मानव जीवन पर बढ़ रहे स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए जैविक खेती की शरण में जाना होगा

R K Paliwal*

आजकल जिस तरह से हृदय, जिगर, गुर्दे और कैंसर जैसी घातक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं उनका सबसे प्रमुख कारण हमारा नित्य प्रति का जहरीला भोजन है. खेती में इस्तेमाल हो रहे जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग के बारे में किसानों में जागरूकता का नितांत अभाव है. दूसरी तरफ इन जहरीले कीटनाशकों से पैदा हुए अन्न, सब्जियों, फलों और दालों आदि के सेवन से हमारे स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्प्रभाव के बारे में आम जनता को भी सही जानकारी नहीं है.
जाने अनजाने हम फसलों को उगाने, पकाने और चमकदार एवं रंगीन बनाने में कई स्तर पर प्रयोग होने वाले जहरीले रसायनों का सेवन कर रहे हैं. नाश्ते से लेकर रात के खाने तक यह जहरीले रसायन हमारे स्वास्थ्य को निरन्तर बर्बाद कर रहे हैं.
तीसेक साल पहले तक खेती में इन रसायनों का प्रयोग नहीं के बराबर या बहुत कम होता था क्योंकि हमारी पारंपरिक ऋषि खेती में प्राकृतिक गोबर खाद का प्रयोग होता था. पिछले 3 दशकों में रसायनों का इस्तेमाल बेतहाशा बढ़ा है. इस वजह से जानलेवा बीमारियां भी निरन्तर बढ़ी हैं.
इधर जागरूक किसानों के एक छोटे वर्ग ने गोबर एवं केंचुआ खाद पर आधारित जैविक खेती शुरू की है और जागरूक लोगों ने जैविक खाद्य सामग्री का इस्तेमाल शुरू किया है.
जैविक खेती में रसायनों आदि का खर्च नही होता लेकिन प्राकृतिक खाद तैयार करने में थोड़ी ज्यादा मेहनत पड़ती है जिससे जैविक उपज रसायनिक उपज से थोड़ी महंगी मिलती है. अपने स्वास्थ्य के लिए थोड़ा ज्यादा खर्च करना तर्कसंगत है क्योंकि स्वास्थ्य सर्वोपरि है. जान है तो जहान है.

जब अधिक से अधिक लोग जैविक खाद्य सामग्री खरीदेंगे तभी किसान भी जैविक खेती की तरफ मुड़ेंगे. तभी स्वस्थ समाज बनेगा. इसलिए हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि बिना समय गंवाए जैविक अन्न, दालें, सब्जियां और फल ही खरीदें. मांग और आपूर्ति का सिद्धांत जैविक खाद्य पदार्थ की मांग को निर्धारित करेगा. जब जैविक खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ेगी, तो किसान भी इसे लाभ का सौदा समझ कर इस ओर उत्साह के साथ बढ़ेंगे.
जैविक खेती हमारी सभ्यता और संस्कृति की प्राचीन विरासत रही है.

पुरातन काल में इसे “ऋषि खेती” के रूप में भी जाना जाता था।खेती की इस पारंपरिक व्यवस्था के निम्न महत्वपूर्ण पहलू थे जिसके कारण यह ईसा पूर्व से शुरू होकर अंग्रेजी शासन काल तक भी निर्बाध जारी रही –
1. खेती की इस व्यवस्था में पूंजी के रूप में खर्च नगण्य था क्योंकि किसान के पास अपना बीज था, अपने गाय बैल थे जिनसे खेती की जुताई, परिवार के लिए दूध, घी, खाद और ईंधन आदि जरूरी चीजों की व्यवस्था हो जाती थी.
2. जैविक खेती करने वाले किसान आत्मनिर्भर थे. न उन्हें पूंजी के लिए कर्ज की जरूरत होती थी और न बाहर से खाद और बीज या खाने पीने की चीजें खरीदनी होती थी. इन्ही परिस्थितियों में खेती को आजीविका के सभी साधनों में सबसे ऊपर रखा जाता था – “उत्तम खेती मध्यम बाण निषिद्ध चाकरी भीख निदान”.
3 . जैविक खेती के काम में मेहनत लगती है. परिश्रम करने और शुद्ध पौष्टिक भोजन मिलने से किसान परिवार का स्वास्थ्य ठीक रहता था।दवाइयों का खर्च नही के बराबर था.

खेती की व्यवस्था में आजादी के बाद तेजी से बदलाव आया है , जिसमें जुताई, बुआई और कटाई के लिए ट्रेक्टर और महंगी मशीनरी, हाइब्रिड बीजों, रासायनिक उर्वरकों और पेस्टीसाइड पर किसानों को बहुत खर्च करना पड़ता है. इस खेती के लिए पानी की भी ज्यादा जरूरत होती है. इन सबके लिए किसान को हर साल कर्ज की जरूरत पड़ती है और वह पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हो गया है.
एक तरफ वर्तमान खेती से किसान परेशान हैं और दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को जहरीले खाद्य पदार्थ खाने पड़ रहे हैं. श्रमहीन और पूंजी आधारित खेती में एक तरफ किसान बीमार परेशान हैं और दूसरी तरफ जहरीला भोजन खाने को मजबूर आम जनता भी गम्भीर बीमारियों से जूझ रही है. तीसरी तरफ बेकार हुआ पशुधन सड़कों पर आवारा घूम रहा है. चौथे बीमार समाज पर सरकार का स्वास्थ्य खर्च बेतहाशा बढ़ गया है.
इन तमाम बड़ी समस्याओं का एक ही समाधान है – “जैविक खेती”. इसी से किसान आत्मनिर्भर बनेगा और किसान आत्महत्या रुकेंगी. इसी से लोगों को स्वास्थ्यवर्धक पौष्टिक भोजन मिलेगा जिससे जानलेवा बीमारियों से मुक्ति मिलेगी और देश स्वस्थ होगा. इसी से सड़कों पर भटकते गोवंश का कल्याण होगा और उसे वह सम्मान मिलेगा जो गोवर्धन पूजा के प्रतीक रूप में हमने देखा है. इसी से सरकार का उर्वरक सब्सिडी और स्वास्थ्य पर खर्च बचेगा.

यह संभव है.

जापान के फुकोका गुरु और भारत के सुभाष पालेकर सरीखी विभूतियों ने देश विदेश में इसकी अलख जलाई है. धीरे धीरे कुछ जागरूक लोगों ने अपने स्तर पर जैविक खेती को अपनाना शुरू किया है लेकिन यह प्रयास नाकाफी है. इस कार्य को एक बड़े रचनात्मक आंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए जिसमें आम जनता, किसानों, समाजसेवी संस्थाओं और सरकारों की संयुक्त सहभागिता की जरूरत है.

*R K Paliwal इनकम टैक्स चीफ कमिश्नर हैं और जाने माने गाँधीवादी चिंतक हैं.


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