बिहार के लेनिन जगदेव प्रसाद:सामाजिक न्याय के बेमिसाल योद्धा

अशोक यादव 
इस देश में हालाँकि कई कम्युनिस्ट नेता हुए हैं, लेकिन एक भी जनमानस के मन मस्तिष्क को इस तरह कैप्चर नहीं कर सका कि जनता उसे लेनिन कह दे. अपने जीवनकाल में ही जगदेव प्रसाद लेनिन कहे जाने लगे थे. जब उनकी ह्त्या हुई थी, तो बीबीसी ने हैडिंग चलाया: ” बिहार लेनिन की ह्त्या” लेकिन बिहार के लोकल अखबार आर्यावर्त जो अब बंद हो चुका है, और जिसका मालिकाना हक़ एक ब्राह्मण के हाथ में था, ने कुछ इस तरह से शीर्षक लगाया: खुद को बिहार का लेनिन कहने वाले जगदेव प्रसाद की ह्त्या”

वे नक्सल आंदोलन के शुरूआती दिन थे. जगदेव प्रसाद ने खुद को कभी कम्युनिस्ट नहीं कहा, बल्कि वे तो कम्युनिस्ट नेताओं को सामंती वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में देखते थे. उनका संसदीय प्रजातंत्र में यकीं था, उन्होंने प्यूरी तरह हिंसक क्रांति को खारिज किया था; फिर भी बिहार की राजनीती को कुछ इस तरह से प्रभावित radicalise कर दिया था कि लोग उन्हें बिहार का लेनिन कहने लगे थे.

जहाँ नक्सलवाद ने सामंती व्यवस्था को भूमि संबंधों के परिप्रेक्ष्य में देखा, वहीँ जगदेव प्रसाद ने इसकी जातिगत व्याख्या की जिसमे भूमि आधारित शोषक व्यवस्था में नीची जातियों के सामाजिक शोषण और आर्थिक शोषण का प्रचलन मौजूद है. हालाँकि उनके नक्सल आंदोलन से स्पष्ट मतभेद थे, पर उन्हें ये कहने में कोई गुरेज नहीं था कि वे पुरे बिहार में सहार को दोहराएंगे ( सहार भोजपुर जिले का वहीँ गांव था, जहाँ से पुरे बिहार में नक्सल आंदोलन की नींव पड़ी थी). सहर में नक्सल विद्रोह के हीरो मास्टर जगदीश के साथ जगदेव प्रसाद के नज़दीकी सम्बन्ध थे.
नक्सली तो अंडरग्राउंड थे, पर जगदेव प्रसाद ने पुरे बिहार में बड़ी बड़ी रैलियां कीं, जिसमे दलित और पिछड़ी जातियों के गरीब लोग शामिल हुए. इस सहभागिता ने सामंती ताकतों के मष्तिष्क में खतरे की घंटी बजाए दी. उनके लिए जगदेव प्रसाद एक ख़तरा लगने लगे.

5 सितम्बर 1974 को जिस दिन उनकी ह्त्या कर दी गयी, उसके तीन दिन पहले भूमिहार जाति के एक स्वतंत्रता सेनानी ने उन्हें चेताया कि उनकी ह्त्या का षड्यंत्र रचा जा रहा है. स्वतंत्रता सेनानी को जगदेव प्रसाद के साथ लगाव था और उन्होंने जगदेव प्रसाद को सलाह दी कि वे 5 सितम्बर को कुर्था न जाएँ. उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष राम स्वरुप सिन्हा ने भी उन्हें कुर्था की मीटिंग को टालने का अनुरोध किया. लेकिन सामाजिक न्याय के साहसिक योद्धा ने किसी भी हालत में मीटिंग न टालने का फैसला कर लिया था. सामंती ताकतों ने भी उन्हें ख़त्म करने की अपनी तैयारी पूरी कर ली थी. कुर्था के पुलिस थाने में पुलिस ऑफिसर के तौर पर अपना आदमी नियुक्त करवा लिया था. हत्यारों का दल भी पहुँच चुका था, जो मीटिंग को डिस्टर्ब मकसद से आया था.
घटना के दिन, जगदेव प्रसाद ने BDO को 7 सूत्री मांग सौंपा, जिसमे एक मांग था कि आंबेडकर के कलेक्टेड वर्क्स को बिहार के सारे दलित होस्टल्स और लाइब्रेरी में उपलब्ध करवाया जाए और दूसरे बिहार में सारे वोटर्स को फोटो आइडेंटिटी कार्ड उपलब्ध करवाया जाए. उनका इरादा ब्लॉक ऑफिस के बाहर जुटी भीड़ को सम्बोधित करने के बाद गिरफ्तारी देने का था.

