नवदम्पतियों के प्रयास से प्रजनन स्वास्थ्य होगा बेहतर

 

 

 

 

 

 

*रणविजय कुमार एक सोशल एक्टिविस्ट हैं. पटना में रहते हैं. 

प्रजनन दर में कमी से मातृ मृत्यु दर में आएगी कमी

केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा कुल प्रजनन दर (प्रति महिला बच्चों की कुल संख्या) में कमी लाने के लिए बिहार में “मिशन परिवार विकास” की शुरुआत की गयी है. इसमें आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों के उपयोग को बढ़ाने, गर्भनिरोधक साधनों की सामुदायिक स्तर पर पहुँच सुनिश्चित करने एवं परिवार नियोजन के प्रति जन-जागरुकता को बढ़ाकर उच्च प्रजनन दर की सूची में शामिल बिहार में निम्न प्रजनन दर की सूची वाले राज्यों में लाने का लक्ष्य रखा गया है.

कुल प्रजनन दर (Gross Fertility Rate) में कमी  जनसंख्या स्थिरीकरण (Population Stabilization) के साथ प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर करने एवं मातृ मृत्यु दर (MMR) में कमी लाने में अहम् भूमिका अदा करती है. परिवार नियोजन कार्यक्रमों को सफ़ल बनाने  में  सरकारी प्रयासों से इतर आम लोगों की सामाजिक एवं नैतिक ज़िम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है .इसके लिए नव दम्पन्तियों द्वारा माता एवं शिशु के बेहतर स्वास्थ्य के लिए बच्चों में सही अंतराल के लिए गर्भनिरोधक  साधनों का चयन एक प्रभावी एवं सकारात्मक कदम साबित हो सकता है.

दो नए गर्भ निरोधक साधनों ‘अंतरा’ एवं ‘छाया’ की शुरुआत प्रदेश के हर जिले में कर दी गयी है : 

मिशन  परिवार विकास के तहत बच्चों में अंतराल एवं अनचाहे गर्भ से बचाव के लिए दो नवीन गर्भ निरोधक साधनों  ‘अंतरा’ एवं ‘छाया’ की शुरुआत प्रदेश के सभी जिलों में की गयी है. ‘अंतरा’ एक गर्भनिरोधक  इंजेक्शन है जिसे एक या दो बच्चों के बाद गर्भ में अंतर रखने के लिए दिया जाता है. इस तरह साल में चार इंजेक्शन दिया जाता है. ‘छाया’ गर्भनिरोधक टेबलेट है जिसका सेवन हर चार दिन में करना होता है. साथ ही एक महीने तक यह टेबलेट खानी होती है. इसकी निःशुल्क उपलब्धता पीएचसी, सीएचसी एवं सदर अस्पतालों में सुनश्चित कराया गया है. साथ ही सरकार द्वारा “अंतरा” इंजेक्शन लगवाने पर लाभार्थी को 100 रूपये एवं प्रेरक को भी 100 रूपये दिए जाने का प्रावधान है.

जन जागरूकता और जन सहभागिता बेहद जरुरी है: 

दानापुर अनुमंडल चिकित्सालय के शल्य चिकित्सक डा.अविनाश कुमार सिंह के अनुसार जागरूकता एवं जनसहभागिता से ही परिवार नियोजन अभियान को सफल  बनाया जा सकता है. इसके लिए नवदम्पतियों द्वारा गर्भनिरोधक के साधनों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी से पारिवारिक एवं सामाजिक परिदृश्य पर परिवार नियोजन की आवश्कयता के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनेगा. इसके साथ ही परिवार नियोजन कार्यक्रमों के वास्तविक उद्देश्य  की प्राप्ति में न  सिर्फ़ मदद मिलेगी अपितु आने वाली पीढ़ी के लिए स्वस्थ समाज के निर्माण का रास्ता भी प्रशस्त होगा. 

कुल प्रजनन दर में कमी है जरूरी :

सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे-2016 के आंकड़ो के अनुसार बिहार की कुल प्रजनन दर 3.3 है जिसका अर्थ है कि  प्रति महिला बच्चों की संख्या 3.3 है. वहीं देश में प्रति महिला बच्चों की संख्या 2.3 है. जहाँ एक तरफ़ प्रजनन दर में वांछित कमी आने से दो बच्चों के मध्य अंतराल बढ़ेगा तो दूसरी तरफ़ इससे प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं में भी कमी आयेगी. बच्चों के जन्म में अन्तराल होने से एक तरफ  एनीमिया, प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्त स्त्राव एवं अन्य प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से बचाव होता है, वहीँ दूसरी ओर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में भी कमी आती है.

नव दम्पति के कन्धों पर है अधिक ज़िम्मेदारी :

परिवार नियोजन की नींव को मजबूती प्रदान करने में  नव दम्पतियों की भूमिका प्रमुख हो जाती है. नसबंदी की तुलना में गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग आसान एवं एक हद तक कुल प्रजनन दर को नियंत्रित करने वाला भी होता है. इसे नवदम्पतियों की जागरुकता एवं सही जानकारी के सहारे आसानी से सुनिश्चित किया जा सकता है. पहले बच्चे के जन्म  के बाद दूसरे बच्चे में  लगभग दो सालों का अंतराल माता के बेहतर स्वास्थ्य के साथ शिशु के उत्तम स्वास्थ्य के लिए भी  जरुरी माना जाता है. इस अंतराल में माता का शरीर पुनः माँ बनने के लिए तैयार होता है. बच्चों में अंतराल कायम करने के लिए अस्थायी गर्भनिरोधकों के चयन में नव दंपति का निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 4 (2015-2016) के आंकड़ों के अनुसार बिहार में कुल एक प्रतिशत पुरुष ही कंडोम का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें 2.3 प्रतिशत शहरी पुरुषों  एवं 0.8 प्रतिशत ग्रामीण पुरुषों का योगदान है.  बिहार में 15 से 49 वर्ष तक के  2.3 प्रतिशत महिलाओं  के द्वारा गर्भनिरोधक दवाईओं का इस्तेमाल किया जा रहा है . प्रदेश में कुल 24.1 प्रतिशत योग्य युगलों के द्वारा परिवार नियोजन के किसी भी साधनों का  उपयोग किया जा रहा है जिसमें 34.6 प्रतिशत शहरी एवं 22.6 प्रतिशत ग्रामीण आबादी का योगदान है. निःसंदेह    ये आंकड़े कम हैं, जरुरत है गर्भनिरोध का इस्तेमाल करने वाले युवा दम्पत्तियों का   प्रतिशत बढाने की. इस  दिशा में प्रदेश में पहल शुरू हो गयी है, अब हमारी जिम्मेवारी बनती है कि जनसहभागिता से इस  कार्यक्रम को सफल बनाया जाए.


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