किशनगंज लोकसभा सीट, जो हिंदुत्ववादी ताकतों के लिए हमेशा से वाटरलू साबित हुआ है…क्या इस बार जीत हासिल होगी?

किशनगंज बिहार के 38 जिलों में से एक है और बिहार के 40 लोकसभा सीटों में एक. किशनगंज बिहार के सबसे पिछड़े जिले में एक है. किशनगंज पहले पूर्णिया जिले का हिस्सा था. काफी लम्बे संघर्ष के बाद किशनगंज अलग जिला बना, 1990 में.
किशनगंज लोकसभा सीट हालाँकि 1971 से अस्तित्व में आया. किशनगंज एकमात्र जिला है बिहार का जहाँ मुस्लिम जनसंख्या की बहुतायत है. इस जिले में मुस्लिमों की कुल आबादी 68 प्रतिशत है. हिन्दू यहाँ माइनॉरिटी में हैं और फिर यहाँ संथाल आदिवासियों की उपस्थिति भी है. किशनगंज जिले की साक्षरता दर बिहार में सबसे कम है. और महिला साक्षरता की दर तो भारत में सबसे कम में गिनी जाती है. महज 18. 49 प्रतिशत. 2014 में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कैंपस की नीव यहाँ रखी गयी थी.
किशनगंज बिहार के उन पिछड़े जिलों में है, जहाँ केंद्र सरकार बैकवर्ड रीजन ग्रांट फण्ड के तहत आर्थिक मदद देती है.

किशनगंज की भौगोलिक स्थिति भी इसे सेंसिटिव बनाती है. पश्चिम में बिहार का अररिया जिला, दक्षिण पश्चिम में पूर्णिया जिला, पूरब में बंगाल का उत्तर दिनाजपुर जिला, और उत्तर में नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा और पश्चिम बंगाल का दार्जलिंग जिला। पश्चिम बंगाल की 20 किमी चौड़ी पट्टी इसे बांग्लादेश से अलग करती है.

इसकी अंतर्राष्ट्रीय सीमा से नज़दीकी के चलते यहाँ अवैध प्रवासियों का मुद्दा अक्सरहां चुनावी मुद्दा बनता रहा है. आतंकियों को प्रश्रय, नकली नोटों का भारतीय बाजार में खपाना, ISI का नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते किशनगंज में प्रवेश कर भारत विरोधी कार्य में संलग्न होना आदि तमाम मुद्दे हैं, जो दशकों से बने हुए हैं. सरकारें चाहें जो आएं, उम्मीदवार चाहे जो हों, ये मुद्दे बने हुए हैं.

सीट का इतिहास:
वर्तमान में किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में छह विधान सभा सीट हैं: बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, कोचाधामन,अमौर, और बैसी
अब अगर सीट के इतिहास की बात की जाए. किशनगंज लोक सभा सीट 1971 में अस्तित्व में आया.

1971 में कांग्रेस के जमीलूर रहमान को जीत मिली, तो 1977 में एंटी इंदिरा आंधी में भारतीय लोक दल के उम्मीदवार हालीमुद्दीन अहमद ने यहाँ से जीत हासिल की. 1980 में इंदिरा गाँधी ने सत्ता में वापसी की, यही पैटर्न किशनगंज में भी दोहराया गया और कांग्रेस के जमीलूर रहमान ने फिर जीत हासिल की.
1985 में इंदिरा गाँधी की ह्त्या से उपजी सहानुभूति लहर में कांग्रेस ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की, पर किशनगंज में सहानुभूति लहर काम न आ सकी और जनता पार्टी के सैयद शहाबुद्दीन ने जीत हासिल की. पर 1989 में कांग्रेस के उम्मीदवार एम् जे अकबर जो बाहरी उम्मीदवार थे, इस सीट से चुने गए. पर दो साल बाद 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता दल के कद्दावर नेता सैयद शहाबुद्दीन जीत हासिल करके लोकसभा पहुंचे. 1996 में जनता दल से टूटकर अलग बने राजद और लालू की सेकुलरिज्म के सिपाही के घोड़े पर सवार होकर मोहम्मद तस्लीमुद्दीन लोक सभा पहुंचे. हालाँकि तस्लीमुद्दीन खुद भी एक ताकतवर शख्सियत थे. और आने वाले दशकों में किशनगंज के साथ साथ बिहार की राजनीति में वे अच्छा दखल रखते आये.

१९९८ में एक बार फिर मुहम्मद तस्लीमुद्दीन राजद के टिकट पर विजयी हुए. पर अगले साल यानि 1999 में हुए चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवार ने ही जीत हासिल की, पर इस बार वो राजद या कांग्रेस का न होकर हिंदुत्ववादी पार्टी का उम्मीदवार था, शाहनवाज़ हुसैन. इसी साल केंद्र में वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की पांच साल की सरकार बनी. 2004 में इंडिया शाइनिंग अभियान के बावजूद वाजपेयी हार गए और केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार आयी. यहाँ भी बदलाव दिखा. और 2004 में राजद के मुहम्मद तस्लीमुद्दीन एक बार फिर विजयी हुए.
२००९ में यह सीट लम्बे अरसे के बाद कांग्रेस के खाते में गयी जब इसके उम्मीदवार मोहम्मद असरारुल हक़ को जीत हासिल हुई. इस साल मनमोहन सिंह सरकार के अच्छे काम की बदौलत यूपीए के पक्ष में जनता का मत था. कांग्रेस को इसका फायदा 2009 में मिला. 2014 में देश में यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के मुददे पर एक्शन न लेने के चलते जनता ने मोदी के पक्ष में प्रचंड बहुमत दिया पर किशनगंज में कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद असरारुल हक़ ने देश में बह रही लहार के विपरीत जीत हासिल करके अपने कद्दावर शख्सियत का परिचय दिया.

अब 2019 का चुनाव नज़दीक है और मोदी लहर 2014 की तुलना में 2019 में कमजोर है. कांग्रेस लगातार राफेल मुद्दे, बेरोजगारी, नोटबंदी आदि तमाम मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर रही है, पर कांग्रेस नेता असरारुल हक़ का देहांत हो चुका है, ऐसे में कांग्रेस को एक कद्दावर नेता की कमी खल रही थी. तभी बिहार में एनसीपी के सबसे दिग्गज नेता तारिक़ अनवर ने एनसीपी का दामन छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है.
ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि कांग्रेस किशनगंज लोकसभा सीट से तारिक़ अनवर को खड़ा करेगी.
उम्मीद जताई जा रही है कि जनसंख्या का समीकरण देखते हुए ये सीट कांग्रेस के पाले में एक बार फिर जायेगी. हिंदुत्ववादी ताकतों ने इस किले में बस एक बार सेंध मारी थी वो साल था 2009 का, जब उम्मीदवार भाजपा का जरूर था, पर था माइनॉरिटी कम्युनिटी का. शाहनवाज़ हुसैन. वाजपेयी के साफ़ सुथरे इमेज का हुसैन को मिला था. फिलहाल हुसैन भागलपुर लोकसभा सीट से जोर लगाने को उत्सुक हैं, जहाँ से वे 2014 में पार्टी के कुछ नेताओं के भीतरघात के चलते कुछ वोटों से हार गए थे.


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