पोंगल के अवसर पर तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में खेला जाने वाला खेल जल्लीकट्टू…

जल्‍लीकट्टू (Jallikattu) तमिल नाडु के ग्रामीण इलाक़ों का एक परंपरागत खेल है जो पोंगल त्यौहार पर आयोजित कराया जाता है और जिसमे बैलों से इंसानों की लड़ाई कराई जाती है. जल्लीकट्टू को तमिलनाडु का गौरव तथा संस्कृति का प्रतीक कहा जाता है. इसका इतिहास प्राचीन है. कुछ इसे हज़ार सालों से अधिक प्राचीन मानते हैं.

पर जल्लीकट्टू के साथ विवादों का भी नाता रहा है. जानवरों की सुरक्षा करने वाली संस्था पेटा ( PETA) इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गयी. अदालत ने 2014 में इस खेल पर पाबंदी लगाने का फैसला सुनाया. आंकड़ों के अनुसार, 2010 से 2014 के बीच जल्लीकट्टू खेलते हुए 17 लोगों की जान गयी थी और 1100 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे. वहीँ पिछले 20 सालों में जल्लीकट्टू की वजह से मरने वालों की संख्या 200 से भी ज्यादा थी. इस वजह से 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने “Prevention of Cruelty to Animal Act”   के तहत इस खेल को बैन कर दिया था. 

पशुओं के अधिकारों की रक्षा करने के काम करने वाली संस्थाओं ने जहाँ इस खेल को जानवरों के लिए हानिकारक बताया, वहीं तमिलनाडु की जनता इसे अपने संस्कृति का एक अहम हिस्सा बताती आई है. अभिनेता कमल हासन और रजनीकांत ने इस खेल का समर्थन करते हुए कहा था कि सांड़ों की लड़ाई का यह खेल तमिल संस्कृति का हिस्सा है. रजनीकांत ने कहा था कि ‘चोट से बचने के लिए खेल के नियमन को लेकर नियम बनाए जा सकते हैं लेकिन क्या किसी संस्कृति को अस्वीकार करना सही है?’

2011 में केंद्र सरकार ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध लगा दिया था लेकिन सत्ता में आने पर एनडीए सरकार ने 8 जनवरी 2016 में इसे हरी झंडी दिखा दी. सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ तमिलनाडु विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित हो चुका है. जिसके तहत जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबन्ध को हटाने की मांग की गयी है.


जल्लीकट्टू तमिलनाडु का एक पारंपरिक खेल है, जो फसलों की कटाई के अवसर पर पोंगल के समय आयोजित किया जाता है. इसमें 300-400 किलो के सांडों की सींगों में सिक्के या नोट फंसा कर रखे जाते हैं और उन्हें भड़काकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है, ताकि लोग सांड को सींग से पकड़ कर काबू में कर सकें.
जल्ली/सल्ली  का अर्थ होता है सिक्का और कट्टु का मतलब बंधा हुआ. सांडों के सींग में कपड़ा बंधा होता है, जिसे खिलाड़ी को पुरस्कार राशि पाने के लिए निकालना होता है. सांडों को भड़काने के लिए उन्हें शराब पिलाने से लेकर उनकी आँखों में मिर्च तक डाला जाता है. और उनकी पूंछ को मरोड़ा जाता है, ताकि वे बधाबास होकर इधार उधर दौड़ें.
खेल के शुरू होते ही पहले एक एक करके तीन सांडों को छोड़ा जाता है. ये गाँव के सबसे बूढ़े सांड होते हैं.इन सांडों  को कोई नहीं पकड़ता, ये सांड गाँव की शान होते हैं और उसके बाद शुरू होता है जल्लीकट्टू का असली खेल. मदुरै में चलने वाला ये खेल तीन दिनों तक चलता है.

जल्लीकट्टू तमिलनाडु का परम्परागत खेल है, जो योद्धाओं के बीच लोकप्रिय था. प्राचीन काल में महिलाएं अपने वर को चुनने के लिए जल्लीकट्टू खेल का सहारा लेती थीं. जल्लीकट्टू खेल का आयोजन स्वयंवर की तरह होता था. जो कोई भी योद्धा बैल पर काबू पाने में कामयाब हो जाता था, महिअल्यें उसे अपने वर के रूप में वरन करती थीं.

जल्लीकट्टू की तुलना स्पेन में होने वाले बैल फाइट से भी की जाती है. हालाँकि जल्लीकट्टू के समर्थक इसे सही नहीं मानते. क्योंकि उनके अनुसार जल्लीकट्टू में बुल् फाइटिंग  की तरह हथियारों का इस्तेमाल नहीं होता और न ही खेल का मतलब है अंत में जानवर का खात्मा.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.