लगभग 20000 लोग ब्लॉक ऑफिस के बाहर उनके इन्तजार में खड़े थे. सामंती ताकतों के शोहदे भी भीड़ में शामिल हो गए और पुलिस पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया. स्थिति तनावपूर्ण होती जा रही थी. जगदेव प्रसाद को फूलों की माला पहनाई गयी. पर ऐसे में उन्हें दूर से पहचान पाना आसान हो गया था. पुलिस अफसर के आदेश पर एक पुलिसकर्मी ने उन पर निशाना लिया. गोली बगल में खड़े एक दलित लड़के लक्षमण चौधरी को लगी. और उसकी तत्काल मौत हो गयी. दूसरी गोली ने जगदेव प्रसाद के गर्दन को चीर कर रख दिया. घायल जगदेव प्रसाद को उनके समर्थकों ने जीप डाल लिया और अस्पताल ले जाने लगे. लेकिन पुलिस ने बुरी तरह घायल जगदेव प्रसाद को जीप से उतार लिया और अस्पताल के बजाय कुर्था पुलिस स्टेशन ले गए. जगदेव प्रसाद ने पानी मांगा. पड़ोस में रहने वाली एक दलित महिला पानी लेकर आयी, पर पुलिस ने उसे भगा दिया. घायल जगदेव प्रसाद को तत्काल इलाज़ की आवश्यकता थी, पर पुलिसवालों ने बेरहमी से जगदेव प्रसाद के सीने को पहले बूट तले और फिर रायफल के बट से कुचल दिया. उनकी मौत हो गयी. आजाद भारत में ये पहला उदाहरण था जब बिहार सरकार में कैबिनेट मंत्री की इस बेरहमी से पुलिस वालों ने संस्थागत मर्डर था.

कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई. कहीं उनका मृत शरीर विरोध के मुखर स्वर न बन जाए, इससे उनकी लाश को डाल्टनगंज ले जाया घने जंगलों में फेंक दिया गया. समाजवादी नेता बी पी मंडल, राम लखन सिंह यादव, भोला प्रसाद सिंह और दरोगा प्रसाद राय तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर से मिले और उन्हें चेताया कि अगर जगदेव प्रसाद की लाश को वापस नहीं लाया गया, तो बिहार सुलग उठेगा. प्रेशर रंग लाया. 6 सितम्बर की सुबह उनके मृत शरीर को पटना लाया गया. 7 सितंबर को पटना में उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया. लोगों के दिलों में दुःख था और क्रोध भी. 7 सितम्बर की शाम को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में एक शोक सभा आयोजित की गयी, जिसे जय प्रकाश नारायण, राम स्वरुप वर्मा, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी जैसे दिग्गज नेताओं ने सम्बोधित किया.

पहली पीढ़ी शहीद होगी, दूसरी पीढ़ी जेल जायेगी और तीसरी पीढ़ी सत्ता हासिल करेगी…

बिहार में मुख्यमंत्री पद पर उच्च जातियों का वर्चस्व तोड़ने का श्रेय जगदेव प्रसाद को जाता है. बिहार में सबसे पहले 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी अपने 69 विधायकों के साथ गठबंधन सरकार में सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी थी, लेकिन इसके नेता कर्पूरी ठाकुर जो अति पिछड़ी जाति के एक कद्दावर नेता थे और जिन्होंने बिहार में सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष में बहुत बड़ी भूमिका निभायी, केवल उप मुख्यमंत्री बन सके. जगदेव प्रसाद उस समय कुर्था विधानसभा से संयुकत सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे. उन्होंने इस व्यवस्था का विरोध करते हुए अपने ही दल और राष्ट्रीय नेता राम मनोहर लोहिया के खिलाफ आवाज बुलंद की.

