क्या “पूरब के लेनिनग्राद” में मुकाबला कन्हैया बनाम गिरिराज होगा या राजद अपना उम्मीदवार उतारेगा?

2019 के लोक सभा चुनाव में कन्हैया कुमार  सीपीआई की टिकट पर बेगूसराय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं. ऐसी चर्चा जोरों पर है. कन्हैया के समर्थकों में एक उत्साह की लहर है और सोशल मीडिया में उनके समर्थकों ने एक मुहीम सी चला रखी है. कन्हैया जवाहरलाल विश्विद्यालय पर मोदी सरकार के वक्र दृष्टि की उपज हैं. कन्हैया और इनके साथियों पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने कैंपस में “भारत तेरे टुकड़े होंगे” और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में नारे लगाए थे. दिल्ली पुलिस ने इन पर और इनके साथियों पर क़ानूनी कार्यवाही की. पर अदालत में ये आरोप टिक नहीं सके. साथ ही ये सनसनीखेज बात भी सामने आई कि भीड़ में घुस कर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के छात्रों ने ही ये नारे लगाए थे. मोदी सरकार के दमनकारी रवैये ने JNU के इस युवा छात्र नेता को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित कर दिया. उन्होंने देश भर में घूम घूम कर भाषण दिए और मोदी सरकार की नीतियों पर हमला बोला.  इस दौरान उनकी जीवनी ” बिहार से तिहार” प्रकाशित हुई.

वाम दल अब कन्हैया की लोकप्रियता को भुनाने के लिए बेगुसराई लोक सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ाना चाहते हैं.  कन्हैया कुमार ने भी कहा है कि अगर पार्टी चाहती है और साथ ही गठबंधन के अन्य साथी राजी हैं, तो वे चुनाव लड़ सकते हैं.

बेगुसराय “पूरब का लेनिनग्राद”

बेगुसराय कभी पूरब का लेनिनग्राद कहलाता था. आज भी कई इलाकों में वामपंथ के  समर्थक उस दौर को याद करते हैं जब बिहार में ऊंची जाति में गिने जाने वाले भूमिहारों ने वामपंथ का झंडा थामकर यहां के ‘जमींदारों’ के खिलाफ पहली बार मोर्चा खोल दिया था. खास बात यह थी कि जिनके खिलाफ यह मोर्चा खोला गया था वह भी भूमिहार ही  थे, जिनका लाल मिर्च की खेती में एकाधिकार था. इस लड़ाई में जो नेता उभरे चंद्रशेखर सिंह, सीताराम मिश्रा, राजेंद्र प्रसाद सिंह ये सभी भूमिहार समुदाय से आते थे. धीरे-धीरे तेघड़ा और बछवारा विधानसभा सीटें वामपंथ का गढ़ बन गईं और कोई भी लहर इसको भेदने में नाकाम रही. ये एक अजीब स्थिति थी, जब शोषक वर्ग भी भूमिहार और इसके खिलाफ लड़ने वाले भी भूमिहार ही थे. दलित और पिछड़े नेतृत्व की स्थिति में नहीं थे.

तेघड़ा विधानसभा सीट जिसे कभी ‘छोटा मॉस्को’ के नाम से भी जाना जाता था यहां पर 1962 से लेकर 2010 का वामपंथी पार्टियों का कब्जा रहा है. 2010 में बीजेपी ने यहां जीत दर्ज की थी. वहीं बछवारा सीट भी साल 2015 में आरजेडी के पास चली गई. वामपंथ के सबसे मजबूत गढ़ में सेंध 90 के दशक में लगनी शुरू हो गई थी.  जब मंडल आन्दोलन ने पिछड़ी जातियों में राजनीतिक अलख जगानी शुरू कर दी. अब वे उच्च जातियों का पारंपरिक नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं थे.  लालू यादव के चमत्कारिक उदय ने पुरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया. इसी दौरान बिहार में जातिगत हिंसा का खुनी खेल शुरू हुआ. वोटो का ध्रुवीकरण शुरू हुआ. बची खुची कसर आडवाणी की रथ यात्रा ने पूरी कर दी. अडवानी के नेतृत्व में हिंदुत्व की भगवा राजनीति ने समूचे उत्तर भारत में पाँव फैलाना शुरू कर दिया. ऐसे में जहाँ दलित और पिछडी जातियां लालू के नेतृत्व में जनता दल और आगे चल कर नीतीश कुमार के समता दल के बैनर तले एकजुट होने लगे, वहीँ उच्च जातियों के लोग कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा के झंडे तले एकजुट होने लगे. पूरा सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा था. पूरब का लेनिनग्राद ध्वस्त हो रहा था और अपने सुनहरे अतीत को याद कर रहा था. 1995 तक यहां की 7 में से 5 सीटें सीपीआई या सीपीएम के पास थीं. पर फिर तेजी से ये घटने लगा. रोचक बात ये भी रही कि जिस समय मध्य बिहार जमीन, उचित मजदूरी और दलित औरतों की आबरू के लिए खुनी संघर्ष में भिड़ा हुआ था, पूरब के लेनिनग्राद कहे जाने वाले बेगुसराय में इसका असर नहीं था. हिंसक लड़ाई से दूर था लेनिनग्राद !!

