घर से स्कूल और स्कूल से घर तक स्कूल ट्रांसपोर्ट बच्चों की सुरक्षा की सबसे कमजोर कड़ी है

नकुल तरुण, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्सपर्ट 

यहाँ मैं अलग अलग तरह के कुछ केस ले रहा हूँ, जिसमे सरकार के द्वारा तय किये गए ट्रांसपोर्ट गाइडलाइन्स के पालन नहीं करने की स्थिति में एक्सीडेंट हुए और बच्चों को जान गंवानी पड़ी.

दिल्ली में 18 स्कूली बच्चों को ले जा रहा वैन दूध ले जा रहे वैन से टकरा गया. एक बच्ची वहीँ घटना स्थल पर मर गयी और बाकी गंभीर रूप से घायल हो गए. नियम कहता है कि आप वैन में जितनी सीट की संख्या है, उतने ही बच्चों को ले जा सकते हैं. या अगर विद्यार्थियों की उम्र 12 साल से कम है, तो गाडी में मौजूद सीटों की संख्या की तुलना में डेढ़ गुना बच्चों को ले जा सकते हैं. तो इस वैन के मामले में पाया गया कि वैन इस नियम की पूरी तरह उल्लंघन कर रहा था. इतना ही नहीं, ये भी पाया गया कि वैन गलत दिशा से आ रही थी. कई स्कूली वैन में ये भी पाया गया है कि बच्चों को वैन में रखे गए बेंचों पर बिठाया जाता है. ऐसे में बच्चों को सहारे के लिए पकड़ने के लिए कुछ नहीं होता. तो अगर छोटी भी दुर्घटना होती है, तो बच्चे जख्मी हो जाते हैं.

कुशीनगर में 20 स्कूली बच्चों को ले जा रही वैन सुबह सुबह एक मानवरहित रेलवे क्रासिंग (Unmanned Railway Crossing) पार करते हुए तेज गति से आ रही ट्रेन से टकरा गयी. 13 बच्चे घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया और बाकी 7 गंभीर रूप से घायल हो गए. उस समय ड्राइवर कान में इयरफोन लगाकर गाना सुनने में व्यस्त था और उसने ‘गेट मित्र” की वार्निंग को नज़रअंदाज़ कर दिया, जांच के बाद रेलवे अधिकारियों का ये कहना था. आपको बता दें कि “गेट मित्र” मानवरहित
रेलवे क्रासिंग पर तैनात वालंटियर होते हैं, जो ट्रैन की आवाजाही को लेकर गाड़ी चला रहे ड्राइवर्स को सचेत करते हैं. एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि ड्राइवर चूँकि कान में इयरफोन लगाए हुए था, ऐसे में उसने बच्चो की चीख नहीं सुनी, जो ट्रेन को तेज रफ़्तार से लगातार पास आते हुए देख रहे थे.

दरअसल घर से स्कूल और स्कूल से घर के बीच स्कूल ट्रांसपोर्ट सबसे कमजोर कड़ी है, या सबसे बड़ा गैप है. यह पाया गया है कि कई बार मेट्रो सिटीज में रिजेक्ट कर दिए गए वाहनों को छोटे शहरों में स्कूली बच्चों को लाने ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. कानून का बहुत ही ढिठाई से उललंघन किया जाता है. मैं व्यक्तिगत तौर पर बच्चों के माता पिताओं से अनुरोध करूँगा कि वे स्कूल ट्रांसपोर्ट के मुद्दे पर गौर फरमाएं.

यहाँ दस ऐसे मुख्य स्कूल बस सेफ्टी रूल्स हैं, जो हर पैरेंट अपने बच्चों को स्कूल बस से स्कूल भेजने से पहले सुनिश्चित करें कि स्कूल उनका अनुपालन कर रहा है

1. स्कूल बस पीले रंग में रंगे होने चाहिए. बस के आगे और पीछे दोनों जगह “स्कूल बस” लिखा होना चाहिए और साथ ही स्कूल का नाम और पता भी. अगर ये स्कूल की अपनी बस न होकर भाड़े की बस है, तो ” On School Duty” साफ साफ़ लिखा होना चाहिए.
2. ड्राइवर के साथ साथ अन्य जरुरी विवरण ( नाम, पता,लाइसेंस नंबर, बैज नंबर), स्कूल का कांटेक्ट नंबर, ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट का हेल्पलाइन नंबर, गाडी का रजिस्ट्रेशन नंबर, बस के अंदर और बाहर अलग तरह के रंगों में लिखा होना चाहिए, ताकि स्पष्ट दिखाई पड़े.
3. स्कूल बस में फर्स्ट ऐड बॉक्स और साथ ही अग्निशमन यंत्र ( फायर extinguisher) जरूर होना चाहिए, जिसे रह रहकर चेक किया जाना चाहिए कि एक्सपायरी डेट के अंदर है या नहीं. इतना ही नहीं, ड्राइवर, कंडक्टर, लेडी अटेंडेंट, गार्ड सभी को इन यंत्रों/ फर्स्ट ऐड इस्तेमाल की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.
4. जीपीएस, क्लोज सर्किट कैमरा और सफ़ेद रौशनी का इंतजाम बस में होना चाहिए. और ये सामान हमेशा वर्किंग कंडीशन में होने चाहिए.
5. स्कूल बस में स्पीड कंट्रोलर लगा होना चाहिए और मैक्सिमम स्पीड 40 किलोमीटर प्रति घंटा होना चाहिए. स्कूल बस में अलार्म बेल और साईरन लगा होना चाहिए, ताकि इमरजेंसी पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा सके.
6. स्कूल बस की खिड़कियों में horizontal ग्रिल और तार की जाली लगी होनी चाहिए. साथ ही, बस की खिड़कियों में परदे या फिल्म नहीं लगी होनी चाहिए. सीट ऐसी सामग्री की बनी हो, जो आग न पकडे. बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद जरुरी है.
7. दरवाजे के ताले वर्किंग कंडीशन में होने चाहिए. इमरजेंसी की स्थिति में बाहर निकलने के लिए एग्जिट डोर लगे होने चाहिए.
8. बस में स्कूल बैग और पानी के बोतल सुरक्षित रखने के लिए या तो सीट के नीचे पर्याप्त जगह होनी चाहिए या फिर बस में किसी सुविधाजनक स्थान पर.
9. बस में वेल ट्रेंड फीमेल अटेंडेंट और साथ ही एक बस कंडक्टर होना चाहिए, जो बच्चों की जरूरतों को समझ सके और यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा, सही तरीके से उतरने, चढ़ने के लिए जिम्मेवारी ले सके. इसके साथ ही इन्हे सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी परिस्थिति में कोई बाहरी स्कूल बस में न चढ़े.
10. अंत में बस के अंदर एक महिला शिक्षिका/ गार्डियन रहे, जो स्कूल बस की यात्रा अंत तक ड्राइवर और दूसरे स्टाफ के व्यवहार पर ध्यान रखे और तभी उतरे जब अंतिम बच्चा बस से उत्तर जाए.


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