प्रियंका गांधी की ताजपोशी, लेकिन आसान नहीं है डगर, जानें क्यों अपनाया बौद्ध धर्म

पटनाः कांग्रेस ने भी लोकसभा चुनाव 2019 के लिए अपने तुरुप के पत्ते का इस्तेमाल कर दिया है, वह कितना कारगर होगा यह बहस का मुद्दा है, लेकिन कांग्रेसी अति उत्साह में हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी को पार्टी का महासचिव बना दिया है और उन्हें पूर्वी यूपी की जिम्मेदारी सौंपी है. राहुल ने कहा प्रियंका सक्षम और प्रतिभावान हैं और वे पार्टी द्वारा सौंपे गये मिशन को पूरा करेंगी. राहु ल की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. वे प्रियंका के बड़े भाई हैं और अपनी बहन के लिए कोई भी भाई ऐसी ही सोच रखता है. प्रियंका के राजनीति में इंट्री से उन्हें चारों ओर से बधाई मि ल रही है. जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने भी उन्हें ट्वीट कर बधाई दी है.

उन्होंने ट्वीट किया कि काफी दिनों के बाद जिस चीज का इंतजार था राजनीति में आज वही हुआ है. मैं प्रियंका गांधी को बधाई और शुभकामनाएं देता हूं. बताया जाता है कि एक फरवरी से प्रियंका गांधी अपनी जिम्मेदारी संभाल लेंगी. गौरतलब है कि प्रशांत किशोर ही वह शख्स है जिन्होंने यह कहा था कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अगर खुद को जिंदा रखना चाहती है तो उसे प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाना होगा अन्यथा सारे प्रयास व्यर्थ हैं.

वहीं भाजपा ने राजनीति में प्रियंका की इंट्री को राहु ल गांधी के असफ लता से जोड़ दिया है. भाजपा का कहना है कि राहु ल के लिए प्रियंका गांधी बैसाखी का काम करेंगी और यह कांग्रेस की तरफ से राहु ल गांधी की आधिकारिक विफ लता की घोषणा है.

आसान नहीं है प्रियंका गांधी की राह
बता दें कि यूपी में लोकसभा की कुल 80 सीटें हैं. 47 वर्षीय प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी है, जहां वाराणसी, गोरखपुर, गाजीपुर, इलाहाबाद, जौनपुर जैसी सीट है और जो भाजपा का गढ़ भी माना जाता है. यहां कुल 23 लोकसभा सीटें है, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वाराणसी सीट भी है. ऐसे में पीएम मोदी के मुकाबले प्रियंका गांधी को उतार कर कांग्रेस ने एक दांव खेला है, लेकिन यह प्रियंका के लिए टफ टास्क है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्षेत्र होने के साथ ही साथ इस क्षेत्र में जातीय समीकरण हावी है. उनके लिए इस समीकरण के साथ खुद को मैचअप करना होगा, रणनीति बनानी होगी. प्रियंका ने अभी तक अपनी सुविधा अनुसार राजनीतिक की थी लेकिन अब उन्हें आग में तपना होगा. हम लों का सामना करना होगा. सिर्फ अपनी बो लकर निक ल जाने वा ली रणनीति नहीं च लेगी अब.

प्रियंका की इंदिरा गांधी से तु लना
प्रियंका गांधी इंदिरा गांधी की पोती हैं, तो उनमें उनकी झ लक दिखना कोई अद्भुत बात नहीं है. यह तो स्वाभाविक बात है. लेकिन प्रियंका राजनीति में उनपर कितना गयी हैं यह तो उनकी कार्यशै ली बतायेगी. इंदिरा गांधी लगभग 47 वर्ष की उम्र में ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनी थीं उस लिहाज से प्रियंका के लिए भी यह सही समय कहा जा सकता है. लेकिन आज देश की राजनीति इंदिरा गांधी के का ल वा ली राजनीति नहीं है. यहां नैतिकता का अभाव है, परिवार के पीछे भागने वा ले लोग कम हैं. उसपर सबसे चौंकाने वा ली बात यह है कि आज देश में लगभग दो करोड़ वोटर ऐसा है जो 2000 में पैदा हुआ और इस बार पह ली दफा वोट करेगा. उसे ना तो देश की राजनीति का ठीक से ज्ञान है ना वह परिवार को जानता है, ना वो पढ़ने में बहुत रुचि रखता है और ना वह नेहरु- गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व वा ले जादू से वाकिफ है और ना उसे इसमें रुचि है. साथ ही कांग्रेस अब वह कांग्रेस नहीं रही जिसके नाम पर ही वोट मि ल जाता था. आज भाजपा सबसे पार्टी है. उसका संगठन है. दक्षिणी राज्यों में भी कांग्रेस क्षेत्रीय द लों के भरोसे है. ऐसे में प्रियंका के माथे कांटों का ताज है, उसे कांग्रेस में प्राण फूंकना है. अब देखना यह है कि प्रियंक़ा इसमें कितनी सफल होती हैं.

जानें प्रियंका गांधी के व्यक्तित्व को
प्रियंका गांधी राजीव गांधी और सोनिया गांधी की बेटी हैं. इन्होंने अपना बचपन अपनी दादी इंदिरा गांधी के साथ बिताया है. इनकी शिक्षा दि ल् ली यूनिवर्सिटी के जीसस एंड मेरी काॅ लेज से हुई है. इन्होंने साइको लाॅजी में बीए किया है. 2010 में इन्होंने Buddhist studies में एमए किया. एम करने के बाद प्रियंक़ा गांधी बौद्ध धर्म से इतना प्रभावित हुई कि इन्होंने बौद्ध अपना लिया. वे बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का पा लन करती हैं और विपश्यना भी करती हैं, जिसकी शिक्षा उन्हें एसएन गोयनका से मि ली है. गौरत लब है कि राहु ल गांधी भी विपश्यना के लिए शिविर में जाते हैं. प्रियंका गांधी ने 1997 में एक व्यवसायी राॅबर्ट वाड्रा से शादी की और इनके दो बच्चे हैं रिहान और मिराया.


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