समस्तीपुर लोकसभा सीट: क्या लोजपा के रामचंद्र पासवान 2019 में सफलता दोहरा पाएंगे?

2014 के आम चुनाव में समस्तीपुर लोकसभा सीट पर कुल 57 प्रतिशत मतदान हुआ जिसमें 4,30,736 पुरुष एवं 4,32,463 महिला मतदाता थे. लोजपा के रामचन्द्र पासवान ने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के डॉ अशोक कुमार को 6872 मतों से हराया था. जदयू के महेश्वर हजारी लगभग दो लाख मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे.
समस्तीपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत 6 विधानसभा सीट हैं: कुशेश्वर स्थान, हायाघाट, कल्यानपुर, वारिसनगर, समस्तीपुर और रोसेरा हैं. कुशेश्वर स्थान और हायाघाट समस्तीपुर जिले में नहीं बल्कि दरभंगा जिले में आते हैं.

बिहार में कुल मिलाकर 6 सीट अनुसूचित जातियों के उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित हैं, जिसमे समस्तीपुर एक बेहद महत्वपूर्ण लोक सभा सीट है. ये छह सीट हैं: जमुई, गया, सासाराम, समस्तीपुर, हाजीपुर, और गोपालगंज.

क्या है समस्तीपुर लोक सभा सीट का इतिहास?

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर 1977 में जनता पार्टी की टिकट पर इस सीट से लोकसभा चुनाव जीते थे. इससे पहले लगातार यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव जीतते आ रहे थे. 1952 से 1971 तक लगातार.
कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया और मधुबनी के फुलपरास विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़े. उनके इस्तीफे के बाद खाली हुई इस सीट पर 1978 में जनता पार्टी के अजीत कुमार मेहता चुनाव लड़े और उन्होंने जीत दर्ज की. उन्होंने 1980 में भी जनता पार्टी (एस) की टिकट पर चुनाव जीतने में सफल रहे. 13 साल के लंबे अंतराल के बाद 1984 में कांग्रेस को इस सीट पर फिर से जीत मिली. रामदेव राय यहां से सांसद चुने गए.

इसके बाद 1989 से 1998 तक समस्तीपुर लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का कब्जा रहा. 1999 में आरजेडी छोड़ जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में आए मंजय लाल चुनाव जीतने में सफल रहे. 2004 में एकबार फिर आरजेडी ने इस सीट को अपने पाले में किया. आलोक कुमार मेहता चुनाव जीतने में सफल रहे. 2009 के लोकसभा चुनाव में पूरे बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की एक लहर चल रही थी. समस्तीपुर सीट पर भी जेडीयू को सफलता मिली और महेश्वर हजारी चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे.

2014 के लोकसभा चुनाव में यह सीट लोजपा के पाले में चली गई. रामचंद्र पासवान चुनाव मैदान में उतरे. लगभग 15 लाख मतदाताओं वाले इस लोकसभा क्षेत्र में 2014 के चुनाव में 57.38 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई थी. इस चुनाव में जेडीयू ने महेश्वर हजारी को फिर से चुनावी मैदान में उतारा. लगभग दो लाख मतों के साथ वह तीसरे स्थान पर रहे. वहीं रामचंद्र पासवान ने 270401 वोटों के साथ कांग्रेस उम्मीदवार डॉ अशोक कुमार को मात दी, जिन्हें कुल 263529 वोट मिले थे.

समस्तीपुर हमेशा से रिजर्व्ड सीट नहीं रहा था.

समस्तीपुर हमेशा से रिजर्व्ड सीट नहीं था. 2009 के लोक सभा चुनाव से समस्तीपुर लोक सभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुआ. 2007 में रिटायर्ड जस्टिस कुलदीप सिंह आयोग ने बिहार में छह सीटें रिज़र्व कीं: गया, हाजीपुर, सासाराम, गोपालगंज, समस्तीपुर और जमुई. इनमे तीन सीटें गया, हाजीपुर और सासाराम पहले से रिज़र्व सीट थे.

