बिहार में नीरा के उत्पादन और साथ ही सफल मार्केटिंग से एक क्रांति लायी जा सकती है.

डॉ सागरिका चौधरी

मै यह बात पुरे यकीं से कह सकती हूँ कि बिहार में नीरा के उत्पादन और साथ ही सफल मार्केटिंग से एक क्रांति लायी जा सकती है. बिहार में कुल 38 जिले हैं. बिहार सरकार ने नशाबंदी की योजना के तहत राज्य भर में ताड़ी की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया है और वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था के तहत नीरा की बिक्री को बढ़ावा देने की नीति अपनायी है. बिहार की जलवायु में ताड़ के पेड़ काफी फलते फूलते हैं, ऐसे में नीरा की बिक्री के लिए कच्चा माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. वहीँ दूसरी ओर, ताड़ के फल अन्य फलों की तरह सीजनल हैं. ऐसे में अगर नीरा का उत्पादन हो, और उसका सही ढंग से पैकिंग और रख रखाव हो, तो मौसम के परे भी इस पेय पदार्थ उपलब्ध करवाया जा सकता है. अगर सही मार्कटिंग स्ट्रेटेजी अपनायी जाय, और सरकार का सब्सिडी के रूप में सहयोग मिले, तो नारियल पानी की तर्ज पर ही नीरा को बिहार और बिहार के बाहर बेचा जा सकता है. एक पूरा मार्केटिंग चेन बन सकता है, जो न केवल इस व्यवसाय में लगे पारम्परिक पासी जाति के लोगों के लिए लाभदायक होगा, बल्कि इस पौष्टिक और स्वादिष्ट पेय के मार्केटिंग और बिक्री में लगे लोगों के लिए भी फायदेमंद होगा. एक नयी क्रांति लायी जा सकती है, क्योंकि फ़िलहाल ये सेक्टर अभी अपनी संभावनाओं के साथ बचा हुआ है.

इस कार्य में लगे छोटे छोटे उत्पादकों को सहकारी संघ के माध्यम से संगठित किया जा सकता है, जैसे डेयरी सेक्टर में सहकारिता के सिद्धांत को सफलतापूर्वक आजमाया जा चुका है.

फिलहाल इस सेक्टर की कुछ संस्थागत समस्याएं:
१. फिलहाल बिहार में तीन जिलों में – समस्तीपुर, सीतामढ़ी और छपरा में सहकारी संस्थाएं नीरा के संशोधन और प्रसंस्करण में लगी हुई हैं, पर उन्हें सरकारी सहयोग नहीं मिल रही है और वे अपने सीमित आर्थिक संसाधनों के बल पर सीमित तरीके से काम कर रही हैं.

२. संसाधनों का महत्त्व इस बात से समझा जा सकता है कि बगैर फ्रीज़ के जहाँ नीरा को शीशी में डेढ़ महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है, वही फ्रीजर की व्यवस्था हो जाए तो उत्पाद की शेल्फ लाइफ छह महीने तक बढ़ाई जा सकती है. इसके अलावा, ये सामान्य जानकारी है कि तार का रस उतारने के काम के अपने प्रोफेशनल हैज़ार्डस हैं, जैसे पेड़ से गिर जाना और जान गंवा बैठना, सांप के दंश में जान गंवा बैठना आदि. ऐसे में जरुरत है कि पेड़ पर चढ़ने को सुरक्षित और आसान बनाया जाए. क्लाइम्बिंग मशीन है, जो सब्सिडी के बिना लगभग 8000 रुपए में आता है, पर अगर सरकार इसे सब्सिडी देकर इसकी कीमत कर करे और इसकी उपलब्धता 1500 से 2000 रूपये में सुनिश्चित करवाए, तो पुरे बिहार में इसे आसानी से खरीदा जा सकता है और फिर तार का रस उतारना बेहद सुरक्षित काम हो जाएगा. ये मशीन इतना सुविधाजनक है कि एक बिलकुल अप्रशिक्षित पुरुष यहाँ तक महिला भी इस मशीन के सहारे पेड़ पर चढ़ सकती है और जितनी देर चाहे रुक सकती है.

३. मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में 14 दिसंबर 2016 को घोषणा की थी कि बिहार में नीरा का उत्पादन और बिक्री सहकारी संस्थाओं के माध्यम से की जायेगी। इस घोषणा के बाद बिहार के करीब 15 जिलों में बिहार सहकारिता अधिनियम 1996 के तहत पासी समुदाय के लोगों ने सहकारी समिति बनाकर निबंधन के लिए आवेदन दिया है, पर निबंधन की प्रक्रिया बेहद बेहद धीमी है. नतीजा अभी तक महज 4 जिलों में- सीतामढ़ी, समस्तीपुर, सिवान और छपरा में सहकारी संस्थाओं को निबंधन प्राप्त है. ऐसे में काम में जरुरी तेजी नहीं आ पा रही है.

४. एक समस्या ये भी महसूस की जा रही है कि नीरा के उत्पादन के लिए जीविका की दीदियों का सहारा लिया जा रहा है, पर जीविका की दीदियाँ पासी जाति से नहीं आती हैं और उनमे उत्पादन के स्थलों तक जाकर कलेक्शन में रूचि नहीं ली जा रही है. नीरा के लिए ये बेहद जरुरी है कि सही समय पर ताड़ के रस का जाए, नहीं तो देर होने से इसमें फेरमेंटशन शुरू हो जाता है, और फिर यह नशीला हो जाता है.

