पुलवामा हमला: हमें अपना निशाना आतंकवाद पर साधना चाहिए, न कि अपने ही देशवासियों पर

जब देश में पब्लिक डिस्कोर्स का विषय होना चाहिए था, ” अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की कमर कैसे तोड़ी जाए, सरकारी तंत्र कैसे तंद्रा को तोड़े” उस समय मूल मुद्दे कहीं पीछे छूट गए और हेट कैंपेन शुरू हो गया.
 
पुलवामा में 40 CRPF जवान आत्मघाती हमले का शिकार हो गए. पर मौत का तांडव अपने अपने साथ कई सवाल छोड़ गया:
१. कैसे 250 किलोग्राम एक्सप्लोसिव वर्ल्ड के मोस्ट militarised जोन में पहुँच गया?
२. कश्मीर में पालिसी रही है कि जब सिक्योरिटी फोर्सेज के दस्ते चलते हैं, तो उस समय सिविलियन्स की गाड़ियों की आवाजाही रोक दी जाती है. पर इस बार ऐसा नहीं हुआ. इस मामले में सफाई दी जा रही है कि वर्फबारी के चलते सिविलियन गाड़ियों का जमावड़ा हो गया था, ऐसे में उन्हें भी छोड़ने का प्रेशर था. तो फिर ऐसी क्या मज़बूरी थी कि जवानों को एयरलिफ्ट नहीं किया गया, या फिर कुछ दिनों के बाद उन्हें नहीं कश्मीर भेजने जाने के बारे में सोचा गया?
३. आत्मघाती हमलावर हमला करने से पहले काफी देर तक जवानों के काफिले के साथ चलता रहा, फिर उसने विस्फोटकों से भरी अपनी गाडी जवानों की गाडी से टकरा दी.
४. इंटेलिजेंस फेलियर इतने बड़े लेवल का है कि कॉमन सेंस रखने वाला एक आम आदमी ही हैरत में पड़ जाता है, , पर सरकार से सवाल सोशल मीडिया पर कम ही की जा रही है.
 
ये सारे सवाल असहज कर देने वाले हैं, पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं और जो व्यक्ति दिल्ली के पावर कॉरिडोर में इसकी जिम्मेवारी लेकर बैठे हैं, उन्हें इन सवालों का सामना करना होगा.
 
पर सोशल मीडिया ने एकदम हतप्रभ कर देने वाला रंग ले लिया. 14 तारीख से हमले के बाद  से लोगों का गुस्सा आत्मघाती हमलावर के बहाने मुस्लिमों के खिलाफ भड़क उठा. जब गौर से देखा गया कि ये कौन हैं जो देशभक्ति के नाम पर देश के अपने समुदाय, अपने लोगों पर बन्दूक ताने हुए हैं, तो पता चलना मुश्किल नहीं था. ये संघियों की सोशल मीडिया टीम है, जो राष्ट्रीय त्रासदी को चुनावी फायदे में बदलने के लिए दिन रात नफरत का माहौल बनाने में लगी है. प्रोफाइल चेक कीजिये इनका. सबूत के लिए कहीं दूर क्यों जाना?
 
जब देश में पब्लिक डिस्कोर्स का विषय होना चाहिए था, ” अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की कमर कैसे तोड़ी जाए, सरकारी तंत्र कैसे तंद्रा को तोड़े” उस समय मूल मुद्दे कहीं पीछे छूट गए और हेट कैंपेन शुरू हो गया.
 
 
इससे क्या हासिल होना है? देश में गृह युद्ध की स्थिति पैदा कर देना, एक पुरे समुदाय पर संदेह की नज़र से देखना ये सत्ता पक्ष की असफलता को नज़रअंदाज़ करने और जवानों की मौत को चुनावी फायदे में बदलना ये सारी रणनीति परेशां और हतप्रभ कर देने वाला है. ये राष्ट्र की अवधारणा पर ही चोट है. भारत कोई इजराइल नहीं है. इंसानी सभ्यता के विकास में भारतीय सभ्यता का बहुत लंबा इतिहास रहा है, यूनानी, चीनी और अरब सभ्यता के समकक्ष। सभ्यता की इस लम्बी विकास यात्रा में इजराइल की गिनती बहुत बाद में आती है.
 
 
कुछ मानसिक विक्षिप्तों की हरकत के आधार पर एक पुरे समुदाय पर ऊँगली उठाने की गलती हम करते आये हैं. हमने 1984 में ये गलती की, हमने ये गलती 2002 में दोहराई, हम इतिहास से कोई सबक नहीं लेते या जानबूझकर नहीं लेना चाहते. ऐसे में हम एक ही गलती दोहराने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं. 2019 में एक बार फिर वही गलती दोहराई जा रही है.
 
 
सवाल है इससे नुकसान किसका है? हम जाने अनजाने देश में विभाजनकारी एजेंडा को हवा दे रहे हैं. सिर्फ कश्मीर हमारा नहीं, सिर्फ कश्मीर के सेब और वहां की फ़िज़ां हमारी नहीं, वहां के लोग भी हमारे हैं, कश्मीरियों में रोष है, कभी कश्मीर ने पाकिस्तान को छोड़कर भारत के साथ आने का फैसला किया था, और पाकिस्तान इस फैसले को आज तक स्वीकार नहीं कर पाया, नतीजा उसने भारत के साथ लो इंटेंसिटी वार की रणनीति अपनायी और आतंकवाद को प्रश्रय दिया. इस आतंक की लपेट में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं, कश्मीरी युवा भी हैं. 2016 से कश्मीरी युवाओं ने इस लड़ाई में हथियार तेजी से उठाया है.
 
हमें तमाम मुद्दों पर सोचना होगा कि हमारी लड़ाई किससे है? हम आतंकियों से लड़ना चाहते हैं या हम कश्मीरियों, मुसलमानों को आतंक के खिलाफ लड़ाई में अपनी नफ़रत का निशाना बनाना चाहते हैं? अगर हम अपने ही देश के नागरिकों के खिलाफ हेट कैंपेन चला रहे हैं, तो फिर हम तलवार का इस्तेमाल अपने ही शरीर पर कर रहे हैं. नुकसान हमारा है.
 
इस निराशा के माहौल में आशा की किरण भी है. आशा की किरण बंगालियों ने और बंगाल में रह रहे अन्य लोगों  ने दिखाई है. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक कैंपेन की तरह चलाया है जिसमे कश्मीर के बाहर देश के अन्य हिस्सों में पढ़ रहे कश्मीरी युवाओं को सन्देश दिया गया है कि अगर आप अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं, तो आप हमारे घर में शरण ले सकते हैं. हम आपके लिए भोजन और आश्रय उपलब्ध करवाएंगे.
 
हम इस भावना का स्वागत करते हैं. जब तक इंसानियत और भारतीयता की भावना और भाव बचे रहेंगे, देश सुरक्षित रहेगा, नफरत के सौदागरों के हर मंसूबे असफल होंगे.

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