पर लग रहा है कि परिस्थितियों ने एक बार फिर से करवट लिया है.  हवा के रुख में बदलाव आया है. अब वामपंथी राजनीति के लिये दौर बदल गया है. कन्हैया कुमार जो कि खुद भूमिहार हैं और टेघड़ा (मिनी मॉस्को) से आते हैं, उनको अपनी ही जाति से वोट मिलेगा यह कुछ भी अब पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता है. पर ये भी बात है कि अगर राजद का समर्थन कन्हैया कुमार को मिल गया, तो NDA उम्मीदवार की राह कठिन हो सकती है. पिछले चुनाव में राजद दुसरे स्थान पर आया था. ऐसे में उम्मीद की किरण बनी है, कन्हैया कुमार और वामपंथी दलों के लिए भी.  रोचक बात ये है कि  ‘पूरब का लेनिनग्राद’ होते हुए भी सीपीआई एक ही बार लोकसभा चुनाव (1967) जीत पाई है. साल 2004 से यहां से एनडीए का प्रत्याशी ही लगातार जीत रहा है.

भाजपा का दांव क्या गिरिराज सिंह पर लगेगा? 

भाजपा के दिवंगत सांसद भोला सिंह की मृत्यु के बाद से उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर दावेदारियां शुरू हो गई हैं. बेगूसराय संसदीय क्षेत्र भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित सीट समझा जाता है और जिले में भाजपा कार्यकर्ताओं की टीम और समर्थकों का हुजूम अन्य पार्टियों से काफी ज्यादा है. जिस वजह से इस सीट पर बीते लोकसभा चुनाव में दावेदारी को लेकर वर्तमान केन्द्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह और दिवंगत भोला सिंह के बीच जमकर खींचतान हुई थी. हालांकि अंत में गिरिराज सिंह को नवादा से टिकट मिला और भोला सिंह स्थानीय होने के नाते टिकट हासिल करने में सफल रहे और जीत भी हासिल की.

स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण भोला सिंह का कुछ महीने पहले असामयिक निधन हो गया. उनकी मृत्यु के बाद से स्थानीय नेता खुद को उनके राजनीतिक विरासत के रूप में पेश कर रहे हैं. एक तरफ जहां दिवंगत सांसद भोला सिंह की पुत्र वधू ने चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की और खुद को उनका मूल पारिवारिक और राजनीतिक वारिश बताया. तो वहीं, भाजपा के जिलाध्यक्ष संजय सिंह, स्थानीय नेता अमर सिंह, कुंदन सिंह समेत कई नाम हैं जो अपना दावा ठोक रहे हैं.

भाजपा के विधान पार्षद रजनीश कुमार भी भोला सिंह के बाद खुद को उनका दायित्व संभालने के योग्य मानते हैं. एमएलसी रजनीश कुमार का कहना है कि भोला सिंह ने ही उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाया. हालांकि उन्होंने कहा कि पार्टी अपने हिसाब से सारी चीजें तय करती है और पार्टी जिसको प्रत्याशी बनाएगी, सबको उसका समर्थन करना चाहिए.

वैसे भोला सिंह के बाद केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह के भी बेगूसराय से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है. और फिलहाल ऐसा लग रहा है कि भाजपा गिरिराज सिंह पर दाँव लगाने का मन बना चुकी है. सीट शेयरिंग के बाद ये अनुमान लगाया जा रहा है कि मुंगेर लोक सभा सीट से जदयू के उम्मीद्वार ललन सिंह लड़ेंगे और वहां से सांसद लोजपा की वीणा देवी को नवादा भेजा जा सकता है. ऐसे में गिरिराज सिंह को बेगुसराय से खड़ा किया जा सकता है.

राजद क्या सोच रहा है? 

अब सवाल ये है कि राजद इस सीट के लिए क्या सोच रहा है? अभी तक महागठबंधन को लेकर जो बैठक हुई, उसमे वाम दल गायब रहे. फिलहाल बिहार में वामदल के पास कन्हैया कुमार सबसे जाना माना चेहरा हैं. वे लगातार नरेन्द्र मोदी पर हमला करते रहे हैं. ऐसे में वाम दल चाहते हैं कि बेगुसराय की सीट उनके खाते में जाए. पर राजद समर्थक इस बार कन्हैया कुमार को लेकर उतने उत्साह में नहीं हैं. उनकी राय ये है कि 2014 में राजद इस सीट पर दुसरे स्थान पर रही थी.

2014 लोक सभा इलेक्शन में भाजपा के भोला सिंह को 4,28,227 वोट मिले थे, वहीँ राजद उम्मीदवार तनवीर हसन 3,69,892 वोट के साथ दुसरे स्थान पर रहे थे. जबकि सीपीआई के राजेंद्र प्रसाद सिंह 1,92,639 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे. राजद समर्थकों के मन
में पिछले चुनाव के ये आंकड़ें घूम रहे हैं. और उन्हें इस बार चुनाव में जीत की उम्मीद है.
अभी रांची में वामपंथियों और लालू यादव के बीच बात हुई थी. सीट शेयरिंग ही एकमात्र मुद्दा था. राजनीतिक सूत्र कह रहे हैं कि अगर राजद बेगुसराय सीट को वामपंथियों को देता है, तो उसे इसका फायदा पुरे बिहार में मिल सकता है. ऐसे में देखना ये है कि क्या राजद नेतृत्व
अपने समर्थकों के आगे झुककर बेगुसराय सीट से अपना उम्मीदवार खड़ा करेगा, या पुरे बिहार में राजनीतिक फायदे को ध्यान में रखते हुए इसे वामपंथियों के खाते में डालेगा?


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.