जहाँ लोहिया बुलंद किया था: ” पिछड़ा पावें सौ में साठ” वहीँ जगदेव प्रसाद ने इस नारे से भी आगे बढ़ते हुए नारा बुलंद किया: “हम शोषित 90 प्रतिशत हैं. इसलिए सत्ता, जमीन और संसाधन में 90 प्रतिशत हिस्सा हमारा है. 90 प्रतिशत 10 प्रतिशत का शासन नहीं सहेगा.” संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में टूट हुई. 25 अगस्त 1967 को उन्होंने अपना दल बनाया, शोषित दल. इस दिन आयोजित पार्टी के सम्मलेन में उन्होंने जो ओजस्वी भाषण दिया, उसकी ओज आज भी महसूस की जा रही है: आज इस सम्मलेन में मैं सौ साल चलने वाले लम्बे संघर्ष की नींव रख रहा हूँ. पहली पीढ़ी शहीद होगी, दूसरी पीढ़ी जेल जायेगी और तीसरी पीढ़ी सत्ता हासिल करेगी… सवर्ण जातियों ने हमारे पूर्वजों को बेगार करने पर मज़बूर किया. लेकिन मैं उनके राजनीतिक जुए को ढोने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ. मैं इस देश के 90 प्रतिशत शोषित लोगों को संगठित करूँगा, जो शिक्षा, संसाधन और सम्मान में पिछड़े हैं, जिन्हे पिछड़ा, भिखारी और असभ्य कहकर दुत्कारा जाता है, जो भूखे और नंगे हैं, जो विभिन्न जातियों और दलों में विभाजित हैं, उन्हें मैं एक दल, एक झंडे के तले एकजुट करूंगा. उनके वोट से राजनीतिक सत्ता हासिल करूंगा, भूमि और संसाधन का पुनर्बंटबारा करूंगा, जातिवाद और सम्प्रदियकता की राजनीति को ख़त्म करूँगा और उन्हें सम्मान से जीने का अधिकार दूंगा.”

बी पी मंडल जो आगे चलकर दूसरे बैकवर्ड क्लास कमीशन के चेयरमैन बने, जो मंडल कमीशन के नाम से ज्यादा फेमस हुआ, 1 फरबरी 1968 को पिछड़ी जाति से बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने. ( हालाँकि फौरी इंतजाम के तौर पर जब तक बी पी मंडल ने पदभार नहीं संभाल लिया, जगदेव प्रसाद ने पिछड़ी जाति के एक दूसरे नेता सतीश प्रसाद सिंह को तीन दिनों मुख्यमंत्री बनाया). राजनीति के शानदार रणनीतिकार के तौर पर जगदेव प्रसाद ने महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार को गिराने के लिए कांग्रेस का बाहर से समर्थन लिया। महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार को सीपीआई और जनसंघ दोनों का समर्थन प्राप्त था.

जगदेव प्रसाद और बी पी मंडल की सरकार 45 दिनों तक चली, फिर कांग्रेस के समर्थन वापस ले लेने के चलते सरकार गिर गयी. इन 45 दिनों में महत्वपूर्ण पदों पर पिछड़ी जातियों के अधिकारी नियुक्त किये गए, जातिगत दुर्भावना से सीनियर ऑफिसर्स के द्वारा किये गए रिमार्क्स को हटाया गया, ताकि उनके प्रमोशन का रास्ता क्लियर हो सके. जगदेव प्रसाद ने अपनी सरकार को ” शोषितों की सरकार” कहा. इस प्रथम विशुद्ध “शोषित सरकार” के बाद बिहार के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य ने एक नया मोड़ लिया.

1974 में जगदेव प्रसाद की हत्या ” शोषित समाज” के तीन नेता – दरोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर शास्त्री बिहार के मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे. जो ट्रेंड जगदेव प्रसाद ने शुरू किया, वो आज भी लालू यादव और फिर नीतीश कुमार के रूप में चल रहा है. निःसंदेह इसमें मंडल की भी भूमिका रही है.

जगदेव प्रसाद एक राजनीतिक चिंतक और दूरदर्शी थे. लोहिया के गैर कांग्रेसी राजनीति के दौर में उन्होंने जनसंघ की जगह कांग्रेस को चुना. वे पहले नेता थे जिन्होंने सामाजिक न्याय के साथ धर्मनिरपेक्षता का सम्मिश्रण किया. जगदेव प्रसाद की राजनीतिक सूझबूझ का पता 1990 के दशक में चला, जब मंडल और कमंडल के बीच राजनीतिक संघर्ष शुरू हुआ.

उत्तर प्रदेश के राम स्वरुप सिन्हा के साथ मिलकर उन्होंने सामाजिक न्याय के लिए राजनीतिक संघर्ष को ब्राह्मणवाद के खिलाफ सांस्कृतिक आंदोलन के साथ मिलाया. उन्होंने अपने दल ” शोषित दल” का विलय राम स्वरुप वर्मा के दल में कर दिया और इस तरह 7 अगस्त 1972 को एक नए दल ” शोषित समाज दल” की नींव पड़ी. वर्षों बाद कांशी राम ने अपने दल ” बहुजन समाज पार्टी” को “शोषित समाज दल” के आधार पर गठित किया.