समस्तीपुर की  95.08 प्रतिशत जनता ग्रामीण इलाकों से ताल्लुक रखती है जबकि मात्र 4.92 प्रतिशत जनता ही शहरी है. इनमे 19.47 प्रतिशत

2014 के आम चुनाव के आंकड़ों पर नज़र डालें तो किसी भी पार्टी का वोटबैंक मजबूत नहीं कहा जा सकता. 2014 के लोकसभा चुनावों में विजयी पार्टी लोजपा का वोट शेयर मात्र 31. 33 प्रतिशत रहा, जबकि दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर 30. 53 प्रतिशत था. तो कुल मिलाकर जीत निर्णायक नहीं कही जायेगी. नोटा के हिस्से कुल 29,211 वोट पड़े, जो कुल वोट का 3.38 प्रतिशत वोट थे.

कौन हैं रामचंद्र पासवान?
रामचंद्र पासवान लोजपा सुप्रीमो रामबिलास पासवान के छोटे भाई हैं. उनका जन्म 1 जनवरी 1962 को खगड़िया में शहरबन्नी इलाके में श्री जामुन दास और श्रीमती सिया देवी के घर हुआ. 22 साल की उम्र में उनका विवाह सुनैना देवी से हो गया. उन्होंने मैट्रिक तक की शिक्षा प्राप्त की है. उनके 2 बेटे और 1 बेटी हैं.
रामचंद्र पासवान अपने बड़े भाई का शह पाकर बहुत तेजी से राजनीतिक गलियारे में तरक्की की सीढ़ी चढ़ते चले गए. 37 साल की उम्र में वे पहली बार 13 वीं लोक सभा के के लिए चुने गए. 1999 से 2004 तक वे लोकसभा की विभिन्न कमिटियों के सदस्य रहे. 2004 में वे फिर से लोक सभा के लिए चुने गए.

क्या लोजपा के रामचंद्र पासवान फिर से सफलता दोहरा पाएंगे?

हालाँकि अभी तय नहीं हुआ है कि एनडीए के घटक दल किस सीट पर लड़ेंगे, पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोई भी दल अपने जीते हुए सीट को छोड़ना नहीं चाहेगा. तो हम मानकर चल सकते हैं कि समस्तीपुर लोक सभा सीट से लोजपा 2019 में फिर से रामचंद्र पासवान को खड़ा करेगी. इस बार तस्वीर 2014 से बदली हुई है. 2014 में जहाँ जदयू और भाजपा अलग अलग चुनाव लड़ रहे थे और जदयू के महेश्वर हज़ारी को दो लाख के करीब वोट भी मिले थे. ऐसे में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया था. लोजपा, कांग्रेस और जदयू. ऐसे में चुनावी जीत का अंतर् बेहद कम था.

हालाँकि रामचंद्र पासवान का बतौर सांसद कार्यकाल बहुत प्रभावी नहीं रहा, लेकिन मुकाबला इस बार त्रिकोणीय न होकर दोतरफा हो गया है. एनडीए गठबंधन के घटक दल के तौर पर रामचंद्र पासवान उम्मीद कर सकते हैं कि जदयू के वोट उन्हें ट्रांसफर हों. अगर ऐसा हो सका, तो पिछली बार के विपरीत इस बार जीत निर्णायक हो सकती है.

2014 के मुकाबले 2019 में नरेंद्र मोदी की लहर कमजोर हुई है, पर मोदी सरकार ने चुनाव में अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए कई लोक लुभावन कदम उठाये हैं. एक तरफ तीन राज्यों में कांग्रेस से विधानसभा चुनाव हार के बाद उन्होंने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया है, वहीँ अंतरिम बजट में किसानों, गोपालकों, मिडिल क्लास के लिए कई घोषणाएं की हैं. मोदी सरकार की हालिया घोषणाएं वोटर के व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं.

तो ऐसे में ये अनुमान लगाया जा सकता है कि मोदी लहर के कमजोर पड़ने के बावजूद समस्तीपुर सीट निकालने में एनडीए सफल हो सकता है.


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