाटी के बीच रही पुरानी खाई फिर गहराती दिख रही है. और अब यह विभाजन क्षेत्रीय ही नहीं, भाषाई भी हो चला है. बराक घाटी के हिंदुओं में एक बड़ी आबादी बांग्लादेश से आए विस्थापितों की है और इन बांग्लाभाषियों ने इस विधेयक का समर्थन किया है. जबकि ब्रह्मपुत्र घाटी के लोगों (मूल असमिया) को लगता है कि यह विधेयक क्षेत्र के जातीय अनुपात को बदलने का जरिया है और इस आधार पर ये इसके विरोध में हैं.

ये हालात 1980 के दशक की याद दिला रहे हैं जब राज्य की राजनीति में नागरिकता के मुद्दे पर भारी ध्रुवीकरण देखा गया था और इसके चलते सिर्फ ‘बाहरियों’ के ही नहीं असम के लोग एक दूसरे के खिलाफ भी हो गए थे. फिर यहां हिंसा का जो दौर शुरू हुआ उसका नतीजा राज्य के विकास पर भी पड़ा और सालों तक असम सामाजिक-आर्थिक पैमानों पर पिछड़ा ही बना रहा. उत्तर-पूर्व का यह राज्य अब दोबारा उस हिंसक चक्र में फंसने का जोखिम नहीं उठा सकता.

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि गृह  मंत्री का आश्वासन बिलकुल असत्य पर आधारित है.


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