जगदेव प्रसाद ने राम स्वरुप वर्मा के द्वारा ब्राह्मणवाद विरोधी संगठन ” अर्जक संघ” को “शोषित समाज दल” का सांस्कृतिक विंग बना दिया। राम स्वरुप वर्मा और जगदेव प्रसाद ऐसे दो उत्तर भारतीय नेता रहे हैं जिन्होंने राजनीतिक संघर्ष में सांस्कृतिक संघर्ष के महत्त्व को समझा.

उनका मानना था कि बिना ब्राह्मणवाद की मानसिक गुलामी से मुक्त हुए शोषित समाज राजनीतिक लड़ाई सफलतापूर्वक नहीं लड़ सकता. वर्तमान दौर में दलित- बहुजन राजनीति में विद्यमान संकट जगदेव प्रसाद और राम स्वरुप वर्मा के चिंतन की वैद्यता की गवाही देता है. सांस्कृतिक क्रांति के महत्त्व पर बोलते हुए जगदेव प्रसाद ने अपने समर्थकों से कहा: ” आसपास में हो रहे ब्राह्मणवाद विरोधी मीटिंग में जाने की हिम्मत जुटाओ, अगर घर में बेटे का मृत शरीर भी पड़ा हो तो. ”

जगदेव प्रसाद किशोरावस्था से ही क्रन्तिकारी विचारों के थे:

जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरबरी 1922 को बिहार के जहानाबाद जिले में कुर्था में प्रयाग नारायण और रासकली देवी के घर हुआ था. वे कुशवाहा जाति के थे. बिहार में कुशवाहा जाति पारम्परिक रूप से सब्जी उत्पादन में लगी हुई है. उनके पिता प्रयाग नारायण मिडिल स्कूल में टीचर थे. जगदेव प्रसाद ने मेट्रिक परीक्षा काफी देर से, 23 साल में पास की. उनके पिता का देहांत हो गया. उनके घर आये पुजारी ने पिता की मौत के लिए जगदेव प्रसाद को जिम्मेवार ठहराया. पुजारी का कहना था कि जगदेव प्रसाद नेसब्जी उपजाने के जातिगत पेशे को नहीं अपनाया, ऐसे में ईश्वर नाराज हो गए. जगदेव प्रसाद एक क्रन्तिकारी थे, उन्होंने अपने दादा को समझाया कि श्राद्ध न करें. श्राद्ध के बदले शोक सभा आयोजित की गयी और एक छोटे भोज का आयोजन किया गया, और ये हुआ बिना एक भी ब्राह्मण पुजारी के.

किशोर जगदेव जातिवाद के खिलाफ रोष के साथ बड़े हुए. 1950 में उन्होंने पटना के बी एन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर 1952 में अर्थशास्त्र में एम ए किया. जब वे विद्यार्थी जीवन में थे, उनकी शादी हो गयी.
वे समाजवादी नेता उपेंद्र नाथ वर्मा के संपर्क में आये. वर्मा ने जगदेव प्रसाद को सोशलिस्ट पार्टी के प्रकाशन ” जनता” के संपादन की जिम्मेवारी सौंप दी.

इसके बाद उनकी पार्टी ने उन्हें हैदराबाद अंग्रेजी प्रकाशन ” सिटीजन” के संपादन के लिए भेजा. सोशलिस्ट पार्टी ने उन्हें 1957 के लोकसभा चुनाव में बिक्रमगंज संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया. वे चुनाव हार गए. 1962 में वे कुर्था विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़े. वे फिर हार गए. लेकिन 1967 में वे कुर्था सीट से विधानसभा चुनाव जीत गए. 1969 में बिहार विधानसभा का मध्यवर्ती चुनाव हुआ. इस चुनाव में उनके दल ” शोषित दल” को 6 सीटों पर जीत हासिल हुई. उन्हें भी जीत हासिल हुई. लेकिन 1972 के चुनाव में उन्हें हार मिली.

जगदेव प्रसाद ने जय प्रकाश नारायण के 1974 के छात्र आंदोलन को समर्थन नहीं दिया और शोषित दल को इस आंदोलन से अलग रखा. उनका मानना था कि यद्यपि आंदोलन के मुद्दे सही थे, लेकिन नेतृत्व अच्छा नहीं था.

जगदेव प्रसाद की शहादत के बाद हर बीतते साल के साथ उनका राजनीतिक चिंतन और राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष को एकजुट करने का चिंतन बिहार ही नहीं, बल्कि देश के पिछड़े तबके के लोगों के लिए ध्रुव तारे की तरह प्रेरणा श्रोत बना रहेगा.

अशोक यादव एक विचारक हैं और सामाजिक न्याय के सिद्धांत के प्रति समर्पित हैं.


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