५. नीरा के उत्पादन और बिक्री को कोआर्डिनेट करने के लिए राज्य स्तरीय सहकारी समिति हो, क्योंकि वर्तमान में जिले के स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्ष में समिति का गठन होना है, पर जिलाधिकारी काम के बोझ के तले दबे हुए हैं. ऐसे में वे जिले स्तर पर समिति के गठन पर न्यायोचित समय नहीं दे पा रहे हैं.

नीरा की बिक्री देश के अन्य राज्यों में सफलतापूर्वक की जा रही है.
आज जरुरत इस बात की है कि समय रहते बिहार इस पर उचित कार्य करे, क्योंकि देश के अन्य राज्यों में नीरा की बिक्री सफलतापूर्वक हो रही है. महाराष्ट्र में मुंबई- पुणे हाईवे पर अलग अलग साइज के टेट्रा पैक में नीरा उपलब्ध है. अगर सही समय पर एक्शन नहीं लिया गया, तो इस बात की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि अन्य राज्यों की कंपनियां यहाँ आकर जम जाएँगी और फिर ये बिहार के स्थानीय उद्यमियों के लिए हौसला तोड़ने वाला होगा.

ऐसे में एक्शन प्लान:

1. चूँकि बिहार सरकार के फैसले से बिहार राज्य में महादलित पासी समुदाय के लगभग 50 लाख लोग प्रभावित होंगे, ऐसे में तार के रस के तेज गति से कलेक्शन का इंतजाम किया जाए.

2. क्लाइम्बिंग मशीन को बिहार सरकार सब्सिडी दे. क्लाइम्बिंग मशीन कितना सुविधाजनक है, इसके लिए बिहार के हर जिले, प्रखंड, गांव जाकर पासी समुदाय के लोगों के बीच डेमो देने की जरुरत है.

3. क्लाइम्बिंग मशीन को खरीदने के लिए अगर माइक्रो फाइनेंस कंपनी आगे आती है, तो फिर बिहार सरकार ऐसी कंपनियों को अपना समर्थन दे. ताकि इस मशीन को अधिक से अधिक लोगों के बीच पहुँचाया जा सके.

4. राज्य स्तरीय सहकारी समिति बनायी जाए, साथ ही जिला स्तरीय सहकारी समितियों का भी गठन किया जाए, और इसमें सरकारी और गैर सरकारी दोनों सेक्टर के लोग सदस्य रहें.

5. सरकार की सब्सिडी योजना का महत्त्व महज तार का रस उतारने वालों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी मार्केटिंग में लगे लोगों को भी इसके कवरेज में लेना होगा. उदहारण के लिए टेट्रा पैक, पीने के लिए स्ट्रॉ, स्टोरेज हेतु कंटेनर, इंसुलेटेड केन, और समुचित preservation के लिए यंत्र जैसे फ्रीज़, बिजली उपकरण, ट्रांसपोर्टेशन, मार्किट से जोड़ने स्पेशल वाहन आदि की जरुरत पड़ेगी. इसमें भी बड़े पैमाने पर सब्सिडी की जरुरत पड़ेगी. इसके अलावा अँधेरे में काम करने के लिए प्रत्येक टैपर् को हेड लाइट के साथ बिजली का उपकरण उपलब्ध करवाना होगा.

6. नीरा के फायदों को आम जनता तक पहुँचाने और साथ ही क्लाइम्बिंग मशीन के फायदे आदि तमाम पहलुओं से आम जनता को अवगत कराने के लिए इसकी ब्रांडिंग और साथ ही ब्रांड अम्बेसडर की नियुक्ति की जरुरत होगी. प्रेस में कवरेज, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में advertisement के लिए स्पेस लेना होगा.

7. नीरा की बिक्री बिना सब्सिडी के खर्चीली हो सकती है. नीरा का वर्गीकरण पी एच वैल्यू के आधार पर करना होगा और उसकी कीमत तय करनी होगी. ध्यान रखना होगा कि प्राइस नारियल पानी की तर्ज पर कॉम्पिटिटिव रहे, इसके लिए सरकार को समुचित सब्सिडी की व्यवस्था करनी होगी.

8. काम में प्रोफेशनल हैजर्ड को देखते हुए टैपर के लिए इन्शुरन्स, मेडिकल इन्शुरन्स आदि की व्यवस्था करनी होगी. मिनिमम सपोर्ट प्राइस की घोषणा करनी होगी. प्राइवेट प्लेयर भी तार का रस खरीद सकें, इसको सुनिश्चित करना होगा.

9. सब्सिडी देना होगा ताकि ताड़ के पेड़ न केवल लगाए जा सकें बल्कि उनकी समुचित देखभाल कर सकें.
10. अंत में, तार के रस से सिर्फ नीरा नहीं बनाया जा सकता है, बल्कि गुड़, मिठाई आदि कई प्रोडक्ट बनाये जा सकते हैं, तो इन उद्योगों का आईडिया लेकर अगर उद्यमी सामने आते हैं, तो बिहार सरकार उन्हें सब्सिडी देकर एवं अन्य उचित निर्णयों के साथ उनका हौसला बढाए.

डॉ सागरिका चौधरी पटना यूनिवर्सिटी की सिंडिकेट सदस्य हैं और जदयू नेत्री हैं.

 


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