कृष्णा स्कूल में आगजनी के डेढ़ दशक के बाद हम बच्चों की सुरक्षा के लिए कितने सतर्क हैं?

नकुल तरुण, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्सपर्ट.

दिल्ली के करोलबाग के एक होटल में आग लग गयी. 17 लोग बेमौत मारे गए. बेहद अफसोसजनक खबर है ये. याद आ रहा है आज से डेढ़ दशक पहले तमिलनाडु के एक जिले में एक स्कूल में लगी आग.

तमिलनाडु के कुंबकोणम जिले में लार्ड कृष्णा मिडिल स्कूल की कहानी है ये. आग स्कूल के किचन में उस समय लग गयी जब रसोईये मध्यान्न भोजन तैयार कर रहे थे. 16 जुलाई 2004 के दुर्भाग्यशाली दिन किचन की फूंस वाली छत ने तेजी से आग पकड़ ली और आग की लपटें हर तरफ फ़ैल गयीं. प्राइमरी सेक्शन में कुल मिलाकर 94 बच्चे ज़िंदा जल गए.

लार्ड कृष्णा मिडिल स्कूल उन हज़ारों कम बजट के प्राइवेट स्कूलों में थे, जो कुकुरमुत्ते की तरह देश भर में उग आये हैं और जहाँ बच्चों की सुरक्षा स्कूल मैनेजमेंट के एजेंडा में कहीं नहीं है. 16 जुलाई 2004 के उस दुर्भाग्यशाली दिन भी झोपड़पट्टी वाले स्कूल में 900 से अधिक बच्चे जुटे हुए थे, स्कूल में आने जाने के लिए एकमात्र प्रवेशद्वार, संकड़ी सीढियाँ, क्लासरूम ऐसे जिनमे खिड़कियां नहीं और क्षमता से अधिक बच्चे, भेड़ बकरियों की तरह ठूंसे.

आग नारियल के सूखे पत्तों से लग गयी, जो झोपड़पट्टी वाले किचन में जलावन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था. माना जाता है कि पुरे स्कूल बिल्डिंग का वेंटिलेशन एकदम खराब था, वेंटिलेशन के नाम पर दिवार में कुछ छेद थे, खिड़कियां नहीं. किचन की आग की लपटें इतनी ऊँची उठीं कि उसने स्कूल की बिल्डिंग की झोपड़पट्टी वाली छत को छू लिया और आग की लपटों से भर गयीं फूंस की छत जो बॉस बल्लियों पर टिकी थीं, क्लासरूम में बैठे बच्चों पर गिर गयी और उनमे से अधिकांश बच्चे घटनास्थल पर ही जलकर मर गए.

आग की उठती लपटों ने आसपास के लोगों का ध्यान खींचा. कुछ ने पुलिस को फ़ोन किया. लोग स्कूल की और दौड़े. कुछ देर में फायर ब्रिगेड भी पहुँच गया. सबने मिलकर आग की लपटों पर काबू पाने का प्रयास किया और साथ भी आग की लपटों में घिर गए बच्चों को निकालने का प्रयास किया. स्कूल की संकड़ी, छोटी सीढ़ियों और एकमात्र प्रवेश द्वार ने बचाव के प्रयास में बाधा डाली. वालंटियर जैसे बचाव कार्य के लिए जुटे, उन्होंने अनजाने में मुख्य द्वार को ब्लॉक कर दिया.

हर स्तर पर सुरक्षा नियामकों का उल्लंघन हुआ था

स्कूल में फूंस की छत वास्तव में बिल्डिंग लॉ का घोर उल्लंघन है. पर इस स्कूल में तो नियम कानून का हर स्तर पर उल्लंघन किया गया था. इस स्कूल में फूंस की छत वाला किचन भी था, जो स्कूल की झोपडी वाली छत वाले क्लास रूम्स से लगा हुआ था. और चूँकि किसी ने स्कूल मैनेजमेंट से इसकी शिकायत नहीं की, यहाँ तक कि सरकारी इंजीनियर ने भी नहीं, जिनका काम हर साल सारे सुरक्षा मानकों को देखते हुए पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट देना था. फायर एक्सपर्ट की राय में स्कूल एक डेथ ट्रैप था. स्पष्ट था कि हर स्तर पर लापरवाही हुई थी. ऐसे में कोई भयानक दुर्घटना कभी भी घट सकती थी. 16 जुलाई 2004 वही दुर्भायगशाली दिन था. बच्चे चूँकि टॉप फ्लोर पर पढ़ाई में लगे थे, तो आग की उठती लपटों ने उन्हें आसानी से निशाना बना लिया.

क्या हमने इस घटना से कोई सबक लिया है?
इस भयावह घटना के डेढ़ दशक हो गए हैं, पर लगता है हमने डेढ़ दशक बीतने के बाद भी कोई सबक नहीं लिया है. पुरे देश में स्कूल सुरक्षा के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. 2005 में भारत सरकार ने डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट पारित किया,पर जमीन पर स्थिति में इससे भी कोई परिवर्तन नहीं आया.

जरुरत है हमें ऐसा माहौल बनाने की जहाँ (1) प्रत्येक बच्चा असुरक्षा और शारीरिक खतरे के माहौल से आजाद होकर एक स्तरीय शिक्षा पाए.
(2) बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम कानून बनाये जाएँ.
(3) ये सुनिश्चित करने की जरूरत है कि बच्चों के लिए सुरक्षा के पैमाने दुनिया के सर्वोच्च सुरक्षा पैमानों की बराबरी के हों.
(4) और साथ ही यह भी कि हम सिर्फ नियम बनाकर ही न रुक जाएँ, बल्कि उन सुरक्षा नियमों की कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए.

मैं एक बार फिर बच्चों के माता पिताओं और इनके असोसिएशन से आग्रह करूँगा कि वे अपने बच्चों के स्कूलों में मौजूद सुरक्षा व्यवस्थाओं की गंभीरता से जांच करें और ये सुनिश्चित करने का प्रयास करें कि स्कूल में डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान हो और स्कूल साल में कम से कम 4 बार evacuation drill आयोजित करे, ताकि शिक्षक और बच्चे किसी भी इमरजेंसी से निपटने के लिए सक्षम रहें. आखिरकार यह हमारे बच्चों के जीवन का सवाल है और हम इस मामले में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं कर कर सकते.


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