नीतीश के लिए नालंदा लोक सभा है प्रतिष्ठा का प्रश्न; कौशलेन्द्र या फिर कोई और उम्मीदवार होंगे?

1990 का दशक मंडल आन्दोलन और इसकी लहर में OBC नेताओं के उभार का दौर था. हालाँकि इस दौर में कमंडल की राजनीति मजबूत हो रही थी. पर बिहार में मंडल के एक तबके ने कमंडल से हाथ मिला लिया था. ऐसे में नालंदा लोक सभा सीट पर नीतीश और लालू का संघर्ष शुरू हुआ. नीतीश ने लालू से अलग होकर समता पार्टी का गठन कर लिया था. 1996 में पहली बार समता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जॉर्ज फ़र्नान्डिस की जीत हुई. हालाँकि फ़र्नान्डिस बाहरी उम्मीदवार थे, पर नीतीश के सपोर्ट का असर था कि उन्हें लगातार तीन लोक सभा चुनावों में जीत हासिल हुई-1996, 1998 और फिर 1999 में. 1996 और 1998 में वे समता पार्टी के टिकट पर जीते थे, जबकि 1999 में जदयू के टिकट पर. 2004 में नीतीश खुद नालंदा लोक सभा सीट से लड़े और जीते. उस समय वे बाढ़ लोक सभा सीट से राजद उम्मीदवार विजय कृष्ण से हार गये थे. उसके बाद 2009 और 2014 में उन्होंने कौशलेन्द्र कुमार पर अपना वरदहस्त रखा और इन्हें जीत मिली.
पर 2014 के चुनाव में कौशलेन्द्र कुमार को बेहद कम वोटों से जीत हासिल हुआ. जहाँ कौशलेन्द्र कुमार को 3,21,982 वोट मिले, वहीँ लोजपा के उम्मीदवार सत्यानन्द शर्मा को 3,12,355 वोट मिले. इस तरह कौशलेन्द्र कुमार को महज 9627 वोटों से जीत हासिल हो सकी. अभी तक भाजपा इस लोक सभा सीट पर जदयू के समर्थन में रही थी और उसने हमेशा जदयू के उम्मीदवार को समर्थन दिया था, पर 2014 में जदयू अकेले चुनाव लड़ा था और लोजपा और भाजपा साथ में थे. इसका असर वोट के अंतर पर भी देखने को मिला. इधर भाजपा ने पहले जदयू और फिर बाद में लोजपा को समर्थन दिया, वही कांग्रेस ने राजद से हाथ मिला लिया. इस बार 2019 के लोक सभा चुनाव में नालंदा राजनीतिक दलों के इसी समीकरण के साथ मुकाबले का गवाह होगा.
अब सवाल है कि क्या नीतीश फिर से कौशलेन्द्र कुमार पर दांव लगायेंगे, जबकि जदयू को भाजपा के साथ साथ लोजपा का भी साथ मिल गया है. या फिर वे नए आप्शन तलाश रहे हैं. सूत्रों की मानें तो 

बिहार सरकार में फिलहाल मंत्री श्रवण कुमार ने कहा है कि मेरी इच्छा लोकसभा चुनाव लड़ने की नहीं है, लेकिन अगर पार्टी की ओर से फैसला लिया जाता है और नेता का आदेश होगा तो मैं उसे स्वीकार कर लूंगा. बता दें कि श्रवण कुमार न केवल नालंदा क्षेत्र में एक कद्दावर नेता की हैसियत रखते हैं, बल्कि नीतीश कुमार के कोर ग्रुप के नेता हैं और उनके बेहद करीबी भी. श्रवण कुमार नालंदा विधानसभा से छह बार चुनाव जीत चुके हैं.

जदयू  से मुकाबले के लिए महागठबंधन की ओर से भी फिलहाल  प्रत्याशी तो तय नहीं है, और उम्मीद की जा रही है कि खरमास के बाद नाम फायनल कर दिए जायेंगे. लेकिन फिलहाल  मिल रही जानकारी के मुताबिक  कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह या फिर वृषण पटेल को महागठबंधन की ओर से उतारा जा सकता है.

दूसरे विकल्प के रूप में महागठबंधन सत्यानंद शर्मा पर दांव अजमा सकती है. सत्यानंद शर्मा पिछले चुनाव में एलजेपी के प्रत्याशी थे और दूसरे स्थान पर रहे थे. जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि सत्यानंद शर्मा काफी कम मतों के अंतर से चुनाव हारे थे.

नालंदा लोक सभा में कुल सात विधान सभा क्षेत्र आते हैं: अस्थ्वान, बिहारशरीफ, राजगीर, इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा, हरनौत. अपने गृह राज्य में नीतीश  ने बतौर मुख्यमंत्री और उससे पहले केन्द्रीय मंत्री के तौर पर विकास के काफी काम किये हैं. ऐसे में इस क्षेत्र के वोटर सीधे नीतीश कुमार को देखते हैं, न कि उनके खड़े किये गये उम्मीदवार को. इस बार देखना रोचक होगा कि नीतीश किस पर अपना भरोसा जताते हैं: कौशलेन्द्र कुमार पर फिर से एक बार या श्रवण कुमार पर?


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